आदि शंकराचार्य की प्रसिद्धि मुख्य रूप से अद्वैत वेदान्त के प्रमुख प्रवक्ता के रूप में है किंतु वह, मात्र एक दार्शनिक ही नहीं थे । कभी तो वह हमें रससिद्ध कवि की भांति दिखाई देते हैं तो कभी सामान्य जनों को नीरस लगने वाले दर्शन तत्व की व्याख्या करने वाले दार्शनिक, कभी समस्त कर्मों का परित्याग करने वाले सन्यासी, तो कभी वैदिक कर्मकाण्डों की व्याख्या करने वाले सनानत धर्म के रक्षक एवं समाज सुधारक लगते हैं । उनका व्यक्तित्व अद्बभुत है, उनका दर्शन अद्भुत है और उससे भी अद्भुत है उनका समाज सुधार एवं राष्ट्रीय एकता में योगदान ।
शंकर के समय ( 788 ई. से 820 ई. तक) देश की राजनैतिक एवं धार्मिक स्थिति में अव्यवस्था सी व्याप्त थी । गुप्तकाल के पश्चात् कुछ अंशों में हर्षवर्धन को छोड़कर कोई भी सार्वभौम सम्राट नहीं हुआ । सम्पूर्ण भारतवर्ष छोटे-छोटे राज्यों में विभाजित हो गया था । ये राजा परस्पर युद्ध किया करते थे । इनके पारस्परिक द्वेष का लाभ विदेशी आक्रमणकारियों ने भी उठाया । निरंतर युद्ध होने के कारण देश की राजनैतिक स्थिति अव्यवस्थित थी। जहाँ तक धर्म का सवाल है उसकी स्थिति भी अच्छी नहीं कही जा सकती है । शंकर के समय भारतवर्ष नाना मतों, सम्प्रदायों तथा पंथों की प्रचार भूमि बन गया था । इन सम्प्रदायों को दो भागों में विभाजित किया जा सकता है | पहला जो वेदों का प्रमाण्य नहीं मानते थे और दूसरा ,जो वेदों का प्रामाण्य मानते थे ।किंतु इन दोनों में ही ,तत्व का उचित अर्थ न लिये जाने के कारण अर्थात दार्शनिक अर्थ न लेकर व्यवहारिक अर्थ लिये जाने के कारण अनेक बुराईयां आ गई थी। जिसके फलस्वरूप यह अपने उद्देश्य से हट गये थे, तथा समाज में अनाचार वृद्धि का कारण बन रहे थे । इस राजनैतिक एवं धार्मिक पृष्ठभूमि में शंकर का उदय वैदिक धर्म का पुनरूत्थान करने वाले समाज सुधार के रूप में हुआ |
शंकर ने वैदिक ज्ञान प्राप्त करने के पश्चात मात्र 8 वर्ष की आयु में ही सन्यास ले लिया और वह भी उस वैदिक धर्म को पढ़ने के पश्चात जो कालान्तर में उनके धर्म प्रचार का आधार बना। उनके लिये सन्यास का तात्पर्य बुद्ध के समान इस सांसारिक जगत् को पूर्णरूपेण निस्सार जानकर सत्य की खोज में निकलना नहीं था क्योंकि अगर ऐसा होता तो वह संसार को अनिर्वचनीय नहीं बल्कि निस्सार मानते । उनके लिये सन्यास का तात्पर्य था ज्ञान प्राप्ति के लिये एकान्त में मनन एवं साधना । जिसके द्वारा शंकर ने अवैदिक दर्शन तथा द्वैत वादियों के मतों का भली भांति खण्डन कर उपनिषदों के आध्यात्मिक अद्वैत तत्व का प्रतिपादन अत्यंत प्रबल युक्तियों के सहारे किया । हमारे इस मत की पुष्टि इस जनश्रुति से भी होती है कि सन्यासी बनने से पूर्व शंकर ने अपनी मां को वचन दिया था कि वह उनका दाह संस्कार आदि कृत्य करेंगे । बाद में मां के बीमार होने पर शंकर मां के पास आए तथा सन्यास के नियमों की अवहेलना करते हुए माता के पैर छुए । मां की मृत्यु हो जाने पर शंकर उनके दाह संस्कार के लिये उद्यत हुए । परंपरा के अनुसार सन्यासियों के लिये दाहकर्म निषिद्ध था ।अतएव अग्रहारों एवं नम्बूदिरियों ने उनका विरोध किया परंतु इन सब की अवहेलना करते हुए शंकर ने दाह संस्कार किया । उन्होंने मल्लारि पूजा जिसमें शिव की पूजा कुत्ते के रूप में की जाती थी, कापालिक पूजा, जिसमें देवता भैरव को नरबलि दी जाती थी, दक्षिणी भारत में प्रचलित शक्तिपूजा, शरीर को दागने की प्रथा इत्यादि को समाप्त किया ।
शंकराचार्य के दर्शन से एवं कुछ अन्तः साक्ष्य से ऐसा प्रतीत होता है कि वे वर्ण व्यवस्था को नहीं मानते थे। उन्होंने ब्रह्मज्ञान के आधिकारी के लिये वर्ण, लिंग, जाति, धर्म आदि के आधार पर कोई भेद नहीं माना है । उनके अनुसार तो निम्न चार वस्तुएं ही ब्रह्मज्ञान के अधिकारी के लिये आवश्यक है- (1) नित्य अनित्य वस्तु विवेकः (2) इहामुत्रार्थ फलभोग विरागः (3) शामादि साधना षटक (4) मुमुक्षत्व च । अपने स्त्रोत में वह कहते हैं -
'न मे जातिभेदों '
वह तो चाण्डाल को भी अपना गुरू मानते हैं और उसकी स्तुति में मनीष पन्चकम् की रचना करते हैं । चाण्डाल की स्तुति वह इन शब्दों में करते हैं-
चाण्डालो स्तु स तु दहिलो स्तु गुरुरित्येषा मनीषा नम |
निश्चित रूप से यह एक क्रांतिकारी कदम था क्योंकि अभी तक वेदों का पठन तो क्या सुनना भी शूद्रों के लिये निषिद्ध था ।
शंकर ने दक्षिणी भारत के केरल राज्य में जन्म लिया । उनकी उच्च शिक्षा सम्भवतः मध्य भारत में हुई, प्रसिद्धि उन्हें बनारस में मिली अतएव एक विशाल क्षेत्र के लोगों से उनका सम्पर्क हुआ । देश की जर्जर एकता का ज्ञान हुआ | जिसकी पुर्नस्थापना के लिये एक भ्रमणशील शिक्षक के रूप में सम्पूर्ण भारत वर्ष का भ्रमण किया तथा अपने उद्देश्यों के माध्यम से लोगों को जोड़ने का प्रयास किया।यह परम्परा अनेक वर्षो तक चलती रहे इसके लिय चार मठों की स्थापना की ।जो आज भी देश के चार कोनों में अवस्थित होकर अपने उद्देश्य में संलग्न है । ये मठ हैं दक्षिण श्रृंगेरी मठ, पश्चिम में शारदा मठ, पूर्व में गोवर्धन मठ एवं उत्तर में ज्योतिर्मठ ।
शंकर तो इस मत के प्रतिपादक हैं -
' ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या '
अर्थात यह जगत मिथ्या है ।
लेकिन दूसरी ओर वह यह कहते हैं कि संसार पूर्ण रूप से असत्य भी नहीं है । इसी प्रकार एक ओर उनका मत हैं
'अहं ब्रह्मास्मि '
वहीं दूसरी ओर उस परमतत्व को अपने से श्रेष्ठ मानकर उसकी भक्ति करते हैं - 'भज गोविन्द '
उपर्युक्त वाक्यों में तो शंकर के कथन में वैपरीत्थ दिखाई देता है किंतु वस्तुतः यह वैपरीत्य नहीं बल्कि शंकर की दूरदर्शिता है । जो यह दर्शाती है कि साधारण जिज्ञासुओं के प्रति भी वे उदासीन नहीं थे । निरूपाधिक निर्विकल्प ब्रह्म को मन्दबुद्धि के लोग ग्राह्य नहीं कर सकते थे-
नहि निरूपाधिकमेव ब्रह्म मन्दबुद्धिभिरा कलथितुं शक्यम् ।
इसलिये शंकर ने दो दृष्टि से ब्रह्म का विचार किया पारमार्थिक एवं व्यावहारिक। पारमार्थिक दृष्टि से मात्र परब्रह्म सत्य है किंतु व्यावहारिक दृष्टि से ब्रह्म सगुण है । लोक का कार्य संचालन व्यवहार से ही होता है अतः उन्होंने भी विभिन्न स्त्रोतों के माध्यम से विष्णु, शिव, शक्ति आदि देवताओं की दक्षिणामूर्ति, हरिमीड़े स्त्रोत, आनन्दलहरी, सौन्दर्यलहरी आदि में स्तुति की । इन स्तुतियों से जीवन के प्रति उनकी आस्था एवं औचित्य प्रकट होता है ।
शंकर ने कर्म को कभी मोक्ष का साक्षात्साधन नहीं माना है परंतु वे कर्म की उपेक्षा भी नहीं करते । कर्म को वह चित्तशुद्धि के लिये आवश्यक बताते हैं । चित्तशुद्धि के परिणाम स्वरूप ही चित्त आत्मालोचन के योग्य बनता है । उनके अनुसार अहंकार और स्वार्थ के बंधन से क्रमशः मुक्त होने के लिये निष्काम कर्म आवश्यक है न कि निष्क्रियता ।इस प्रकार ब्रह्म को पारमार्थिक रूप से एकमात्र सत्य मानने पर भी वह जगत की सत्ता का पूर्णतया निषेध नहीं कर पाए क्यों ? समाज की व्यवस्था के लिये ।अगर सब प्रकार विभेद मिथ्या है तब तो पाप पुण्य भी मिथ्या होगा और इस सिद्धांत का परिणाम समाज के लिये भयंकर होगा ।किंतु शंकर की दृष्टि से व्यावहारिक रूप में पाप पुण्य का भेद अन्यान्य भेदों की तरह यथार्थ है।
इस प्रकार ज्ञान को ही मोक्ष का साधन मानने पर भी भक्ति एवं कर्म की उपेक्षा नहीं कर पाए क्यों? व्यक्ति के उत्थान के लिये। अभी तक जो भी धर्म था वह समाज के एक वर्ग का ही प्रतिनिधित्व कर पाता था । शंकर ने ज्ञान की बातें बुद्धिजीवी पण्डितों के लिये कही । भक्ति सहृदय एवं भावुक व्यक्तियों के लिये तथा कर्म सिद्धांत कर्मठ व्यक्तियों के लिये था ।
शंकर के दर्शन के आधार पर देखें तो उनकी दृष्टि के द्वारा तो समाज में व्याप्त समस्त बुराईयां, भेदभाव इत्यादि दूर हो जायेगा । मानव जीवन में धर्म, जाति, वर्ण, लिंग आदि क्षेत्रों में जो भेदभाव दिखाई देता है उसका मूल है द्वैत का भाव । जब कभी भी कहीं भी दो तत्व होते हैं तब सदैव एक तत्व दूसरे से श्रेष्ठ होना चाहता है तभी ऊंच नीच भेदभाव की स्थिति होती है जो समस्त बुराईयों की जड़ है । शंकर तो द्वैत का पूर्ण रूप से निषेध कर अद्वैत की स्थापना करते हैं इसलिये वहां तो नित्य अमिट है आनन्द है।
निष्कर्षतः जगत की व्यावहारिक सत्ता का प्रतिपादन करने वाले आचार्य जितने आदर्शवादी थे ,उतने ही यथार्थवादी । उन्होंने वर्ण, जाति के आधार पर उत्पन्न होने वाले भेदों को नहीं माना और मठों की स्थापना से एवं अपनी अद्वैत दृष्टि से भारत को जोड़ने का प्रयास किया । उनके दर्शन के व्यापक दृष्टिकोण से तो भारतवर्ष ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण विश्व एक सूत्र में बंध जायेगा । वहां जाति,वर्ण, लिंग आदि के आधार पर होने वाली विषमता समाप्त हो जायेगी और भावनात्मक एकता स्थापित हो जायेगी। इस अर्थ में आज शंकर के दर्शन की प्रासंगिकता और बढ़ जाती है।
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Bibliography
1-Shankaracharya the great and his sucessors in Kanchi by N. Venkata Raman
2-Shankar 's Universal Philosophy of Religion। by Y. Masih
3-Shankarcharya, his life and times
by C.N. Krishna sany Aiyar
4-A study of shankara by N. Shastri
5-A source book of Advait Vedento
by S.A.B. Van Buitenen
6- Indian Historical Quaterly Vol -Vii
1-2 page 108
7-शांकर वेदान्त एक अनुशीलन by रमाकान्त अंगीरस
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