यदि किसी आम भारतीय नागरिक से यह प्रश्न पूछा जाय कि भारत के स्वतंत्रता संग्राम में संस्कृत भाषा एवं साहित्य का कुछ योगदान रहा है? तो उसका उत्तर नकारात्मक ही होगा । फिर यदि यह कहा जाय कि ’वन्दे मातरम् ’जो हमारा राष्ट्र -गीत है वह किस भाषा में रचित है ? तब उसका उत्तर होगा संस्कृत भाषा ।किन्तु संस्कृत भाषा के योगदान के संबंध में वह अनभिज्ञ ही होगा ।
उसके द्वारा यह कहा जा सकता है कि हिन्दी, बंग्ला, मराठी आदि अन्य क्षेत्रीय भाषाओं के कवि यथा निराला, दिनकर, रवींद्रनाथ ठाकुर, बंकिमचंद्र चटर्जी आदि की स्वतंत्रता आंदोलन में भूमिका रही है।जबकि इतिहास गवाह है कि भारतीय संस्कृति की रक्षा, भारतीयता एवं स्वतंत्रता हेतु प्रथम प्रयास संस्कृत की ही देन है।
भारत में अंग्रेजों के आगमन के साथ ही संस्कृत एवं अंग्रेजी भाषा में परस्पर टकराव की स्थिति बनी क्योंकि अंग्रेज यह जानते थे कि अंग्रेजी भाषा का प्रसार एवं अंग्रेजी शासन संस्कृत के मूलोच्छेदन के पश्चात ही संभव है ।
अतः अंग्रेजों ने संस्कृत ;जो राजभाषा थी ,को हटाकर अंग्रेजी को राजकाज की भाषा घोषित किया । संस्कृतज्ञों ने इसका तीव्र विरोध किया ।संस्कृत भाषा के माध्यम से क्रांतिकारी संस्कृतज्ञों ने जनसमुदाय को संगठित किया, पत्रकारिता के माध्यम से चेतना जगाई एवं साहित्यिक रचनाओं के माध्यम से राष्ट्र प्रेम की भावना का विस्तार किया ।वही स्वतंत्रता आंदोलन का बीज था तथा जिसका अंकुरण 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के रूप में हुआ ।
हिन्दी, बंग्ला, मराठी आदि अन्य क्षेत्रीय भाषाओं के कवि यथा निराला, दिनकर, रवींद्रनाथ ठाकुर, बंकिमचंद्र चटर्जी आदि की स्वतंत्रता आंदोलन में भूमिका मुख्यतः साहित्यकार के रूप में रही है तथा उन्हें उस रूप में गौरव भी प्राप्त हुआ है। किन्तु संस्कृत कवियों ने पत्रकारिता एवं साहित्य रचना के साथ साथ एक क्रांतिकारी के रूप में भी स्वतंत्रता आंदोलन में योगदान दिया । उनकी अनेक रचनाएं जेल में लिखी गईं । संस्कृत पत्रकारिता को भी अंग्रेजों का कोप भाजन बनना पडा तथा अनेक पत्रिकाएं अंग्रेजों द्वारा बलपूर्वक बंद कराई गईं ।
संस्कृत भाषा और कवियों एवं क्रांतिकारी साहित्यकारों के स्वाधीनता संग्राम सम्बन्घी इन सब प्रमाणिक सत्यों से यह स्पष्ट होता है कि भारतीय संस्कृति की रक्षा एवं भारत की स्वतंत्रता प्रााप्ति के केन्द्र में संस्कृत भाषा ही रही है ।
भारत के स्वतंत्रता संग्राम में संस्कृत भाषा ,कवियों एवं क्रांतिकारी साहित्यकारों के योगदान को रेखांकित करना ,उससे जनसामान्य को अवगत कराना ,जिससे संस्कृत भाषा के उन क्रांतिकारी साहित्यकारों को भी सम्मान प्राप्त हो सके ,ही प्रस्तुत शोध की परिकल्पना है।
राजभाषा संस्कृत एवं अंग्रेजी शासन
अट्ठारहवी शताब्दी के उत्तरार्द्ध में ब्रिटिशराज की स्थापना हुई तथा 1772 में वारेन हेस्टिंग्स बंगाल का गवर्नर होकर आया । उसने 1784 ई.में एशियाटिक सोसायटी की स्थापना की तथा यह उद्घोषित किया कि हिन्दू बहुल भारत की राजभाषा संस्कृत होगी । भारतीयों तथा यूरोपीय विद्वानों ने संस्कृत एवं अंग्रेजी भाषा में मिल जुल कर कार्य किया । यूरोपीय विद्वानों जैसे मैक्समूलर , ग्रिफिथ ने संस्कृत अनुसंधान संबंधी अनेक कार्य किये वहीं भारतीयों में इंग्लैंडीय व्याकरणसार (मधुसूदन तर्कालंकार) अंग्रेजचंद्रिका (विनायक भट्ट), संस्कृत में न्यू टेसटामेण्ट का तीन खण्डों मंे प्रकाशन आदि अनेक कार्य किये ।
वारेन हेस्टिंग्स ने भारतीयों की न्याय ; धर्मषास्त्र द्धव्यवस्था के लिये संस्कृत को ही उपयुक्त माना । सभी अंग्रेज प्रशासकों के लिए संस्कृत ज्ञान अनिवार्य कर दिया। न्यायधीष के रूप में संस्कृत के पंडित ही नियुक्त होते थे । यूरोपीय अधिकारी तथा संस्कृत पंडित के मध्य संस्कृत में ही पत्राचार होता था । प्रो. हीरालाल शुक्ल ने अपनी पुस्तक ‘संस्कृत का समाजशास्त्र’ पृष्ठ सं. 62 पर मध्यप्रदेश से संबद्ध एक प्रमाण उद्धृत किया है जिसमें मण्डला के पंडित रामचंद्र ने मध्यप्रदेश के सीहोर नामक स्थान में कमिश्नर विलकिंसन को 1836 में संस्कृत भाषा में एक पत्र लिखा है जिस पत्र से निम्न मुख्य बातें स्पष्ट होती हैं कि
1. दोनों के मध्य संस्कृत में ही पत्र लिखने की परंपरा थी ।
2.पत्र के माध्यम से मंडला में संस्कृत शिक्षक की नियुक्ति, शिक्षा की स्थिति आदि समाचार प्रेषित किये गये हैं ।
3.जिसका जवाब विल्किंसन महोदय ने 12 श्लोकों में दिया है ।
दिल्ली के national Archives में सुरक्षित-Saskrit Documents Vol 2 Records In Oriental Languages -फाइलों से स्पष्ट है हिन्दू राजाओं के साथ ब्रिटिश शासकों के पत्र व्यवहार संस्कृत में ही होते थे ।
7 मार्च 1835 में लार्ड मेकाले की शिक्षा नीति के द्वारा अंग्रेजी को राजभाषा घोषित किया गया । इस घोषणा का संस्कृतज्ञों ने अत्यधिक विरोध किया तथा यहीं से अंग्रेजी एवं अंग्रेजों के प्रति संस्कृत का विद्रोह प्रारंभ हुआ ।
लार्ड मैकाले की शिक्षा नीति का संस्कृतज्ञों ने अत्यधिक विरोध किया। आम सभा हुई । कलकत्ता के नागरिकों ने दस हजार लोगों के हस्ताक्षर सहित एक विरोध पत्र कोट ऑफ डायरेक्टर्स के पास भेजा । प्रेमचंद्र तर्कालंकार एवं जयगोपाल तर्कालंकार कलकत्ता के संस्कृत कालेज में प्राध्यापक थे उन्होंने इस आंदोलन में अहम् भूमिका निभाई । 7 अप्रैल 1835 में एच.विल्सन को लिखे पत्र में उन्होंने मैकाले पर कटाक्ष करने का साहस किया है -
गोलश्रीदीर्घिकायाः बहुविटपि तले कालिकत्तानगर्यां
निःसंगो वर्तते संस्कृतपठनगृहाख्यः कुरंगः कृशांगः ।
हर्न्तुं नं धीरचित्तं विधृतरवरशरो मेकले व्याधराजः ।
साधु ब्रूते भो भो विल्सन महाभाग । मां रक्ष रक्ष ।।
;विनयघोष , विद्यासागर और बंगाली समाज, बंगलाखण्ड 2 प्रथम संस्करण, पृष्ठ 167 से उद्धृत
किन्तु इन तमाम प्रयासों का अंग्रेजों पर कोई प्रभाव पड़ता न देखकर संस्कृत कालेज के छात्रों में रोष फैल गया तथा संस्कृत कालेज के छात्रों का साथ हिंदू कालेज के छात्रों ने दिया। हिंदू कालेज के छात्र सोलह वर्षीय कैलाशचंद्र पंत ने छात्रों की सेना लेकर कलकत्ता में ब्रिटिश अधिकारियों पर धावा बोल दिया । इस हमले में सैंकड़ों छात्र मारे गये जिसका उल्लेख कलकत्ता लिटरेरी रिव्यू पृष्ठ 355 पर है । अनेक लोगों को बंदी बनाया गया तथा श्री दत्त को फांसी की सजा हुई । यहीं से संस्कृत और भारतीय संस्कृति की रक्षा के लिए जनमानस में राष्ट्रीय भावना का संचार हुआ । जो धीरे-धीरे फैलता गया।
अतः जब संस्कृत को राजभाषा के पद से हटाया गया उसे ही स्वतंत्रता संग्राम का बीज मानना चाहिये जिसका अंकुरण 1857 में हुआ ।
संस्कृत पत्रकारिता एवं स्वाधीनता संग्राम
संस्कृत की रक्षा के लिये प्रांरम्भ हुए आन्दोलन ने संस्कृत पत्रकारिता की नई धारा को जन्म दिया। क्योकि तत्कालीन समय में संस्कृत ही समूचे देश की सम्पर्क भाषा थी तथा यही एकमात्र भाषा थी जिसने अंग्रेजों के विरूद्ध भारतीयों में देश प्रेम उत्पन्न किया।काशी विद्या सुधानिधि अथवा पण्डित (1866)नामक मासिक पत्रिका ;संस्कृत की प्रथम पत्रिका है । ब्रिटिश शासन काल में संस्कृत की लगभग 300 पत्र पत्रिकायें प्रकाशित हुईं ।संस्कृत चंन्द्रिका ,सूनृतवादिनी ज्योतिष्मती जैसी पत्रिकाये जो स्वतंत्रता संग्राम के यज्ञ में आहूति दे रही थी ,अंग्रेजों द्वारा बन्द कराई गई । इसी प्रकार जयन्ती के सम्पादक कोमल मारूताचार्य तथा स्वामी लक्ष्मीनन्दन को राजद्रोह के अपराध में कारागार में डाल दिया गया।
वस्तुतः इन पत्रिकाओं में जहां एक ओर क्रान्ति का उद्घोष था तो वही दूसरी ओर वर्तमान दुर्दशा पर क्षोभ एवं राष्ट्र -प्रेम की पुकार भी थी । चाहे कथन की आलोचना हो या बंगभंग का विरोध अथवा स्वदेशी आंदोलन हेतु जनता का आहवाहन या तिलक को सक्षम करावास का दण्ड सभी विषयों पर इन पत्रकारों ने निर्भीकता एवं कर्तव्यनिष्ठा के साथ लिखा ।
संस्कृत चन्द्रिका के सम्पादकीय लेखों को पढ़ने से ऐसा प्रतीत होता है जैसे उसके प्रत्येक शब्द में आग भरी हुई हो । 2 मई 1907 के सूनृतवादिनी के सम्पादकीय में क्लाइव को लुटेरा बताते हुये अप्पाशास्त्री कहते हैं -
एतत् खलु स्मारयन्नानाविधानि कपटजालानि यस्यैव दौरात्म्याद्विप्रलब्धः श्रीमानमी चन्दा्रे नाम । स एवायं यस्य खलु व्यापारः समपातयत् पारतन्त्रयसबन्धने यवनानामपि राज्यानि ।
स्वतंत्रता संग्राम कालीन संस्कृत साहित्य
1835 से लेकर भारत की आजादी तक अनेक महाकाव्यों ,गीतिकाव्यों, नाटकों एंव गद्य साहित्य में राष्ट्रीय भावना वर्णित है । यहां यह उल्लेखनीय है संस्कृत कवियों द्वारा रचित अनेक काव्यों की रचना कारावास में हुई । सत्याग्रह नीतिकाव्य (1939) काव्य की रचना श्री सत्यदेव वशिष्ठ ने हैदराबाद जेेल में रहकर की । संस्कृत कवि निर्भय जी ने फरूखाबाद बैक षडयन्त्र, अलीगढ़ बम विस्फोट आदि कई योजनाओं का नेतृत्व किया था । इनका बहुत सा काव्य कारागार में लिखा गया । इनकी प्रमुख रचनाये हैं परिवर्तनम्, क्रान्तिः, शंखनादः, राष्ट्रध्वनिः, अग्रगामिनं प्रति इत्यादि । महायोगी अरविन्द का संस्कृत काव्य भवानी भारती स्वतंत्रता संग्राम के यज्ञ में एक सार्थक आहुति है ।मई 1908 में कलकत्ता पुलिस ने इनकी पाण्डुलिपि को जब्त कर लिया था ।
इस प्रकार स्वाधीनता संग्राम काल में रचा साहित्य क्रांतिकारियों एवं साहित्यकारों द्वारा रचित साहित्य है । इस काल के साहित्य में देश प्रेम विभिन्न रूपों में दिखाई पडता है । जैसे-
1. स्वर्णिम अतीत तथा जन्मभूमि के प्रति प्रेम - "भारतस्तवः "नामक श्रीधर पाठक की रचना में जन्मभूमि के प्रति प्रेम स्पष्ट दिखाई देता है -
वन्दे भारतदेशमुदारम् सुषमा-सदन- सकल-सुख-सारम्
भाल-विशाल-हिमाचल-भ्राजम् चरण-विराजित- अर्णवराजम्
तप-धृत-सहस-कोटि-करवालम् दुःसह-दुराप-प्रताप-विशालम् ।
2 . वर्तमान स्थिति पर क्षोम - अकालपीड़ित देश की भयावह दशा का चित्र देखिये -
एकं तन्मृतनग्नांगं निष्प्रच्छदमातपशीतम् ।
योरपगृध्राणामेंककवलमहहा रक्तच्युतिदिग्धम्
एकं प्रेतवनं तद् यत्र न कश्चिच्छोकालापी
को भ्राम्यन्नात्मा, यस्य न गेह: कोs पि क्वापि ।
शंखनादः पृ. 180
अर्थ - ; सारा देश एक नंगा आदमी बन गया है,जो धूप व शीत में बिना ओढनी के खडा है। उसकी देह से रक्त बह रहा है। योरेप के गीधों का वह कौर हो गया है। वह एक ष्ष्मषान है,जहॉं कोई रोने वाला नहीं है।वह एक भटकती आात्मा है,जिसका कोई घर नहीं है।
खून पसीने में लथपथ किसानों की दुर्दशा दृष्टव्य है
दिनेषु तरूणातपाननुमयूखतापत्रय
ज्ज्वलाविलकलेवरान् कृषिकरान् विलीनानिव।
विलोक्य निशि शैशरानिलहतीद्धकम्पाकुलान् ।
न कस्य खलु मानसं भुवि सचेतसो दूयते ।
3 .समाज सुधार - दहेज प्रथा पर प्रहार देखिये-
अहो दयालुत्वमतः परं किं
यथेहितं तद् द्रविणं गृहीत्वा ।
निन्द्यानपि त्वं विमलं करोषि
तदीय कन्यापरपीडनेन ।।
4 .संस्कृत भाषा के प्रति प्रेम -
ये तु केचिदिमां दिव्यां भारतीममृतामपि
मृतां वदन्तो निन्दन्ति दूरात्परिहरन्ति च।
मूढास्ते पण्डितमन्या बालास्ते वृद्धमानिनः।
अन्धास्ते दृष्टिमन्तो पि प्राप्ता गजनिमीलिकाम्।।
5 . अंग्रेजों के विरूद्ध विद्रोह- तिलक के हाथों में हथकडी लग गई है ,जो दूषण होने के बजाय भूषण हो गयी-
निगदन्तु निसर्गदुधियो निगडं दूषणमित्यमुं तव ।
अपरं स तथापि भूषणं भवतो येन विषिष्य पूज्यते।।
6 . क्रान्ति के स्वर - ‘करो या मरो’ के भाव का शंखनाद प्रस्तुत श्लोक में दर्शनीय है ।
यद्यस्ति जीवितव्यं, क्राम्याम देहलीं तत्
यद्यस्ति वर्तितव्यं क्राम्याम देहलीं तत्
यद्यस्ति कर्म कार्यं , क्राम्याम देहलीं तत्
यद्यस्ति लभ्यमन्नं क्राम्याम देहलीं तत् ।।
1940 में प्रकाशित देवभाषा संकलन से
7 . देश प्रेम का आहवाहन -
उतिष्ठ भो जागृहि सर्जयाग्नीन् साक्षादधि तेजोसि परस्य षौरेः।श्
वक्षः स्थितेनैव सनातनेन ष्षत्रून् हुताषेन दहन्नटस्व ।।
4- स्वाधीनता संग्राम के नायकों पर आधारित साहित्य
स्वतंत्रता संग्राम के का्रंतिकारी वीरों को नायक रूप में वर्णित करके अनेक काव्यांे की रचना हुई जिनके द्वारा उनके कृत्यों को स्वर्णाक्षरों में लिखा गया। जिनमें से प्रमुख इस प्रकार है:- मोहन दास करमचन्द गांधी पर श्री साधुशरण मिश्र कृत गान्धिचरितम् महाकाव्य,ब्रजानन्द कृत गान्धिचरितषतक काव्य ,मधुकरशास्त्री कृत गान्धिगाथा, रतिनाथ कृत गांधिशतक ,वी. ष्षास्त्री कृत महात्मा-विजयःआदि।अन्य राप्टीय विभूतियों पर रचित अन्य काव्य है-नेहरूजी पर अयोध्या प्रसाद शास्त्री कृत नेहरूदयम् महाकाव्य, रमेषचन्द्र शुक्ल कृत लालबहादुरशास्त्रिचरितम् ,कृष्ण शर्मा चितले कृत लोकमान्य चरितम्, शिवप्रसाद भारद्वाज कृत महाकाव्य लौहपुरूषवदानम्, गंजानन पलसुले कृत विवेकानन्दचरितम् ,श्रीधर पाठक कृत श्री गोखलेप्रशस्ति इत्यादि प्रमुख है ।
इन वीरों को नायक के रूप में प्रतिष्ठित करने के साथ साथ इन रचनाओं में उच्चकोटि के साहित्यिक गुण भी प्राप्त होते है । एक रचना में महाभारत के युद्ध के कर्णधार एवं विष्णु के अवतार कृष्ण से गांधी जी की समानता करते हुये उन्हें भी विष्णु का अवतार माना गया है । क्योकि जैसे कृष्ण भगवान के हाथ में सुदर्शन चक्र है वैसे ही गांधी जी चरखा (चक्र) चलाते हैं ।
स्वंतत्रता संग्राम के वीरों को नायक के रूप में संस्कृत साहित्यकारों ने प्रतिष्ठित किया है । उनके नायकत्व की समीक्षा ही प्रस्तुत अध्याय का विषय है।
उपसंहारः
भारत की संस्कृति जिस प्रकार संस्कृत भाषा में रची बसी है और संस्कृत भाषा से अलग करके भारतीय संस्कृति को समझा नही जा सकता है उसी प्रकार भारत के स्वतंत्रता संग्र्राम को संस्कृत भाषा एवं साहित्य से अलग करके देखने से स्वतंत्रता संग्राम का एकांगी स्वरूप ही स्पष्ट हो पाता है। क्योंकि भारतीय संस्कृति एवं स्वंतत्रता संग्राम का मूल स्त्रोत संस्कृत भाषा ही है । संस्कृत एवं अंग्रेजी भाषा के साथ पूरब एवं पश्चिमी संस्कृति के मध्य जो टकराव की स्थिति बनी वह मुख्यतया संस्कृत पर कुठाराधात करने का फल था । जिसके कारण संस्कृतज्ञों ने भारत के गौरवमय इतिहास को प्रतिस्थापित किया और विदेशी शासन के खिलाफ संधर्ष का शंखनाद किया ।
संस्कृत का यह स्वतंत्रता संग्राम जो भारत के स्वतंत्रता संग्राम में परिणत हुआ का ज्ञान सामान्य जनमानस को नही है । जिस संस्कृत को अंग्रेज धर्म अनुष्ठान एवं रुढिवादिता से सम्बन्धित तथा मृत समझते थे उसी भाषा की चेतना के कारण उन्हे देष छोडना पडा। अपनी अस्मिता एवं भारतीयता की रक्षा के लिये संस्कृतज्ञों का यह प्रयास ,तथा संस्कृत भाषा एवं साहित्य की विरासत की इस नई धारा को हम भारतीयों को समझना एवं समझाना चाहिये । जिससे हम भारत के गौरवमय इतिहास पर गर्व कर सकें ।
यदि किसी आम भारतीय नागरिक से यह प्रश्न पूछा जाय कि भारत के स्वतंत्रता संग्राम में संस्कृत भाषा एवं साहित्य का कुछ योगदान रहा है? तो उसका उत्तर नकारात्मक ही होगा । फिर यदि यह कहा जाय कि "वन्दे मातरम् ’जो हमारा राष्ट्रगीत है ,वह किस भाषा में रचित है ? तब उसका उत्तर होगा संस्कृत भाषा ।
किन्तु संस्कृत भाषा के योगदान के संबंध में वह अनभिज्ञ ही होगा ।उसके द्वारा यह कहा जा उसकता है कि हिन्दी, बंग्ला, मराठी आदि अन्य क्षेत्रीय भाषाओं के कवि यथा निराला, दिनकर, रवींद्रनाथ ठाकुर, बंकिमचंद्र चटर्जी आदि की स्वतंत्रता आंदोलन में भूमिका रही है।
जबकि इतिहास गवाह है कि भारतीय संस्कृति की रक्षा, भारतीयता एवं स्वतंत्रता हेतु प्रथम प्रयास संस्कृत की ही देन है।
भारत में अंग्रेजों के आगमन के साथ ही संस्कृत एवं अंग्रेजी भाषा में परस्पर टकराव की स्थिति बनी क्योंकि अंग्रेज यह जानते थे कि अंग्रेजी भाषा का प्रसार एवं अंग्रेजी शासन संस्कृत के मूलोच्छेदन के पश्चात ही संभव है ।
अतः अंग्र्रेजों ने संस्कृत (जो राजभाषा थी)को हटाकर अंग्रेजी को राजकाज की भाषा घोषित किया । संस्कृतज्ञों ने इसका तीव्र विरोध किया ।संस्कृत भाषा के माध्यम से क्रांतिकारी संस्कृतज्ञों ने जनसमुदाय को संगठित किया, पत्रकारिता के माध्यम से चेतना जगाई एवं साहित्यिक रचनाओं के माध्यम से राष्ट्र प्रेम की भावना का विस्तार किया ।वही स्वतंत्रता आंदोलन का बीज था तथा जिसका अंकुरण 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के रूप में हुआ ।
हिन्दी, बंग्ला, मराठी आदि अन्य क्षेत्रीय भाषाओं के कवि यथा निराला, दिनकर, रवींद्रनाथ ठाकुर, बंकिमचंद्र चटर्जी आदि की स्वतंत्रता आंदोलन में भूमिका मुख्यतः साहित्यकार के रूप में रही है तथा उन्हें उस रूप में गौरव भी प्राप्त हुआ है।
किन्तु संस्कृत कवियों ने पत्रकारिता एवं साहित्य रचना के साथ साथ एक क्रांतिकारी के रूप में भी स्वतंत्रता आंदोलन में योगदान दिया । उनकी अनेक रचनाएं जेल में लिखी गईं । संस्कृत पत्रकारिता को भी अंग्रेजों का कोप भाजन बनना पडा तथा अनेक पत्रिकाएं अंग्रेजों द्वारा बलपूर्वक बंद कराई गईं ।
संस्कृत भाषा और कवियों एवं क्रांतिकारी साहित्यकारों के स्वाधीनता संग्राम सम्बन्घी इन सब प्रमाणिक सत्यों से यह स्पष्ट होता है कि भारतीय संस्कृति की रक्षा एवं भारत की स्वतंत्रता प्रााप्ति के केन्द्र में संस्कृत भाषा ही रही है ।
1- राजभाषा संस्कृत एवं अंग्रेजी शासन
अट्ठारहवी शताब्दी के उत्तरार्द्ध में ब्रिटिशराज की स्थापना हुई तथा 1772 में वारेन हेस्टिंग्स बंगाल का गवर्नर होकर आया । उसने 1784 ई.में एशियाटिक सोसायटी की स्थापना की तथा यह उद्घोषित किया कि हिन्दू बहुल भारत की राजभाषा संस्कृत होगी । भारतीयों तथा यूरोपीय विद्वानों ने संस्कृत एवं अंग्रेजी भाषा में मिल जुल कर कार्य किया । यूरोपीय विद्वानों जैसे मैक्समूलर, ग्रिफिथ ने संस्कृत अनुसंधान संबंधी अनेक कार्य किये वहीं भारतीयों में इंग्लैंडीय व्याकरणसार (मधुसूदन तर्कालंकार) अंग्रेजचंद्रिका (विनायक भट्ट), संस्कृत में न्यू टेसटामेण्ट का तीन खण्डों में प्रकाशन आदि अनेक कार्य
किये ।
वारेन हेस्टिंग्स ने भारतीयों की न्याय (धर्मशास्त्र)व्यवस्था के लिये संस्कृत को ही उपयुक्त माना । सभी अंग्रेज प्रशासकों के लिए संस्कृत ज्ञान अनिवार्य कर दिया। न्यायधीश के रूप में संस्कृत के पंडित ही नियुक्त होते थे । यूरोपीय अधिकारी तथा संस्कृत पंडित के मध्य संस्कृत में ही पत्राचार होता था । प्रो. हीरालाल शुक्ल ने अपनी पुस्तक ‘संस्कृत का समाजशास्त्र’ पृष्ठ सं. 62 पर मध्यप्रदेश से संबद्ध एक प्रमाण उद्धृत किया है जिसमें मण्डला के पंडित रामचंद्र ने मध्यप्रदेश के सीहोर नामक स्थान में कमिश्नर विल्किन्सन को 1836 में संस्कृत भाषा में एक पत्र लिखा है जिस पत्र से निम्न मुख्य बातें स्पष्ट होती हैं कि
1. दोनों के मध्य संस्कृत में ही पत्र लिखने की परंपरा
थी ।
2.पत्र के माध्यम से मंडला में संस्कृत शिक्षक की नियुक्ति, शिक्षा की स्थिति आदि समाचार प्रेषित किये गये हैं ।
3.जिसका जवाब विल्किन्सन महोदय ने 12 श्लोकों में दिया
है ।
दिल्ली के नेशनल Archives मे में सुरक्षित -sanskrit documents vol. 2 records in oriental languages - की फाइलों से स्पष्ट है हिन्दू राजाओं के साथ ब्रिटिश शासकों के पत्र व्यवहार संस्कृत में ही होते थे ।
7 मार्च 1835 में लार्ड मेकाले की शिक्षा नीति के द्वारा अंग्रेजी को राजभाषा घोषित किया गया । इस घोषणा का संस्कृतज्ञों ने अत्यधिक विरोध किया तथा यहीं से अंग्रेजी एवं अंग्रेजों के प्रति संस्कृत का विद्रोह प्रारंभ हुआ ।
लार्ड मैकाले की शिक्षा नीति का संस्कृतज्ञों ने अत्यधिक विरोध किया। आमसभा हुई । कलकत्ता के नागरिकों ने दस हजार लोगों के हस्ताक्षर सहित एक विरोध पत्र कोट ऑफ डायरेक्टर्स के पास भेजा । प्रेमचंद्र तर्कालंकार एवं जयगोपाल तर्कालंकार कलकत्ता के संस्कृत कालेज में प्राध्यापक थे उन्होंने इस आंदोलन में अहम् भूमिका निभाई । 7 अप्रैल 1835 में एच.विल्सन को लिखे पत्र में उन्होंने मैकाले पर कटाक्ष करने का साहस किया है -
गोलश्रीदीर्घिकायाः बहुविटपि तले कालिकत्तानगर्यां
निःसंगो वर्तते संस्कृतपठनगृहाख्यः कुरंगः कृशांगः ।
हर्न्तुं नं धीरचित्तं विधृतरवरशरो मेकले व्याधराजः ।
साधु ब्रूते भो भो विल्सन महाभाग । मां रक्ष रक्ष ।।
(विनयघोष , विद्यासागर और बंगाली समाज, बंगलाखण्ड 2 प्रथम संस्करण, पृष्ठ 167 से उद्धृत )
किन्तु इन तमाम प्रयासों का अंग्रेजों पर कोई प्रभाव पड़ता न देखकर संस्कृत कालेज के छात्रों में रोष फैल गया तथा संस्कृत कालेज के छात्रों का साथ हिंदू कालेज के छात्रों ने दिया। हिंदू कालेज के छात्र सोलह वर्षीय कैलाशचंद्र पंत ने छात्रों की सेना लेकर कलकत्ता में ब्रिटिश अधिकारियों पर धावा बोल दिया । इस हमले में सैंकड़ों छात्र मारे गये जिसका उल्लेख कलकत्ता लिटरेरी रिव्यू पृष्ठ 355 पर है । अनेक लोगों को बंदी बनाया गया तथा श्री दत्त को फांसी की सजा हुई । यहीं से संस्कृत और भारतीय संस्कृति की रक्षा के लिए जनमानस में राष्ट्रीय भावना का संचार हुआ । जो धीरे-धीरे फैलता गया।
अतः जब संस्कृत को राजभाषा के पद से हटाया गया उसे ही स्वतंत्रता संग्राम का बीज मानना चाहिये जिसका अंकुरण 1857 में हुआ ।
संस्कृत पत्रकारिता एवं स्वाधीनता संग्राम
संस्कृत की रक्षा के लिये प्रांरम्भ हुए आन्दोलन ने संस्कृत पत्रकारिता की नई धारा को जन्म दिया। क्योंकि तत्कालीन समय में संस्कृत ही समूचे देश की सम्पर्क भाषा थी तथा यही एकमात्र भाषा थी जिसने अंग्रेजों के विरूद्ध भारतीयों में देश प्रेम उत्पन्न किया।
काशी विद्या सुधानिधि अथवा पण्डित (1866) नामक मासिक पत्रिका ;संस्कृत की प्रथम पत्रिका है । ब्रिटिश शासन काल में संस्कृत की लगभग 300 पत्र पत्रिकायें प्रकाशित हुईं ।संस्कृत चंन्द्रिका ,सूनृतवादिनी, ज्योतिष्मती जैसी पत्रिकाये जो स्वतंत्रता संग्राम के यज्ञ में आहूति दे रही थी ,अंग्रेजों द्वारा बन्द कराई गई । इसी प्रकार जयन्ती के सम्पादक कोमल मारूताचार्य तथा स्वामी लक्ष्मीनन्दन को राजद्रोह के अपराध में कारागार में डाल दिया गया।
वस्तुतः इन पत्रिकाओं में जहां एक ओर क्रान्ति का उद्घोष था तो वही दूसरी ओर वर्तमान दुर्दशा पर क्षोभ एवं राष्ट्र प्रेम की पुकार भी थी । चाहे कथन की आलोचना हो या बंगभंग का विरोध अथवा स्वदेशी आंदोलन हेतु जनता का आहवाहन या तिलक को सक्षम करावास का दण्ड सभी विषयों पर इन पत्रकारों ने निर्भीकता एवं कर्तव्यनिष्ठा के साथ लिखा ।
संस्कृत चन्द्रिका के सम्पादकीय लेखों को पढ़ने से ऐसा प्रतीत होता है- जैसे उसके प्रत्येक शब्द में आग भरी हुई हो । 2 मई 1907 के सूनृतवादिनी के सम्पादकीय में क्लाइव को लुटेरा बताते हुये अप्पाशास्त्री कहते हैं -
एतत् खलु स्मारयन्नानाविधानि कपटजालानि यस्यैव दौरात्म्याद्विप्रलब्धः श्रीमानमीचन्द्रो नाम । स एवायं यस्य खलु व्यापारः समपातयत् पारतन्त्र्यबंधने यवनानामपि राज्यानि ।
स्वतंत्रता संग्राम कालीन संस्कृत साहित्य
1835 से लेकर भारत की आजादी तक अनेक महाकाव्यों ,गीतिकाव्यों, नाटकों एंव गद्य साहित्य में राष्ट्रीय भावना वर्णित है । यहां यह उल्लेखनीय है संस्कृत कवियों द्वारा रचित अनेक काव्यों की रचना कारावास में हुई । सत्याग्रह नीतिकाव्य (1939) काव्य की रचना श्री सत्यदेव वशिष्ठ ने हैदराबाद जेल में रहकर की । संस्कृत कवि निर्भय जी ने फरूखाबाद बैक षडयन्त्र, अलीगढ़ बम विस्फोट आदि कई योजनाओं का नेतृत्व किया था । इनका बहुत सा काव्य कारागार में लिखा गया । इनकी प्रमुख रचनाये हैं परिवर्तनम्, क्रान्तिः, शंखनादः, राष्ट्रध्वनिः, अग्रगामिनं प्रति इत्यादि । महायोगी अरविन्द का संस्कृत काव्य भवानी भारती स्वतंत्रता संग्राम के यज्ञ में एक सार्थक आहुति है ।मई 1908 में कलकत्ता पुलिस ने इनकी पाण्डुलिपि को जब्त कर लिया था ।
इस प्रकार स्वाधीनता संग्राम काल में रचा साहित्य क्रांतिकारियों एवं साहित्यकारों द्वारा रचित साहित्य है । इस काल के साहित्य में देश प्रेम विभिन्न रूपों में दिखाई पडता है । जैसे-
1. स्वर्णिम अतीत तथा जन्मभूमि के प्रति प्रेम -उदाहरणार्थ -श्रीधर पाठक की रचना भारतस्तवः में जन्मभूमि के प्रति प्रेम देखिए -
वन्दे भारतदेशमुदारम्
सुषमा-सदन- सकल-सुख-सारम्
भाल-विशाल-हिमाचल-भ्राजम्
चरण-विराजित- अर्णवराजम्
तप-धृत-सहस-कोटि-करवालम्
दुःसह-दुराप-प्रताप-विशालम् ।
2. स्वदेशी की भावना -
3. वर्तमान स्थिति पर क्षोम - अकालपीड़ित देश की भयावह दशा का चित्र देखिये -
एकम् तन्मृतनग्नांगं निष्प्रच्छदमातपशीतम् ।
योरपगृध्राणामेककवलमहहा रक्तच्युतिदिग्धम्
एकं प्रेतवनं तद् यत्र न कश्चिच्छोकालापी
को भ्राम्यन्नात्मा, यस्य न गेहः कोसपि क्वापि ।
शंखनादः पृ. 180
अर्थात् सारा देश एक नंगा आदमी बन गया है,जो धूप व शीत में बिना ओढनी के खडा है। उसकी देह से रक्त बह रहा है। योरेप के गीधों का वह कौर हो गया है। वह एक श्मशान है,जहॉं कोई रोने वाला नहीं है।वह एक भटकती आात्मा है,जिसका कोई घर नहीं है।
पसीने में लथपथ किसानों की दुर्दशा द्रष्टव्य है -
दिनेषु तरूणातपाननुमयूखतापत्रय
ज्ज्वलाविलकलेवरान् कृषिकरान् विलीनानिव।
विलोक्य निशि शैशरानिलहतीद्धकम्पाकुलान् ।
न कस्य खलु मानसं भुवि सचेतसो दूयते ।
4.समाज सुधार -दहेज प्रथा पर प्रहार देखिये-
अहो दयालुत्वमतः परं किं
यथेहितं तद् द्रविणं गृहीत्वा ।
निन्द्यानपि त्वं विमलं करोषि
तदीय कन्यापरपीडनेन ।।
अर्थात् इससे बड़ी दयालुता क्या होगी कि दूसरे के घर की लड़की घर में लाने के लिए तुम इच्छानुसार द्रव्य लेते हो और फिर उसे सता सता कर निंद्य लोगों को भी विमल बना देते हो ।
5.संस्कृत भाषा के प्रति प्रेम -
ये तु केचिदिमां दिव्यां भारतीममृतामपि
मृतां वदन्तो निन्दन्ति दूरात्परिहरन्ति च।
मूढास्ते पण्डितमन्या बालास्ते वृद्धमानिनः।
अन्धास्ते दृष्टिमन्तो सपि प्राप्ता गजनिमीलिकाम्।।
6. अंग्रेजों के विरूद्ध विद्रोह-
हथकडी तिलक के हाथों में पडकर दूषण होने के बजाय भूषण हो गयी-
निगदन्तु निसर्गदुधियो निगडं दूषणमित्यमुं तव ।
अपरं स तथापि भूषणं भवतो येन विशिष्य पूज्यते।।
7. क्रान्ति के स्वर - ‘करो या मरो’ के भाव का शंखनाद प्रस्तुत श्लोक में दर्शनीय है ।
यद्यस्ति जीवितव्यं, क्राम्याम देहलीं तत्
यद्यस्ति वर्तितव्यं क्राम्याम देहलीं तत्
यद्यस्ति कर्म कार्यं, क्राम्याम देहलीं तत्
यद्यस्ति लभ्यमन्नं क्राम्याम देहलीं तत् ।।
1940 में प्रकाशित देवभाषा संकलन से
'करो या मरो 'के भाव का शंखनाद प्रस्तुत श्लोक में दर्शनीय
है ।
8. देश प्रेम का आहवाहन -
उतिष्ठ भो जागृहि सर्जयाग्नीन्
साक्षादधि तेजोसि परस्य षौरेः।
श्वक्षः स्थितेनैव सनातनेन
ष्षत्रून् हुताषेन दहन्नटस्व ।।
स्वाधीनता संग्राम के नायकों पर आधारित साहित्य
स्वतंत्रता संग्राम के क्रान्तिकारी वीरों को नायक रूप में वर्णित करके अनेक काव्यों की रचना हुई जिनके द्वारा उनके कृत्यों को स्वर्णाक्षरों में लिखा गया। जिनमें से प्रमुख इस प्रकार है:- मोहन दास करमचन्द गांधी पर श्री साधुशरण मिश्र कृत गान्धिचरितम् महाकाव्य,ब्रजानन्द कृत गान्धिचरितषतक काव्य ,मधुकरशास्त्री कृत गान्धिगाथा, रतिनाथ कृत गान्धिशतक,वी. ष्षास्त्री कृत महात्मा-विजयःआदि।अन्य राप्टीय विभूतियों पर रचित अन्य काव्य है-नेहरूजी पर अयोध्या प्रसाद शास्त्री कृत नेहरूदयम् महाकाव्य, रमेशचन्द्र शुक्ल कृत लालबहादुरशास्त्रिचरितम् ,कृष्ण शर्मा चितले कृत लोकमान्य चरितम्, शिवप्रसाद भारद्वाज कृत महाकाव्य लौहपुरूषवदानम्,गजानन पलसुले कृत विवेकानन्दचरितम् ,श्रीधर पाठक कृत श्री गोखलेप्रशस्ति इत्यादि प्रमुख है ।
इन वीरों को नायक के रूप में प्रतिष्ठित करने के साथ साथ इन रचनाओं में उच्चकोटि के साहित्यिक गुण भी प्राप्त होते है । एक रचना में महाभारत के युद्ध के कर्णधार एवं विष्णु के अवतार कृष्ण से गांधी जी की समानता करते हुये उन्हें भी विष्णु का अवतार माना गया है । क्योकि जैसे कृष्ण भगवान के हाथ में सुदर्शन चक्र है वैसे ही गांधी जी चरखा (चक्र) चलाते हैं ।
स्वंतत्रता संग्राम के वीरों को नायक के रूप में संस्कृत साहित्यकारों ने प्रतिष्ठित किया है जो साहित्य में एक नए परिवर्तन को दर्शाता है ।
उपसंहार
भारत की संस्कृति जिस प्रकार संस्कृत भाषा में रची बसी है और संस्कृत भाषा से अलग करके भारतीय संस्कृति को समझा नहीं जा सकता है ,उसी प्रकार भारत के स्वतंत्रता संग्र्राम को संस्कृत भाषा एवं साहित्य से अलग करके देखने से स्वतंत्रता संग्राम का एकांगी स्वरूप ही स्पष्ट हो पाता है। क्योंकि भारतीय संस्कृति एवं स्वंतत्रता संग्राम का मूल स्त्रोत संस्कृत भाषा ही है । संस्कृत एवं अंग्रेजी भाषा के साथ पूरब एवं पश्चिमी संस्कृति के मध्य जो टकराव की स्थिति बनी वह मुख्यतया संस्कृत पर कुठाराधात करने का फल था । जिसके कारण संस्कृतज्ञों ने भारत के गौरवमय इतिहास को प्रतिस्थापित किया और विदेशी शासन के खिलाफ संधर्ष का शंखनाद किया ।
संस्कृत का यह स्वतंत्रता संग्राम जो भारत के स्वतंत्रता संग्राम में परिणत हुआ का ज्ञान सामान्य जनमानस को नही है । जिस संस्कृत को अंग्रेज धर्म अनुष्ठान एवं रुढिवादिता से सम्बन्धित तथा मृत समझते थे उसी भाषा की चेतना के कारण उन्हें देश छोडना पडा। अपनी अस्मिता एवं भारतीयता की रक्षा के लिये संस्कृतज्ञों का यह प्रयास ,तथा संस्कृत भाषा एवं साहित्य की विरासत की इस नई धारा को हम भारतीयों को समझना एवं समझाना चाहिये । जिससे हम भारत के गौरवमय इतिहास पर गर्व कर सकें ।
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