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Showing posts from 2021

बौद्ध धर्म के आचारपक्षीय सिद्धांतों का ब्राह्मणधर्मी मूल

    महात्मा बुद्ध एक महान शिक्षक एवं धर्मोपदेशक थे । छठी शताब्दी ई0 पूर्व  में उनका आगमन भारतीय समाज के उत्थान में सहायक सिद्ध हुआ । उन्होंने समाज को एक नई दिशा प्रदान की । महाराज शुद्धोधन का पुत्र सिद्धार्थ, जिस समय अपना घर  छोड़कर निकले उस समय ,केवल दुखों से मुक्ति का हेतु ढूँढना  एवं उसे प्राप्त करना ही  उनका लक्ष्य था ।किंतु इस छोटे से लक्ष्य ने ,इतना विस्तृत एवं व्यापक स्वरुप धारण कर  लिया ,कि उसने समाज, देश तदनन्तर विश्व को भी समाहित कर लिया । बुद्ध ने उन्हीं  तत्वों का प्रतिपादन किया जो सार्वकालिक एवं सार्वदेशिक थे । वे तत्व न  तो किसी वर्ग  विशेष के लिए थे ,न ही जाति विशेष के लिए । आत्मश्लाघा से रहित वह संपूर्ण  मानवता के लिए थे । उसमें न तो कर्मकाण्ड की जटिलता थी और न ही दर्शन शास्त्र  की दुर्बोधता । यही कारण है कि वह चिरप्रतिष्ठित ब्राहमण धर्म के विरोध में और अनेक  मतमतान्तरों के मध्य भी प्रतिष्ठित हो सका ।लेकिन क्या बौद्ध धर्म के सिद्धांत , ब्राह्मण धर्म के विरोधी थे ?         वस्तुतः म...

आधुनिक संस्कृत साहित्य की सरल तरल भाषा

            आधुनिक संस्कृत साहित्य का फलक अत्याधिक विस्तृत है जिसमे पारंपरिक विधाओं में साथ-साथ नई विधाओं में नई शैली के साथ प्रचुर साहित्य सुलभ है ।आधुनिक संस्कृत साहित्य के कवियों ने परम्परानुमोदित पक्ष से हटकर अपने युग की नई वास्तविकता के अनुरूप एक ऐसे मार्ग का निर्माण किया है ,जिसके द्वारा उनकी अनुभूति अधिक शक्ति के साथ पाठक पर प्रभाव डाल सकें और इस कार्य के निष्पादन में परंपरा जहाँ जहाँ बाधा उत्पन्न करती है ,वहां विद्रोह भी आवश्यक हो जाता है ।इसीलिए बीसवीं शती की ये रचनाएं संविधान, स्वरूप, भाषा, प्रस्तुति एवं शैली के दृष्टिकोण से प्राचीन संस्कृत साहित्य से भिन्न हैं । यह भिन्नता अत्यधिक सुस्पष्ट एवं विस्तार के साथ भाषा के क्षेत्र में दृष्टिगोचर होती है ,क्योंकि भाषा एक ओर तो भाव पक्ष को प्रभावित करती है ,वहीं कला पक्ष से भी संबंधित होती है इसके साथ ही साथ सह्रदय भावकों से भी साक्षात्    संबंधित होती है।          सामान्य रूप से देखा जाय तो आधुनिक संस्कृत साहित्य की भाषा सरल ...

मानसिक स्वास्थ्य प्राप्ति में पतंजलि के योग की भूमिका

           सामान्यतया स्वास्थ्य का तात्पर्य शारीरिक स्वस्थता से लिया जाता है । आजकल व्यक्ति इसी शारीरिक स्वास्थ्य को प्राप्त करने हेतु जागरूक एवं प्रयत्नशील दिखाई देते हैं ,किन्तु प्राचीन संस्कृत ग्रंथों में शारीरिक स्वास्थ्य के साथ-साथ मानसिक स्वास्थ्य को भी अत्यधिक महत्व प्रदान किया गया  है ।    मानसिक स्वास्थ्य का  महत्व  एवं स्वरुप -      संस्कृत ग्रंथों के अनुसार शरीर और मन की स्वस्थता ही स्वास्थ्य है ।संस्कृत ग्रंथों की इस अवधारणा को आधुनिक चिकित्सा शास्त्री भी मानने लगे हैं । तदनुसार ही विश्व स्वास्थ्य संगठन ने स्वास्थ्य की परिभाषा दी  है -           Health is a state of complete physical, mental and social well-being and not merely the absence of disease or infirmity.           अतः मानसिक स्वास्थ्य भी स्वास्थ्य सामान्य का ही अंग है । स्वास्थ्य की यह परिभाषा संस्कृत के अति प्राचीन ग्रंथ सुश्रुत संहिता में प्राप्त होती है-      समदोषः सम...

भक्ति रस और साधारणीकरण

         भारतीय जीवन में भक्ति की अत्यन्त प्रमुख भूमिका रही है। यही कारण है कि प्राचीनकाल से ही भक्ति साहित्य की परम्परा हमें अनवरत रूप से प्राप्त होती है जिसका चरमोत्कर्ष हमें 15वीं से 17वीं शती (जो भक्ति आन्दोलन के नाम से प्रसिद्ध है) के  साहित्य में प्राप्त होता है।          संस्कृत अलंकार शास्त्रियों ने भक्ति को न तो नौ स्थाई भावों के अन्तर्गत माना और न ही नवरसों में। उन्होंने भगवद भक्ति से अनुभूत होने वाले रस को भाव की संज्ञा प्रदान की। पण्डितराज जगन्नाथ ने भक्ति को रस मानने की ओर विचार अवश्य किया किन्तु अन्ततः उन्होंने भी पारम्परिक अलंकार शास्त्रियों का ही अनुसरण किया। भक्ति आन्दोलन से प्रभावित हो, भक्ति को मौलिक चित्तवृत्ति मानने वाले आचार्यों को स्थाई भाव एवं रस के रूप में भक्ति की गणना का होना अनुचित प्रतीत हुआ। अत: प्रमुख रूप से रूपगोस्वामी (1)एवं मधुसूदन सरस्वती(2) ने भक्ति की स्थाई भाव एवं सर्वोत्तम रस के रूप में प्रतिष्ठित करने का प्रयास किया। इस प्रकार संस्कृत अलंकार शास्त्र में भक्ति को लेकर दो दृष्टियाँ उपस्थित हुई—ए...

प्रोफेसर राधा वल्लभ त्रिपाठी शास्त्र से लोकधर्म तक

>       प्रोफेसर राधा वल्लभ त्रिपाठी --शास्त्र   से लोकधर्म तक प्रो० राधावल्लभ त्रिपाठी संस्कृत के प्रतिष्ठित समीक्षक, कवि, काव्यशास्त्री एवं साहित्यकार हैं । वे  बहुमुखी प्रतिभा के धनी साहित्यकार हैं। सन्धानम्, लहरीदशकम् ,गीत धीवरम् उनके काव्य संग्रह अखिल  भारतीय पुरस्कारों से सम्मानित हुए हैं लहरी दशकम् को   1993 में कालिदास पुरस्कार , सन्धानम् को 1994 में साहित्य अकादमी  पुरस्कार , गीत धीवरम्  को 1996 में कालिदास पुरस्कार प्राप्त हुआ है । इसके अतिरिक्त त्रिपाठी जी ने अनेक पुस्तकें  लिखीं, जिनमें नाट्यशास्त्र विश्वकोश, संस्कृत काव्यशास्त्र और काव्य परम्परा, संस्कृत साहित्य का अभिनव  इतिहास, संस्कृत कविता की लोकधर्मी परम्परा मुख्य हैं ।         प्राचीन भारत में रंगमंच के उद्भव एवं विकास पर आपने डी0 लिट् उपाधि प्राप्त की। त्रिपाठी जी  संस्कृत काव्य शास्त्र एवं रंगमंच के प्रमुख समीक्षक हैं । काव्यशास्त्र के किसी भी अंग की समीक्षा करते समय  वे व्यवस्थित, प्रामाणिक एवं सुविचारित सामग्री का समावेश करत...

स्त्रियों की स्थिति और पतञ्जलि के प्रत्यभिवादन नियम पर विचार

           यह सर्वविदित है कि पतंजलि द्वारा वर्णित सामग्री का स्रोत अनेक स्थानों पर पाणिनि ही है । पाणिनी के 8.2,83 सूत्र -'प्रत्यभिवादे शूद्रे' के अनुसार छोटो के द्वारा बड़ो को प्रणाम करने पर बड़ो की ओर से किये प्रत्यभिवादन में शूद्र के लिए प्लुत नहीं किया जाता था । उदाहरणार्थ यदि देवदत्त गुरू को प्रणाम करता प्रत्याभिवादन में गुरू कहता -'भो आयुष्मानेधि देवदत्ता 3 | इस वाक्य में गुरू देवदत्त के अंतिम स्वर को प्लुत बोलता किंतु यदि शूद्र प्रणाम करता तो उसे आशीर्वाद मिलता-' आयुष्मानेधि तुषजक' । तब तुषजक का अंतिम स्वर प्लुत नहीं किया जाता | पतंजलि ने इसी प्रत्यभिवादन के नियम में स्त्रियों का उल्लेख किया और उनके प्रणाम के उत्तर में भी प्लुत नहीं किया जाने लगा । व्याकरण के प्रयोजन पर विचार करते समय पतंजलि के महाभाष्य में वर्णित है- अविद्वास: प्रत्यभिवादे नाम्नो ये न प्लुतिम विदुः । काम तेषु तु विप्रोष्य स्त्रीष्विवायमहं वदेत् । अभिवादे स्त्रीवन्मा भूमेत्यध्येयं व्याकरणम्। (1) अर्थात् अभिवादन करते समय हम स्त्रियों के समान व्यवह्नत न किये जाए इसलिए व्याकरण पढ़ना ...