"Sanskrit Gyan Jyotsna: कालिदास के 'मेघदूत' में 'काकोदुम्बर' का उल्लेख:साहित्यिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि

कालिदास के 'मेघदूत' में 'काकोदुम्बर' का उल्लेख:साहित्यिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि


        कालिदास का साहित्य विविध विधाओं का आकर है। इसमें संगीतशास्त्र विविध प्रकार के पशु-पक्षियों, वृक्षों, ऋतुओं एवं फलों तथा पुष्पों आदि से सम्बद्ध प्रचुर सामग्री भी उपलब्ध होती है, परन्तु उनके द्वारा वर्णित स्थलों, पशु-पक्षियों तथा पुष्पों के अभिज्ञान के सम्बन्ध में कहीं कहीं विद्वानों में वैमत्य है। इस शोध-पत्र में कालिदास द्वारा 'मेघदूत' में उल्लिखित 'काकोदुम्बर' नामक फल की पहचान के विषय में भारतीय एवं पाश्चात्य व्याख्याकारों के विषय में भारतीय एवं पाश्चात्य व्याख्याकारों के परस्पर भिन्न मतों के विश्लेषण का प्रयास किया गया है।
                   कालिदास ने मेघदूत में मेघ को अलकापुरी का मार्ग बताते समय उज्जयिनी के पश्चात् देवगिरी पर्वत का वर्णन करते समय मेघ को काकोदुम्बर नामक फल को पकाने वाले के रूप में वर्णित किया है-
        नीचैर्वास्यत्युपजिगमिषोर्देवपूर्वम् गिरिं ते
        शीतो वायुः परिणमयिता काननोदुम्बराणाम्।(1)
      उपरोक्त वर्णन से यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि कालिदास द्वारा वर्णित उदुम्बर नामक फल के वन मालवा क्षेत्र में बहुतायत से प्राप्त होते होंगे तथा फल वर्षा काल में पकते हैं। 
      अब प्रश्न उठता है कि वह कौन सा फल है? जिसका उल्लेख महाकवि कालिदास ने किया है। 
     उपर्युक्त अंश की संस्कृत टीका (2)में विद्वानों ने सामान्यतया उसे फल्गु या जन्तुफल कहा है। हिन्दी व्याख्याकारों (3)ने इसे गूलर कहकर पारिभाषित किया है किन्तु अंग्रेजी व्याख्याकार इसे Fig या Wild fig' (4)कहकर वर्णित करते है।
अपने इस शोधपत्र में मैंने यह स्थापित करने का प्रयास किया है कि कालिदास द्वारा वर्णित उदुंबर को Fig कहना उचित नहीं है क्योंकि Fig का अर्थ (5)सामान्यतया अंजीर होता है।
        यद्यपि यह सत्य है कि Fig और उदुंबर या गूलर दोनों ही वनस्पति विज्ञान की Ficus प्रजाति के वृक्ष है। Fig को Encyclopedia of Britanica (6)में Ficus Carica कहा गया है जबकि उदुंबर Ficus Racemosan के नाम से जाना जाता है। स्पष्ट है कि दोनों ही वृक्षों की प्रजाति एक है। इसी प्रजाति के अन्य वृक्ष है -बरगद ,पाँखुड,पीपल आदि । इन सभी वृक्षों के वाह्य स्वरूप, आकार, स्थान , पत्ती इत्यादि में पर्याय अंतर है ।
    गूलर पर्णपाती (deciduous tree) है ,जो उत्तरी भारत में गंगा के पश्चिमी भाग एवं मध्य भारत में बहुतायत से पाया जाता है। वस्तुत: कालिदास जिस उदुंबर का उल्लेख करते हैं वह यही गूलर है।
           इसके विपरीत Fig जो सामान्यतया अंजीर के नाम से जाना जाता है उसका उत्पत्ति स्थल अफगानिस्तान और पर्शिया माना जाता है (7)तथा भारत में यह उत्तर पश्चिमी पंजाब, पश्चिमी हिमालय, सिन्ध, बलूचिस्तान, मुम्बई, मद्रास, बर्मा और अंडमान द्वीप समूह में पाया जाता है किंतु श्री वॉट ने मध्यभारत में इसके पाये जाने का उल्लेख नहीं किया है जो कालिदास को अभीष्ट है जहां उन्होंने उसके वनों का उल्लेख किया है।
    अतः स्पष्ट है कि कालिदास द्वारा वर्णित उदुम्बर और Fig के स्वरूप एवं प्राप्ति स्थल में पर्याप्त अंतर है।
     साहित्यिक साक्ष्यों का विश्लेषण करने पर भी यह स्पष्ट होता है कि काकोदुम्बर के पर्यायवाची के रूप में फल्गु या जन्तुफल शब्द का प्रयोग ही सामान्यतया किया गया है। अमरकोश काण्ड 2 वनौषधि वर्ग में भी उदुम्बर (काकोदुम्बर) और फल्गु का उल्लेख है-
         काकोदुम्बरिका फल्गुमलपूर्जघनेफला।
सुश्रुत संहिता में फल्गु शब्द का प्रयोग है-
       विष्टम्भि मधुरं स्निग्धं फल्गुजं तर्पण गुरु।
चरक संहिता में भी फल्गु का प्रयोग है
       तर्पण वृहणं फल्गु गुरु विष्टम्भि शीतलं।
वाग्भट्ट । (सातवीं शती) एवं वागभट्ट ।। (आठवीं या नवीं शती) दोनों ने ही फल्गु का उल्लेख
      "सौवीरबदराडोलफल्गुश्लेष्मातकोभवम ।।
       अष्टांग हदय पर अरूण दत्त (1220ई.) एवं हेमाद्रि (1260 ई.) द्वारा की गई टीकाओं में फल्गु की व्याख्या करते समय कहा गया है कि-
           फल्गु: काकोदुंबरिका
       इसके अतिरिक्त "धन्वन्तरि निघंटु "जो कि अमरकोश से पूर्व का है उसमें भी उदुंबर एवं काकोदुम्बर का उल्लेख है तथा उनकी विशेषताओं का वर्णन है लेकिन वहां अंजीर का उल्लेख भी नहीं है ।
         फल्गु, काकोदुम्बर और अंजीर का पर्यायवाची के रूप में सर्वप्रथम उल्लेख हमें वाग्भटट के अष्टांग संग्रह की पं. रामचन्द्र शास्त्री किंजवेडेकर कृत टीका शसविलेख सूत्र स्थान 1940 में मिलता है-
"फल्गुः काकोदुम्बरिका स्वानामख्यातः खरपत्री वृक्षविशेषः (काला उबंर )अत्र केचन फल्गुशब्देन रामोदुम्बरिका फलम् (अंजीर) इत्याहुः।
          श्रीरामचन्द्र शास्त्री की उपर्युक्त टीका के संबंध में मेरा ऐसा मानना है कि श्रीरामचन्द्र शास्त्री ने फल्गु शब्द से अंजीर का जो तात्पर्य लिया है वहां उन्होंने केचन् कहकर उसके प्रति अपनी अनास्था ही व्यक्त की है अर्थात् उन्हें उदुम्बर का अंजीर अर्थ अभीष्ट नहीं है।
         अंजीर और काकोदुम्बर का साथ साथ उल्लेख 1374 A.D में मंडलपाद ने भी किया है।
          अंजीरं मंजुलं मेहं काकोदुम्बरिकाफलम्
          अंजीरं शीतलं स्वादु गुरुपित्ताश्रवातजित्
           तस्मादल्पगुणं ज्ञेयमंजीरं लघु तद् गुणै: ।।'
         उपर्युक्त उदाहरण के संबंध में मेरा यह अभिमत है कि यहां पर मंडनपाद ने अंजीर और काकोदुम्बरिकाफल को पर्यायवाची के रूप में प्रयुक्त नहीं किया है। बल्कि मंडनपाद के अनुसार अंजीर (Fig) तथा काकोदुंबरिका (गूलर ) इन दोनों ही वृक्षों से सफेद द्रव निकलता है अतः ये दोनों Ficus प्रजाति के अलग अलग प्रकार की किस्म हैं। श्री पी.के गोंड ने अनेक साक्ष्यों के द्वारा यह सिद्ध करने का प्रयत्न किया है कि Fig अंजीर (Ficus Carica) भारत में काफी बाद में आया तथा Fig का अंजीर के रूप में उल्लेख 1374 ई . में मंडनपाद ने किया है। अतः स्पष्ट है कि कालिदास द्वारा वर्णित उदुम्बर गूलर है।
        ऐतिहासिक साक्ष्यों से भी मेरा यह मत पुष्ट होता है क्योंकि श्री स्मिथ" के अनुसार बिन्दुसार, जो सम्राट अशोक का पिता था उसने कुछ Figs और rasin wine, सीरिया के राजा एण्टियोचस सॉटर से मंगवाये थे। ये Figs साटर द्वारा बिन्दुसार को भेजे गये थे। बिन्दुसार 298 ई. पू. में गद्दी पर बैठा तथा
एण्टियोचस सॉटर की 261 ई.पू. में मृत्यु हो गई। अतः स्पष्ट है कि तीसरी शती ई.पू. में Fig बाहर से मंगाया गया था जबकि मेघदूत में कालिदास ने उदुम्बर के वनों (काननोदुम्बराणा) का वर्णन किया है।
        कालिदास का समय प्रथम शताब्दी ई.पू. ही स्थापित किया गया है। अत: इसकी संभावना अति न्यून कि Fig (अंजीर) के वनों का उल्लेख कालिदास ने उदुम्बर शब्द से किया हो। वस्तुत: सीरिया से आने वाला Fig अंजीर है जो वहाँ बहुतायत से प्राप्त होता है और कालिदास ने गूलर के वनों का ही वर्णन मेघदूत में किया है ।
     उपर्युक्त प्रमाणों के आधार पर अंग्रेज़ी व्याख्याकारों को उदुंबर की व्याख्या करते समय Fig नहीं कहना चाहिए बल्कि (Gular Tree (AVariety of Ficus tree) ही कहना चाहिये। जिस प्रकार नीम के पेड़ को Neem tree पीपल के पेड़ को Peepal tree कहा जाता है उसी प्रकार गूलर के पेड़ को (Gular tree )कहना उचित एवं तर्क संगत है।



संदर्भ ग्रंथ सूची --
1- मेघदूत/पूर्वमेघ 49106 डॉ. रमाशंकर त्रिपाठी, प्रकाशन केन्द्र, लखनऊ
2- वनेषुदुम्बराणाम् जन्तुफलानम्' मेघदूत पर संजीवनी टीका, पृष्ठ 106
3- प्रभुदयाल अग्निहोत्री- महाकवि कालिदास सांस्कृतिक अवदान
4-The Meghduta of Kalidasa- M.R. Kale, Page No.77&
Works of Kalidasa-Devadhara Page 15 -
5. English-Hindi Dictionary-Bhargava
6-Encyclopedia of Britanica. Vide Page 228 of Vol. IX of the fourteenth Edn. 1920
7- Amanual of Indian Timbers,J.S.Gamble, 1972, Page No. 94
8.Watt - Dictionary of Economic Products of India.
9-अष्टांग हृदय हरिशास्त्री पारदकर, N.S. Press, मुम्बई 1939 P.P. 110-111
10- चित्रशाला प्रेस, पूना सूत्र स्थान 1940
11- मदनविनोद निघण्टु, मण्डलपाद, Government MSS Library at the B.O.R.I.Poona No. 1100f18
74 folio 21 (फलवर्ग: षष्ठः)
12.Indian Historical Quarterly Vol XIX PP. 62-65
13-वी. स्मिथ Early History of India (Oxford 1914 Page 147)

विशेष - Journal of Ganganath Jha Campus ,rashtriya sanskrit sansthan, Allahabad ,January -December 2009 vol. LXV(1-4) अंक में प्रकाशित 




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