भोजन का महत्व

 

भोजन का महत्व

भोजन जीवन की सर्वप्रथम आवश्यकता है। वेदों से लेकर आयुर्वेद तथा अन्य भारतीय ग्रन्थों तक, भोजन के महत्व का निरूपण विभिन्न रूपों में प्राप्त होता है। वैदिक स्तुतियों में देवताओं से मुख्य रूप से रक्षा, धन-धान्य, पुत्र, समृद्धि, बल तथा स्वास्थ्य आदि की कामना की गई है। अन्न को जीवन का आधार मानते हुए अनेक स्थानों पर पर्याप्त मात्रा में अन्न की प्राप्ति की प्रार्थना की गई है।

यजुर्वेद में भी अन्न और समृद्धि के महत्व को विशेष रूप से स्वीकार किया गया है। भारतीय परम्परा में अन्न केवल शरीर को धारण करने का साधन नहीं है, बल्कि यह आयु, बल, पोषण, स्वास्थ्य, ओज और समृद्धि का आधार माना गया है। इसीलिए अन्नदान को अत्यन्त पुण्यकारी माना गया और ऐसी कामना की गई कि हमारे घर में अन्न-धान्य की कभी कमी न हो।

भोजन हेतु प्रार्थना

संस्कृत ग्रन्थों में हितकारी, सात्त्विक, शुद्ध एवं पर्याप्त मात्रा में प्राप्त होने वाले भोजन की कामना की गई है। ऋषियों ने शुद्ध एवं सात्त्विक भोजन पर विशेष बल दिया है तथा अहितकारी, दूषित अथवा शरीर के लिए विष के समान हानिकारक भोजन से दूर रहने की प्रेरणा दी है।

भारतीय वाङ्मय में ऐसी अनेक प्रार्थनाएँ प्राप्त होती हैं जिनमें कामना की गई है कि—

  • घर अन्न और धान्य से सदैव परिपूर्ण रहे।
  • अन्न कभी नष्ट न हो।
  • ग्रहण किया हुआ भोजन स्वादिष्ट एवं हितकारी हो।
  • भोजन शरीर को बल और पोषण प्रदान करे।
  • वह रोगों से रक्षा करे तथा दीर्घायु प्रदान करे।
  • भोजन शरीर और मन को स्वस्थ रखने वाला हो।

इस प्रकार भोजन का उद्देश्य केवल भूख मिटाना नहीं है। उचित भोजन शरीर के पोषण के साथ-साथ उसके स्वास्थ्य, बल और मानसिक संतुलन को बनाए रखने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

भोजन की मात्रा

आचार्यों ने इस बात पर विशेष बल दिया है कि उचित मात्रा में किया गया भोजन ही उत्तम स्वास्थ्य का आधार है। परन्तु प्रश्न यह है कि उचित मात्रा कितनी होनी चाहिए?

आयुर्वेद के अनुसार भोजन की मात्रा सभी व्यक्तियों के लिए समान नहीं हो सकती। भोजन की उचित मात्रा का निर्धारण मुख्यतः व्यक्ति की आयु, भोजन के गुण तथा उसकी अग्निबल को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए।

आमाशय की क्षमता

आयु के अनुसार व्यक्ति के शरीर तथा आमाशय की क्षमता में भी भिन्नता होती है। आयुर्वेद में भोजन करते समय आमाशय को पूर्णतः भर देने के स्थान पर उसमें भोजन के पाचन और संचालन के लिए पर्याप्त स्थान रखने की बात कही गई है। परम्परागत रूप से आमाशय के एक भाग को भोजन, दूसरे भाग को पेय तथा शेष भाग को वायु के संचरण के लिए रखने का सिद्धान्त बताया गया है।

इसका मूल उद्देश्य यह है कि भोजन को पाचन के लिए पर्याप्त स्थान मिले और जठराग्नि अपना कार्य सुचारु रूप से कर सके। आवश्यकता से अधिक भोजन करने पर पाचन-क्रिया पर भार पड़ सकता है और इससे स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव पड़ सकता है।

खाद्य पदार्थ का लघु और गुरु होना

भोजन की मात्रा निर्धारित करते समय केवल उसकी मात्रा ही नहीं, बल्कि उसके गुरु (भारी) अथवा लघु (हल्के) होने का भी विचार करना चाहिए।

किसी खाद्य पदार्थ का गुरु या लघु होना उसकी प्रकृति, निर्माण-विधि, संयोग तथा काल आदि अनेक कारकों पर निर्भर करता है। इसलिए समान मात्रा में उपस्थित दो खाद्य पदार्थ शरीर पर समान प्रभाव नहीं डालते।

उदाहरण के लिए, दही को मथने के बाद उसका स्वरूप अपेक्षाकृत लघु हो जाता है, जबकि दही से जल अलग करके बनाए गए श्रीखण्ड जैसे पदार्थ अपेक्षाकृत गुरु होते हैं।

इसी प्रकार दाल, चावल और खिचड़ी में मूल खाद्य पदार्थ लगभग समान होते हुए भी उनकी पाचन-क्षमता अलग हो सकती है। सामान्यतः खिचड़ी दाल और चावल को अलग-अलग खाने की अपेक्षा अधिक सुगम रूप से पच सकती है। यदि खिचड़ी में जल की मात्रा अधिक हो तो वह और भी लघु एवं सुपाच्य हो सकती है।

अतः भोजन की मात्रा निर्धारित करते समय यह देखना आवश्यक है कि भोजन किस प्रकार का है और शरीर के लिए कितना गुरु अथवा लघु है।

अग्निबल और भोजन की मात्रा

भोजन की मात्रा का जठराग्नि (पाचन-शक्ति) से सीधा सम्बन्ध है। जिस व्यक्ति की अग्नि प्रबल है, वह अपेक्षाकृत अधिक मात्रा में भोजन को अच्छी तरह पचा सकता है, जबकि मन्द अग्नि वाले व्यक्ति के लिए कम मात्रा में भोजन करना अधिक उपयुक्त हो सकता है।

उदाहरण के लिए, समान मात्रा में भोजन यदि तीक्ष्ण, सामान्य अथवा मन्द अग्नि वाले व्यक्ति को दिया जाए, तो उसके पाचन में लगने वाला समय अलग-अलग हो सकता है। तीक्ष्ण अग्नि भोजन को अपेक्षाकृत शीघ्र पचा सकती है, जबकि मन्द अग्नि में पाचन में अधिक समय लग सकता है।

आयुर्वेद में अग्नि की स्थिति को केवल प्रकृति से ही नहीं, बल्कि व्यक्ति की वर्तमान अवस्था, आयु, ऋतु, आहार-विहार और स्वास्थ्य आदि अनेक कारकों से भी जोड़ा गया है। इसलिए केवल वात, पित्त या कफ प्रकृति के आधार पर भोजन की निश्चित मात्रा निर्धारित करना उचित नहीं है।

भोजन की मात्रा का निर्धारण

अतः प्रत्येक व्यक्ति को भोजन की मात्रा निर्धारित करते समय निम्न बातों का विचार करना चाहिए—

  1. अपनी आयु
  2. अपनी पाचन-शक्ति अर्थात् अग्निबल
  3. खाद्य पदार्थ का गुरु या लघु होना
  4. भोजन की प्रकृति और निर्माण-विधि
  5. ऋतु तथा समय
  6. अपनी शारीरिक अवस्था और दैनिक गतिविधि

इस प्रकार भोजन की उचित मात्रा कोई एक निश्चित माप नहीं है। जो मात्रा व्यक्ति की अग्नि के अनुसार उचित रूप से पच जाए, शरीर को पोषण दे और भोजन के बाद भारीपन या असुविधा उत्पन्न न करे, वही उसके लिए उचित मात्रा मानी जा सकती है।

आयुर्वेद का उद्देश्य केवल पेट भरना नहीं, बल्कि सम्यक् पाचन के माध्यम से शरीर, मन और स्वास्थ्य का संतुलन बनाए रखना है।


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