"Sanskrit Gyan Jyotsna: संस्कृत में निहित विज्ञान का हिन्दी भाषा में प्रसार– एक अनिवार्यता

संस्कृत में निहित विज्ञान का हिन्दी भाषा में प्रसार– एक अनिवार्यता

             
     संस्कृत में निहित विज्ञान का हिन्दी भाषा में प्रसार– 
                                 एक अनिवार्यता
   
        विज्ञान का हिन्दी भाषा में प्रसार अति आवश्यक है जिससे एक ओर तो अन्य भाषा में वर्णित विज्ञान के मूल सिद्धान्तो को भारतीय जन सामान्य भी समझ सकेगा तथा दूसरी ओर विशेषज्ञ अधिक सुगमता से ज्ञान विस्तार कर सकेगे। यहां मेरा मन्तव्य है कि अंग्रेजी रूसी, चीनी भाषा में निहित विज्ञान के साथ संस्कृत भाषा में निहित विज्ञान का भी हिन्दी भाषा में प्रसार हो ।
          यह कार्य दो कारणों से अनिवार्य है:- 
   (1) भारतवर्ष में हजारों वर्ष पूर्व मूल भूत विज्ञान के अनेक सिद्धांतों का उल्लेख हीं नहीं वरन् पूरी परम्परा विद्यमान थी जिससे भारतीय अनभिज्ञ हैं। 
  (2) विज्ञान की अनेक शाखाएं जैसे -आयुर्वेद, योग, वास्तु, आदि के सिद्धांत जो भारत की ही देन है,जो न केवल उपयोगी है बल्कि आज प्रासंगिक भी बने हुए हैं। 
    आजकल जिसे हम विज्ञान या science कहते हैं संस्कृत में उसे शास्त्र कहा जाता है। आज विज्ञान से हम गणित रसायन, भौतिकी,वनस्पति, इंजीनियरिंग कम्प्यूटर आदि मशीनों से सम्बधित विषयों को विज्ञान मानते है। किन्तु संस्कृत के अनुसार अर्थशास्त्र, संगीतशास्त्र नाटयशास्त्र, काव्य शास्त्र, वास्तुशास्त्र, सभी विज्ञान हैं क्योंकि शास्त्र वह है जिसके द्वारा विशिष्ट या गुह्यतम ज्ञान का शिक्षण, नियंत्रण या शासन किया जाय ।
  संस्कृत भाषा में वर्णित वास्तु शास्त्र में वास्तु, आयुर्वेद में चिकित्सा,अष्टाध्यायी में व्याकरण, वैदिक गणित में गणित, विमान शास्त्र में विमान, योग शास्त्र में योग आदि विज्ञान से सम्बंधित है। वैदिक काल से ही विज्ञान की विभन्न शाखाओं या शास्त्रों का ज्ञानधरोहर के रूप में आज भी विधमान है। संस्कृत भाषा का व्यवहारिक प्रयोग जन सामान्य मे न होने के कारण हिन्दी भाषा मे उस ज्ञान का विस्तार करना हमारी नैतिक जिम्मेदारी बन जाती है। 
  संस्कृत ग्रंथों में विद्यमान विज्ञान ऐसा नहीं है कि किसी विषय विशेष परकिसी एक व्यक्ति द्वारा तथ्य वर्णित कर दिये गये हों। बल्कि संस्कृत ग्रन्थो में प्रत्येक शास्त्र की एक पूरी परम्परा प्राप्त होती है जो ज्ञान के विस्तार एवं गहराई दोनों को स्पष्ट करती हैं। 
 यह भी सत्य है कि अनेक संस्कृत ग्रन्थों का हिन्दीअनुवाद हो चुका है किन्तु फिर भी अनेक महत्वपूर्ण ग्रन्थ एवं भाष्य आज भी अनुवाद के लिये बचे हैं। वराहमिहिर, आर्यभट्ट, भास्कराचार्य, ब्रहमगुप्त , महावीराचार्य आदि आचार्यो की वैज्ञानिक उपस्थापनाओ को आज प्रकाश में लाने की आवश्यकता है ।
  वैदिक गणितका जो प्रसार आज दिखाई दे रहा है वह पिछले 10 साल में ही हुआ हैं। ऐसे अनेक तथ्य सामने आ सकते हैं जिनसे समाज लाभान्वित हो सकता है I इसके अतिरिक्त आयुर्वेद के महान एवं उपयोगी ज्ञान का इतिहास बहुत विस्तृत है। यह अथर्वेद का एक उपान्ग है तथा उसके आठ प्रतिपाद्य विषय है। जिसमें शल्य, काय चिकित्सा, शरीर विज्ञान, रसायनतंत्र आदि विषयों पर विस्तार से चरक, सुश्रुत ,वाग्भटट आदि अनेक आचार्यों ने वर्णन कियाहै। यद्यपि आज आयुर्वेद के उस कोटि के विद्धान नहीं हैं जो नाड़ी से परीक्षण करते थे किन्तु फिर भी लोगों को प्राप्त होने वाले लाभ से आयुर्वेद की लोकप्रियता बढ़ती जा रही है अतः उसे पुनर्जीवित करने का उत्तरदायित्व हमारा है । योग शास्त्र जो आज अत्यधिक प्रासंगिक एवं जन सामान्य में आकर्षण का केन्द्र है उसमें भी पूर्णतया शास्त्रीय रीति से अष्टान्ग योग, हठ योग, क्रिया योग आदि सभी अंगों पर अनेक ग्रन्थ प्राप्त हैं। आज हम योग के आठ अंगो में से मात्र आसन तथा प्राणायाम करके लाभान्वित हो रहे हैं। शेष अंगों का ज्ञान अधिकान्शतः को नहीं है ;जो अति आवश्यक है। वास्तु शास्त्र, विमान शास्त्र, नगर नियोजन विज्ञान आदि ऐसे अनेक क्षेत्र हैं जिनका प्रसार हिन्दी में आवश्यक है। अन्यथा इधर - उधर से कुछ ज्ञान प्राप्त कर लोग उसका लाभ लेते रहेंगे।
(2)ऐसे अनेक उदाहरण हैं जहां पर भरतीय चिन्तन पाश्चात्य चिन्तन से अधिक उचित एवं समष्टिपूर्ण प्रतीत होता है।जिसे हम कुछ सामान्य उदाहरण से स्पष्टकर सकते है जैसे - आज हम स्वास्थ्य से तात्पर्य निकालते हैं शारीरिक स्वास्थ्य।
 W .H .O . में स्वास्थ्य की परिभाषा है – 
  Health is the physical,mental and social well being of man and not merely the absence of disease or infirmity. 
  उपर्युक्त परिभाषा के अनुसार मानसिक स्वास्थ्य भी स्वास्थ्य का अंग है। स्वास्थ्य की परिभाषा संस्कृत के अति प्राचीन ग्रन्थ सुश्रुत संहिता में भी प्राप्त होती है जहां उसे इस प्रकार परिभाषित किया गया है। 
  समदोषः समाग्निश्च समधातु मलक्रियः। 
  प्रसन्नात्मेन्द्रिय मनाः स्वस्थ्य इत्यभिधीयते।।
  सुश्रुत सू. 15:41 
  सुश्रुत की इस परिभाषा के अनुसार शारीरिक स्वास्थ्य जो कि वात पित्त कफ रूप दोषों की , अग्नि की, धातु की एवं मल की साम्यता से प्राप्त होता है Iइस शारीरिक स्वास्थ्य के साथ - साथ आत्मा, इन्द्रिय और मन की प्रसन्नता को स्वास्थ्य का लक्षण बताया है। स्पष्ट है कि सुश्रुत ने शारीरिक और मानसिक के साथ - साथ आत्मा अर्थात आध्यात्मिकता (spirituality), को भी स्वास्थ्य का अंग माना है। 
  इसी प्रकार आधुनिक चिकित्साशास्त्र में संतुलित भोजन (balance diet) एवं कैलोरी को ही मुख्य रूप से विचार कर भोजन करने की सलाह दी जाती है। अर्थात् यदि समान आयु का व्यक्ति समान कार्य करते हैं तो उनका भोजन एवं कैलोरी एक समान होगी। किन्तु आयुर्वेद में भोजन करने वाले व्यक्ति का अग्निबल (पाचन शक्ति) कैसी है उसपर विचार कर ही भोजन करना उचित माना गया है। अतः आयुर्वेद मे त्रिकोणीय दृष्टि से विचार किया गया है। 
  (3) ऐसे अनेक उदाहरण हैं जिनका उल्लेख संस्कृत ग्रन्थों में प्राप्त होने के बावजूद उसका श्रेय अन्य को प्राप्त हुआ । उदारणार्थ गुरूत्वाकर्षण(1966) की खोज का श्रेय न्यूटन को प्राप्त है। परन्तु महर्षि भास्कराचार्य ने न्यूटन से लगभग 500 वर्ष पूर्व ही पृथ्वी की गुरूत्वाकर्षण शक्ति पर एक पूरा ग्रन्थ रचा था। इनके प्रसिद्ध ग्रन्थ सिद्धांत शिरोमणि के लीलावती नामक भाग में भास्कराचार्य कहते हैं:- 
  आकृष्टिशक्तिश्च मही तया यत् खस्थं, 
                     गुरूस्वाभिमुखम् स्वशक्तत्या।। 
  आकृष्यते तत्पततीव भाति , 
                   समेसमन्तात् क्व पतत्वियं खे ।। 
                 
                सिद्धांतशिरोमणि गोलाध्याय भुवनकोश 
   
        अर्थात् पृथ्वी में आकर्षण शक्ति है। पृथ्वी अपनी आकर्षण शक्ति से भारी पदार्थो को अपनी ओर खींचती है और आकर्षण के कारण वह जमीन पर गिरते हैं। पर जब आकाश में समान ताकत चारो ओर से लगे तो कोई कैसे गिरे ? अर्थात् आकाश में ग्रह निरावलम्ब रहते हैं क्योंकि विविध ग्रहों की गुरूत्व शक्तियां संतुलन बनाए रखती हैं। 
  (4) संस्कृत के अनेक शब्दों को अंग्रेजी आदि अन्य भाषा में स्पष्ट नहीं किया जा सकता जैसे आत्मा ब्रहम आदि Iइसी प्रकार व्युत्पत्ति जन्य अर्थ –जैसे द्विज = ब्राह्मण और जो दो बार जन्म लेता है, इत्यादि I हिन्दी भाषा में यह कार्य सुगमता से हो सकता है। 
  (5) संस्कृत ग्रन्थो में अनेक स्थानों पर धार्मिक रूढि़वादिता भी दिखाई देती है। जो कहीं न कहीं परम्परा वश आज तक चली रही हैं लेकिन उसके पीछे कुछ विज्ञान भी प्रतीत होता है जैसे उत्तर दिशा में सिर करके नहीं सोना चाहिए ,इत्यादि उस परम्परा का भी सम्यक वैज्ञानिक विश्लेषण कर प्रसार हेतु ग्रन्थों का हिन्दी अनुवाद आवश्यक है 
   अतः संस्कृत में निहित विज्ञान का हिन्दी भाषा में अनुवाद कराने की दिशा में हर सम्भव प्रयास किया जावे। जिससे चिन्तन की वह धारा पुनः गतिमान हो जावेगी जिनके विचारों से विश्व चमत्कृत है।

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