विकास के इस युग में व्यक्ति की विचारधारा से लेकर उसकी जीवन शैली, आस्था, विश्वास, के साथ-साथ आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक आदि क्षेत्रों में भी परिवर्तन दिखाई पड़ रहा है। परिवर्तन की इस आंधी में हम अपने उद्देश्यों, आदर्शों एवं प्रतिमानों से भी दूर होते जा रहे हैं। जिससे व्यक्ति में नैतिक अधःपतन, भोगों में लिप्सा, वाहय प्रदर्शन , पारिवारिक विघटन आदि प्रवृत्तियां तथा अनेक बुराइयां जैसे आतंकवाद, हत्या, हिंसा, बलात्कार, चोरी आदि उत्पन्न हो रही है, तथा प्रतिदिन इनके प्रतिशत में वृद्धि होती जा रही है।
हमारे मनीषियों ने पुरूषार्थ- धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष- को अत्यधिक महत्व प्रदान किया था। आज भी हम धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष के जिस स्वरूप को आदर्श मानकर तथा पुरूषार्थ मानकर प्रयत्नशील हो रहे है वह मार्ग निश्चित रूप से पारम्परिक अवधारणा से पथभ्रष्ट दिखाई दे रहा है। स्मृतियों एवं साहित्य में पुरूषार्थ का जो स्वरूप वर्णित है, वह भिन्न है। आज पुरूषार्थ की मूल संकल्पना लुप्तप्राय हो गई है। तथा प्रस्तुत स्वरूप में दृष्टिगोचर होने वाले परिवर्तन से विकृतियां एवं बुराईयां उत्पन्न हो रही हैं। स्मृतियों में पुरूषार्थ का स्वरूप निर्धारित किया गया है, किन्तु जीवन में उसे कैसे उतारा जाय यह शिक्षा साहित्य से मिलती है।
आचार्य मम्मट ने साहित्य का प्रयोजन-कान्ता के समान उपदेश प्रदान करने के लिये माना है जो ‘‘रामादिवत् वर्तितव्यं न रावणादिवत्’’ यह उपदेश देता है।
कालिदास के साहित्य में पुरूषार्थ सम्बन्धी मानदण्ड विद्यमान हैं, जिनकी शिक्षा वे प्रियतमा के समान देते हैं। किन्तु इसके साथ ही उनका कथन है-
पुराणमित्येव न साधु सर्वम्
च चापि काव्यं नवमित्यवद्यम्
सन्तः परीक्ष्यान्तरद्भजन्ते
मूढ़ः परप्रत्ययनेयबुद्धिः।।
मालविकाग्निमित्रम् 1/2 )
अर्थात् पुराना कहने से ही सभी वस्तुएं अच्छी नहीं हो जाती हैं। सन्त लोग परीक्षा करके ही गुण दोष का निर्धारण करते हैं।
इसी कारण हमारा भी यह कर्तव्य है कि गुण दोष के आधार पर पुरूषार्थ के स्वरूप, उसकी आवश्यकता पर विचार करें एवं उसके आदर्श स्वरूप का अनुकरण करें।
अतः प्रस्तुत शोध पत्र में कालिदास के साहित्य के परिप्रेक्ष्य में, पुरूषार्थ के बदलते स्वरूप के गुण दोष का विवेचन करते हुए कालिदास की प्रांसगिकता पर विचार किया गया है।
धर्म- आजकल धर्म Religion का पर्याय हो गया है, तथा धर्म शब्द का अर्थ सामान्यतया सम्प्रदाय सम्बन्धी मान्यताओं से लिया जाता है। तथा उसी धर्म पालन को हम पुरूषार्थ से जोड़ते हैं। इस्लाम धर्म, हिन्दू धर्म, ईसाई धर्म, सिक्ख धर्म आदि में उस सम्प्रदाय विषेष के निमित्त जो क्रियाएं एवं मान्यताएं हैं उसे ही धर्म मानकर उसका पालन करना आज पुरूषार्थ माना जाता है। फलस्वरूप धर्म के नाम पर हम आपस में लड़ रहे हैं। द्वेष कर रहें एवं हत्या भी कर रहे हैं।
परम्परागत भारतीय मत में धर्म शब्द किसी सम्प्रदाय को व्यक्त नहीं करता है। धर्म शब्द की उत्पत्ति धृञ् धातु से हुई है जिसका सामान्य अर्थ है, धारण करना अथवा पालन करना। यही कारण है कि प्राचीन काल में धर्म शब्द का प्रयोग नैतिक गुणों को धारण करने तथा कर्तव्य एवं दायित्व के अर्थ में ही अधिकतर प्राप्त होता है।
कालिदास के साहित्य में धर्म शब्द से सम्बन्धित अनेक प्रयोग प्राप्त होते हैं। यहां पर धर्म शब्द का प्रयोग मुख्यतः दो अर्थों में हुआ है, पहला चार पुरूषार्थों के एक भेद के रूप में और दूसरा कर्त्तव्य एवं दायित्व के अर्थ में पुरूषार्थ के भेद के रूप में उल्लेख कुमार संभव. 5/38, कुमार संभव 3/6, रघु. 10/84, रघु. 14/21, रघु. 1/25, में प्राप्त होता है । (1) कालिदास ने अर्थ और काम से धर्म को श्रेष्ठ माना है।
धर्म के द्वारा व्यक्ति के कर्तव्य भी निर्धारित होते हैं। इसी सन्दर्भ में कालिदास ने राजा का धर्म (2), क्षत्रिय धर्म (3), पुत्र का धर्म (4), पतिव्रता का धर्म (5) आदि के कर्तव्य बताए हैं। कर्तव्य एवं अकर्तव्य पर विचार करने के लिये कारण दुष्यन्त के लिये ‘धर्मनिरपेक्षता’ (6) शब्द का प्रयोग प्राप्त होता है।
मनु के अनुसार संध्यावंदन, नित्य, पंचमहायज्ञ विषिष्ट धर्म की श्रेणी में आते हैं। यही कारण है कि कालिदास के इन क्रियाओं को धार्मिक क्रियाएं कहा है, (7)।धर्म के जितने भी कार्य है, उनमें शरीर की रक्षा करना सबसे पहला काम हैं - शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम् - कुमा. 5/33
अभिज्ञान शाकुन्तल में धर्म से निधि, मर्यादा, आचार परम्परा अर्थ भी प्राप्त होता है (8)।जैसे-
दृष्टवा ते विदितधर्मा तत्रभवान्नात्र दोषं गृहीष्यति कुलपतिः।
इसमें अतिरिक्त धर्मासन एवं धर्मपत्नी शब्दों में धर्म शब्द का प्रयोग भी दिखाई देता है। कालिदास ने धार्मिक क्रियाओं में संलग्न रहने वाली पार्वती को धर्मवृद्ध कहा है -
न धर्मवृद्धेषु वयः समीक्ष्ये।
कालिदास के अनुसार अर्थ और काम का भोग इस प्रकार करना चाहिये कि वह भी धर्म हो जाय ।
अप्यर्थकामौं तस्यास्तां धर्म एव मनीषिणः।।
रघु. 1/25
धर्म अर्थ एवं काम - इन तीनों पुरूषार्थों में से कालिदास ने धर्म को ही श्रेष्ठ माना है। अतएव व्यक्ति को अर्थ और काम से मन हटाकर धर्म का पालन करना चाहिये -
अप्यर्थकामौं तस्यास्तां धर्म एव मनीषिणः।।
रघु. 1/25
निष्कर्षतः यदि व्यक्ति अपने कर्तव्यों को ही धर्म माने, जिसमें नागरिक के कर्तव्य, पिता पुत्र आदि सम्बन्धों के कर्तव्य, समाज के प्रति कर्तव्य आदि सभी आ जाते हैं, तथा मानव धर्म पर बल देकर नित्य कर्म करें तो नैतिक विकास के साथ-साथ सामाजिक बुराईयां दूर हो जायेंगी।
अर्थ- वर्तमान समय में व्यक्ति का जीवनोद्देश्य ही अर्थ प्राप्ति हो गया है। बच्चों की शिक्षा एवं ज्ञान को अर्थ से जोड़कर देखा जाता है। और यही कारण है कि बच्चे के विद्यालय जाने से लेकर मृत्यु पर्यन्त उसका जीवन इसी अर्थ नामक पुरूषार्थ के चारों ओर घूमता है।
प्राचीन भारतीय परम्परा में जहां मोक्ष को धुरी मान कर समस्त कर्म संपादित किये जाते थे लेकिन आज अर्थ पुरूषार्थ के प्रति ही सम्पूर्ण उद्यम एवं प्रयास किया जा रहा है। जिसके कारण भोगों के प्रति लिप्सा, आसक्ति एवं वाहयाडम्बर एवं विलासी जीवन के प्रति आकर्षण बढ़ता जा रहा है। धन कमाने का तरीका न्यायसंगत एवं उचित हो या न हो ,इसके प्रति विचार न करके केवल अर्थ प्राप्ति करना, कभी भी पुरूषार्थ नहीं कहा जा सकता है।
कालिदास के साहित्य से यह बात सुस्पष्ट होती है कि कालिदास के समय जनसाधारण की आर्थिक दशा अच्छी थी। उन्होंने सामान्यतया सम्पन्न एवं वैभवशाली समाज का वर्णन किया है। बहुमूल्य रत्नों से भरा बाजार, स्त्रियों द्वारा रत्नजटित अलंकारों का उपयोग, स्वादिष्ट भोजन, मद्यपान, पण्यस्त्रियां आदि उल्लेखों से सम्पन्न एवं विलासी जीवन का पता चलता है।
किन्तु कालिदास ने अर्थ संचय केवल त्याग के लिये ही माना है-
‘त्यागाय सम्भृतार्थानां’ रघु. 1/7,
अर्थात् जो त्याग करने के लिए ही धन जुटाते थे।
रघुवंशियों का राज्य समुद्र के इस पार से उस पार तक फैला था किन्तु वे
यथाकामार्चितार्थिनाम् रघु. 1/6
अर्थात् याचकों को अभिलाषित वस्तु दान देते थे।
महाराज रघु ने दिग्वजय से लौटकर विश्वजित यज्ञ में सारी सम्पदा दक्षिणा में दे डाली। कालिदास ने रघु के इस उदाहरण को बहुत ही सुन्दर ढंग से वर्णित किया है कि जैसे बादल समुद्र से जल लेकर फिर पृथ्वी पर बरसा देते हैं वैसे ही महात्मा लोग भी धन दान के लिये ही एकत्र करते हैं-
स विश्वजितमाजह्मे यज्ञं सर्वस्वदक्षिणम्।
आदानं हि विसर्गाय सतां वारिमुचामिव। रघु. 4/86
अर्थात् जैसे बादल समुद्र से जल लेकर फिर पृथ्वी पर बरसा देते हैं वैसे ही महात्मा लोग भी धन को दान के लिये ही जुटाते हैं-
रघु. 4/86
किन्तु इस त्याग में भी प्रशंसा प्राप्ति की कामना नहीं होनी चाहिये-
‘त्यागे श्लाघाविपर्ययः।’ रघु. 1/22
अर्थात् दान दे कर भी वे अपनी प्रशंसा कराने की कामना नहीं करते थे ।
धन संचय का एक अन्य कारण दीनों को आश्रय देना है। जैसे चातक जल भरे बादलो का ही स्वागत करते है। वैसे ही धन संचय के द्वारा दूसरों को जीवन प्रदान करने में ही कालिदास ने जीवन की पूर्णताः बताई है।
कोशेनाश्रयणीत्वमिति तस्यार्थसंग्रहः।
अम्बुगर्भो हि जीमूतश्चातकैरभिनन्द्यते।
रघु. 17/60
अर्थात् उन्होंने धन इसलिए एकत्र किया कि इससे दीन लोग आश्रय पाते हैं क्योंकि चातक जल भरे बादलों का ही स्वागत करते हैं।
कालिदास ने राजा रघु की दानवीरता एवं त्याग की भावना की प्रशंसा की है,तो वहीं दूसरी ओर उन्होंनें याचक को निस्पृह अर्थी होना भी आवश्यक बताया है-
गुरूप्रदेयाधिकनिःस्पृहोऽर्थी
नृपोऽर्थिकामादधिकप्रदश्च।।
रघु. 5/31
अर्थात् उन दोनों में एक इतना संतोषी था कि आवश्यकता से अधिक लेना नहीं चाहता था और दूसरा इतना बड़ा दाता था की मांग से भी अधिक धन देने को सन्नद्ध था ।
निष्कर्षतः अर्थ नामक पुरूषार्थ का स्वरूप कालिदास ने स्पष्ट करते हुए कहा है कि निस्पृह भाव से धन एकत्र करो, एवं अनासक्त भाव से सांसरिक सुखों को भोगों-
अगृध्नुराददे सोऽर्थमसक्तः सुखमन्वभूत्।
रघु. 1/21
अर्थात् निस्पृह भाव से धन इकठ्ठा करते थे और अनासक्त भाव से सांसरिक सुखों को भोगते थे ।
किन्तु भोग भी युवावस्था तक ही भोगना चाहिये बुढ़ापे में निवृत्ति धारण कर तपस्या रत होना चाहिये।
शैशवेऽभ्यस्तविद्यानां यौवने विषयैषिणाम्।
वार्द्धके मुनिवृत्तीनां योगेनान्ते तनुत्यजाम्।
रघु. 1/8
अर्थात् जो बाल्यकाल में पढ़ते थे ,तरुणाई में संसार के भोगों को भोगते थे ,बुढापे में मुनियों के समान जंगलों में रहकर तपस्या करते थे और अंत में योग द्वारा शरीर छोड़ते थे ।
कालिदास स्पष्ट कहते है कि नीतिशास्त्र का ज्ञाता व्यक्ति भी यदि भोगासक्ति में लीन है तो वह भोग उसका धर्म अर्थ दोनों ही उसी प्रकार नष्ट कर देगा जैसे बरसात में बढ़ी हुई नदी का वेग दोनों तटों को ढहा देता
है -
अध्यापितस्योशनसाsपि नीतिं
प्रयुक्तरागप्रणिधिर्द्वि षस्ते ।
कस्यार्थधर्मौ वद पीड्यामि
सिंधोस्तटावोघ इव प्रवृद्धः ।।
कुमार संभवं 3/6
अर्थात् आपका वह शत्रु अगर शुक्राचार्य से नीतिशास्त्र पढ़ा होगा तब भी मैं अत्यन्त भोगासक्ति को दूत बनाकर उसके पास भेजता हूँ ,जो उसका धर्म और अर्थ दोनों उसी प्रकार नष्ट कर देगा, जैसे बरसात में बढ़ी हुई नदी का वेग दोनों तटों को ढहा देता है ।
समाज में परस्पर वैमनस्य एवं हत्या आदि बुराईयों की जड़ धन है। धन की लालसा एवं आसक्ति व्यक्ति के अधः पतन का कारण है। अतः अर्थ पुरूषार्थ हेतु सीमाएं निर्धारित कर ही प्रयास करना चाहिये।
काम - काम में जिस सात्विकता एवं श्रद्धा की भावना को सम्मान देकर उसे पुरूषार्थ माना गया था ,वह काम आज मात्र कामसुख (sex) में परिवर्तित हो गया है। निठारी काण्ड , बलात्कार, कम उम्र में सम्बन्ध करना, विवाहेतर सम्बन्ध आदि -इस पुरूषार्थ की सात्विकता को खण्डित करते हैं।
कालिदास ने भी काम पुरूषार्थ को भोग विलास के लिये नहीं बल्कि संतानोपत्ति के लिये माना है। वे कहते है -
प्रजायै गृहमेधिनाम्।
अर्थात् संतान उत्पन्न करने के लिए विवाह करते थे ।
रघुवंशम्. 1/7
परिणेतुः प्रसूतये।
अर्थात् संतान उत्पन्न करके वंश चलाने की इच्छा से ही उन्होंने विवाह किया था ।
रघु. 1/25
कालिदास के सम्बन्ध में कुछ विद्वानों का आक्षेप है कि उनके साहित्य में काम सम्बंधी वर्णनों की अधिकता है ।कुमार सम्भवम् के अट्ठारहवें सर्ग के कारण उनकी निन्दा भी की गई किन्तु यदि देखा जाय तो माता पिता स्वरूप पार्वती एवं शिव के श्रृंगारिक वर्णन द्वारा भी कवि यह संकेत करता है कि कामदेव को भस्म करने के पश्चात् पुत्र प्राप्ति हेतु ही उन्होंने पार्वती से विवाह किया था। तथा पार्वती जी का मन एक मात्र भाव रस में रमा था कामवृत्ति से नहीं -
इयेष सा कर्तुमवन्ध्यरूपतां
समाधिमास्थाय तपोभिरात्मानः।
अवाप्यते वा कथमन्यथा द्वयं
तथाविधं प्रेम पतिश्च तादृशः ।।
कुमारसंभवम्. 5/02
अर्थात् यह सोच कर उनहोंने मन में ठान लिया कि जिसे मैं अपने रुप से नहीं रिझा सकी ,उसे अब समाधिस्थ मन से तपस्या करके प्राप्त करूंगी ।
शाकुन्तल में भी दुष्यन्त तथा विक्रमोऽर्वशीयम् में विक्रम के काम भाव को क्रमशः भरत एवं आयु नामक पुत्र प्राप्ति द्वारा धर्म से समन्वित काम रूप को स्पष्ट करने का उदाहरण प्रस्तुत किया है।
अति कामुकता का दुष्परिणाम भी कालिदास साहित्य में वर्णित है। रघु के गौरवशाली वंश में अग्निमित्र को अतिकामुकता के कारण क्षय रोग हो जाता है और अन्ततः उसे अपना राज्य एवं प्राणों को त्यागना पड़ता है।
25 वर्ष तक ब्रह्मचर्य का पालन करने की जो अवधारणा भारतीय संस्कृति में पाई जाती थी। उसका पालन पुनः प्रयत्न पूर्वक किया जाना चाहिए। काम को धर्म से समन्वित करके देखे जाने पर सभी कुप्रवतियां स्वयं नष्ट हो जायेंगी।
मोक्ष - आधुनिक समाज में मोक्ष पुरूषार्थ के लिये व्यक्ति द्वारा किया गया प्रयत्न रुप पुरूषार्थ दृष्टिगोचर नहीं होता है। हां ,आज का मनुष्य जो कुछ सत्कर्म करता है। वह इस आशा से करता है कि उसका अगला जन्म अच्छा हो। किन्तु हमें यह स्मरण रखना चाहिये कि अच्छे या बुरे कर्मों से मोक्ष नहीं प्राप्त किया जा सकता है क्योंकि फल से लिप्त होने के कारण उसे भोगने के लिये संसार में आना ही पड़ेगा। और इससे पुनर्जन्म का अन्त नहीं होगा।
अतएव कर्म बंधन से मुक्ति के लिए कालिदास ने निष्काम कर्म का सन्देश दिया है -
त्वय्यावेषितचित्तानां
त्वत्समर्पितकर्मणाम्।
गतिस्त्वं वीतरागाणाम
भूयः सन्निवृत्तये।।
रघु. 10/27
अर्थात् जो लोग सदा आपका ही ध्यान धरते हैं ,जिन्होंने अपने सब कर्म आपको ही अर्पित कर दिए हैं और जो राग द्वेष से दूर हैं ,उनको आप ही जन्म मरण के बंधन से छुड़ाते हैं ।
वस्तुतः धर्म के पालन से ही कर्मबन्धन का नाश , फलस्वरूप पुनर्जन्म की निवृत्ति संभव है -
कर्मबन्धाच्छंद धर्म भवस्येव ममुक्षवः।
जिसके द्वारा तत्वज्ञान हो मोक्ष अन्तिम मुक्ति, परमानन्द, परम शान्ति की प्राप्ति होगी। कवि ने मोक्ष के लिये मुक्ति (9), अपवर्ग (10), अनपायि पद (11), परार्ध्यगति, अनावृत्ति अवस्था, अजन्म (12) आदि शब्दों का प्रयोग किया है।
इन्द्रियों का द्वार रोककर, मन को वश में करके, ह्रदयस्थ ज्योतिस्वरूप के जानकर ही मोक्ष (13) प्राप्ति होती है -
अभ्यासनिगृहीतेन मनसा ह्रदयाश्रयम्।
ज्योतिर्मयं विचिन्वन्ति योगिनस्त्वां विमुक्तये।।
रघु. 10/23
अर्थात् प्राणायाम आदि के द्वारा मन को वश में करके मुक्ति पाने के लिए योगी लोग अपने ह्रदय में बैठे हुए ज्योतिस्वरूप आपकी ही सदा खोज करते रहते हैं ।
महाराज रघु मोक्ष पद प्राप्ति के लिये तत्वदर्शी योगियों से शास्त्रचर्चा करते थे -
अनपायि पदोपलब्धये रघुराप्तैः समिपाय योगिभिः।।
रघु. 8/17
अर्थात् रघु मोक्ष पदपाने के लिये तत्वदर्शी योगियों के साथ शास्त्रचर्चा में तल्लीन हो गए ।
कालिदास ने रघुवंशी राजा पुष्य के विषय में कहा है कि योगविद्या सीखकर संसार के आवागमन से मुक्त हो गया (14)।
अभिज्ञान शाकुन्तम् में राजा दुष्यन्त पुनर्जन्म निवृत्ति की प्रार्थना करते हुए कहते हैं -
प्रवर्ततां प्रकृतिहिताय पार्थिवः
सरस्वती श्रुतमहती महीयताम्।
ममापि च क्षपयतु नीललोहितः
पुनर्भवं परिगतशक्तिरात्मभूः।।
अभि. 7/35
अर्थात् राजा सदा अपनी प्रजा की भलाई में लगे रहें ,बड़े बड़े विद्वान् कवियों की वाणी का सर्वत्र आदर हो और अपने से ही उत्पन्न होकर चारों ओर अपनी शक्ति फैलाने वाले महादेव जी ऐसी कृपा करें कि मुझे फिर जन्म न लेना पड़े ।
आज हम सबको यही कामना करनी चाहिये। इस हेतु प्रति क्षण प्रयास द्वारा चतुर्दिक शान्ति होगी तथा मानव जाति का कल्याण होगा।
कालिदास के काव्यों से स्पष्ट है कि पुरूषार्थों का क्या स्वरूप होना चाहिए ,लेकिन इसके साथ ही साथ इन पुरूषार्थो के पालन में किस पुरुषार्थ को कैसे और कितना महत्व प्रदान करे? ऐसा विचार उत्पन्न हो, तो इसका समाधान भी दिया है।
कालिदास के अनुसार , हमें राजा अतिथि के समान बनना चाहिये। राजा अतिथि ने अर्थ और काम के लिये धर्म को नही छोड़ा और धर्म से बंधकर अर्थ और काम को नहीं त्यागा और न अर्थ के कारण काम को या काम के कारण अर्थ को ही छोड़ा अपितु धर्म अर्थ और काम तीनों के साथ वे एक सा व्यवहार करते थे-
न धर्ममर्थकामाभ्यां बबाधे न च तेन तौ।
नार्थं कामेन कामं वा सोऽर्थेन सदृषस्त्रिषु।।
रघु. 17/57
अतः कालिदास के अनुसार हमें राजा अतिथि के समान बनना चाहिये।
इस प्रकार कालिदास साहित्य से पुरूषार्थ के जिस स्वरूप पर प्रकाश पड़ता है ,वह अनुकरणीय है।
भगवती लाल पुरोहित ने कालिदास का वागार्थ पृ. 32 में लिखा है कि ‘‘रघुवंश धर्म से अर्थ और अर्थ से काम की ओर अग्रसर होती सामाजिक मनोवृत्ति के विकास की कथा है। रघु के समुन्नत वंश की जो दुर्गति रघुवंशं के अंत में दिखाई गई है उसी दुर्गति के कारण प्राचीन, प्रायः सभी राजवंशों के अंतिम राजा अतिकामुकता के कारण ही अपनी राजसत्ता और प्राणों से हाथ धो बैठे। यह अपने युग की ही नहीं युग-युग की कहानी है।’’
हमें विचार करना है कि कहीं आधुनिक समाज इसी ओर तो नहीं जा रहा? जिसका संकेत कालिदास ने किया था। और यही कारण है कि पुरूषार्थ के बदलते स्वरूप में कालिदास की प्रासंगिकता और अधिक बढ़ जाती है।
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संदर्भ सूची
1.(i) अनेन धर्मः सविषेषमद्य मे
त्रिवर्गसारः प्रतिभाति भामिनि।
त्वया मनोनिर्विषयार्थकामया
यदेक एव प्रतिगृहय सेव्यते।।
कुं.सं. 5/38
(II) कस्यार्थधर्मौ वद पीड़यामि
सिन्धोस्तटावोध इव प्रवृद्धः।
कुं.सं. 3/6
(iii) स चतुर्धा बभौ व्यस्तः प्रसवः पृथिवीपतेः।
धर्मार्थकाममोक्षाणामवतार इवांगभाक्।।
रघु. 10/84
(iv )धर्मार्थकामेषु समां प्रपेदे तथा तथैवावरजेषु वृत्तिम्।
रघु. 14/21
2.(क)आपन्नस्य विषयनिवासिनों जनस्यार्तिहरेण राज्ञा भवितव्यमित्येष वो धर्मः
तृतीय अंक पेज नं. 162 अभि. शा.
(ख) षष्ठांषवृत्तेरपि धर्म एषः।
अभि. शा. 5/4
3. रघुवंश 1/13
4. कुमार संभवं 12/53
5.दाक्षायण्या पतिव्रताधर्ममधिकृत्य पृष्टस्तस्यै महर्षिपत्नीसहितायै कथयतीति। अभिज्ञान शाकुन्तल पेज नं. 406
यह यह उल्लेखनीय है कि पति गृह जाती हुई शकुंतला को महर्षि कण्व पतिव्रता धर्म का स्वरूप बताते हैं।
6. अभि. पेज नं. 279
7. अभिज्ञान (धर्मक्रियाविघ्नः) 5/14, अभि. 7/12,(धर्माभिषेकक्रिया)
8. पेज 170अभिज्ञान
9. रघु. 10/23
10. रघु. 8/16
11. रघु. 8/17
12. रघु. 18/33
13. कुमारसंभव 3/50
14. रघु. 18/33
पुरुषार्थ के बदलते स्वरूप में कालिदास की प्रासंगिकता शीर्षक से ज्ञानायनी पुरुषार्थ चतुष्टय विशेषांक -२लखनऊ वर्ष ९अंक अप्रैल -जून २०११ ,पृष्ठ संख्या १६-२१ में प्रकाशित लेख
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