बौद्ध धर्म के आचारपक्षीय सिद्धांतों का ब्राह्मणधर्मी मूल
महात्मा बुद्ध एक महान शिक्षक एवं धर्मोपदेशक थे । छठी शताब्दी ई0 पूर्व में उनका आगमन भारतीय समाज के उत्थान में सहायक सिद्ध हुआ । उन्होंने समाज को एक नई दिशा प्रदान की । महाराज शुद्धोधन का पुत्र सिद्धार्थ, जिस समय अपना घर छोड़कर निकले उस समय ,केवल दुखों से मुक्ति का हेतु ढूँढना एवं उसे प्राप्त करना ही उनका लक्ष्य था ।किंतु इस छोटे से लक्ष्य ने ,इतना विस्तृत एवं व्यापक स्वरुप धारण कर लिया ,कि उसने समाज, देश तदनन्तर विश्व को भी समाहित कर लिया । बुद्ध ने उन्हीं तत्वों का प्रतिपादन किया जो सार्वकालिक एवं सार्वदेशिक थे । वे तत्व न तो किसी वर्ग विशेष के लिए थे ,न ही जाति विशेष के लिए । आत्मश्लाघा से रहित वह संपूर्ण मानवता के लिए थे । उसमें न तो कर्मकाण्ड की जटिलता थी और न ही दर्शन शास्त्र की दुर्बोधता । यही कारण है कि वह चिरप्रतिष्ठित ब्राहमण धर्म के विरोध में और अनेक मतमतान्तरों के मध्य भी प्रतिष्ठित हो सका ।लेकिन क्या बौद्ध धर्म के सिद्धांत , ब्राह्मण धर्म के विरोधी थे ? वस्तुतः म...