"Sanskrit Gyan Jyotsna: पंचतंत्र का इतिहास और वह विश्व में कैसे फैला ?

पंचतंत्र का इतिहास और वह विश्व में कैसे फैला ?

                                              


             पंचतंत्र  का इतिहास और वह विश्व में कैसे फैला ?

    

        पंचतंत्र कथा साहित्य का एक अद्वितीय ग्रंथ है किन्तु यह केवल संस्कृत साहित्य का ही अंग नहीं है बल्कि यह विश्व साहित्य का भी एक अनमोल रत्न है। 

     प्रस्तुत शोध पत्र में मैंने तीन बिन्दुओं पर प्रकाश डाला है- 

 1. पंचतंत्र की कथाएं भारत के साथ-साथ सम्पूर्ण विश्व में अनुवाद के द्वारा प्रचलित हुई । 

 2. ये कथाएं विश्व-साहित्य के लिए उपजीव्य बनीं अर्थात इन कथाओं से सूत्र लेकर विश्व के साहित्यकारों ने अपने साहित्य को समृद्ध किया है । 

 3. दो हजार से भी अधिक समय से ये कथाएं विश्व के बालक एवं वृद्ध, साक्षर एवं निरक्षर सभी को व्यवहारिकता एवं नीति ज्ञान का उपदेश देती आई हैं अतएव सदैव ही प्रासंगिक रही हैं और आज भी हैं ।

   पंचतंत्र विभिन्न संस्करणों में देश के अलग-अलग भागों में प्रचलित रहा है । इसके संस्करण भेद के पीछे इसकी लोकप्रियता एक प्रमुख कारण रही है । इसके निम्नलिखित मुख्य संस्करण प्राचीनकाल में थे- 

 1 तंत्राख्यायिका-यह प्राचीन तथा नवीन दो रूपों में प्रचलित रहा ।पंचतंत्र के सभी संस्करणों में यह सर्वाधिक प्रमाणिक है । 

 2 दूसरा संस्करण गुणाढ्य की बृहत्कथा में अंतर्निविष्ट है। यह कशमीरी संस्करण है । 

 3. तृतीय संस्करण तंत्राख्यायिका तथा उसी से सम्बद्ध जैनकथासंग्रह है । 

 4 दक्षिणी संस्करण-यह मूल रूप है ।

  5. नेपाली संस्करण - यह दक्षिणी संस्करण पर आधारित है। 

  इसके अतिरिक्त उत्तर पश्चिमी पंचतंत्र तथा पहलवी संस्करण के रूप में भी पंचतंत्र प्राप्त होता है । जावा, लाओस तथा थाइलैण्ड की भाषाओं में भी अनुदित या संग्रहीत होकर पंचतंत्र आज उपलब्ध है । 

विश्व के विभिन्न देशों में करीब 90 पाण्डुलिपियां प्राप्त होती हैं। 

 अनुवाद के रूप में तथा उपजीव्यता के रूप में पंचतंत्र की कथाएं विश्व की 200 भाषाओं में पाई जाती हैं । 

 

  पंचतंत्र की कथाओं पर जर्मनी के दो विद्वानों डा.बेनफी (1 ) तथा डा.हर्टल (2 ) ने अत्यधिक गहन अनुसंधान किया है।

   डा.बेनफी ने अपने अध्ययन के आधार पर यूरोप, एशिया तथा अफ्रीका जैसे तीन महादेशों के कथा साहित्य पर भारतीय कथा साहित्य के विस्तृत प्रभाव को प्रदर्शित किया है। इस प्रसंग में पंचतंत्र की कथाओं के विश्व भ्रमण की प्रमाणिक कहानी भी डा.बेनफी की महत्वपूर्ण देन है। डा.हर्टल ने पंचतंत्र के साहित्यिक रूप एवं उसकी विविध वाचनाओं का गंभीर अनुशीलन किया है जिसके फलस्वरूप उन्हें पंचतंत्र स्कालर का अभिधान प्रदान किया गया है।

  पंचतंत्र पर तीसरा महत्वपूर्ण कार्य अमेरिकी संस्कृतज्ञ विद्वान इडगर्टन (3) ने किया है। उन्होंने अपने ग्रंथ The Panchatatra Reconstructed में पंचतंत्र के मूल रूप का पता लगाने का कार्य बडे परिश्रम से किया है । पंचतंत्र सम्पूर्ण विश्व में फैला ।

   विभिन्न युगों में पंचतंत्र के स्वरूप पर संस्कृत के विद्वान बलदेव उपाध्याय (4) ने अपनी पुस्तक में प्रकाश डाला है-

     ईरानी सम्राट के राजवैद्य तथा मंत्री वुर्जुए ;पंचतंत्र की एक प्रति ईरान ले गया तथा वहां के सम्राट नौशी खां के लिए सर्वप्रथम षष्ठ शती (531 ई.-579ई) में पंचतंत्र का पहलवी (पुरानी फारसी) में अनुवाद किया । यह अनुवाद आज प्राप्त नहीं है । 570 ई. आसपास सीरियन पादरी तथा ग्रंथकार जिसका नाम बूद था इसका कलिलग और दमनग नाम से सीरियन भाषा में अनुवाद किया । यह अनुवाद विद्यमान तो है किन्तु अनेक स्थानों में त्रुटि होने से अधूरा है । 750 ई. के आसपास अब्दुल्ला बिन अलमुकफ्फा ने कलील और दिम्नह के नाम से अरबी भाषा में अनुवाद किया । पहलवी अनुवाद का यह अरबी भाषांतर यूरोप में होने वाले भाषांतरों का मूल स्त्रोत बना । 10 वीं-11 वीं शती में अरबी से इसका अनुवाद सीरियन भाषा में पुनः हुआ। 11 वीं शती में अरबी से यूनानी भाषा में साइमिआन सेठ नामक विद्वान ने इसका अनुवाद किया । इस यूनानी भाषांतर के ऊपर लातिनी, जर्मन तथा स्नाव भाषाओं में अनेक अनुवाद आधारित हैं। 1483 में ऐन्टोनियस वान फोर ने जर्मन भाषा में अरबी भाषा से सीधे अनुवाद किया । ‘जान आफ केपुआ’ के द्वारा प्रणीत लातिनी अनुवाद का डोनी नामक विद्वान ने इताली भाषा मे अनुवाद किया जो 1552 में मुद्रित हुआ। इसका अंग्रेजी अनुवाद सर टामस नार्थ ने मारल फिलासफी आफ डोनी नाम से किया है जो लंदन में 1599 में प्रथम बार तथा 1601 ई. पुनः मुद्रित किया गया । हिब्रू में किये गये अनुवाद का फारसी में अनुवाद हुआ जिससे पूर्वी, तुर्की भाषाओं में अनेक अनुवाद प्रस्तुत किये गये । इन अनुवादों मे नितांत प्रख्यात है अनवरि सुहेली जिसके रचयिता हुसेन इब्न अलीलवाइज (1470-1505) नामक फारसी कवि हैं।यह ग्रंथ फारसी का अलंकृत काव्य है तथा कालांतर में अनेक ग्रंथों का मूल स्रोत बना । इस प्रकार पंचतंत्र ने इन अनुवादों के माध्यम से यूरोप के मध्य युगीन साहित्य को प्रभावित किया । इसके अतिरिक्त मध्ययुगीन साहित्य की कहानियों पर भी पंचतंत्र का प्रभाव दिखाई पड़ता है।

   डां.विन्टरनित्स(5) ने इस पर महत्वपूर्ण विवेचन उदाहरण के साथ विस्तार से किया है। उनके अनुसार ग्रीस के सुप्रसिद्ध कथासंग्रह ‘ईसप की कहानियां’ तथा अरब की मनोरंजक कहानियां ‘अरेबियन नाइट्स’ का आधर पंचतंत्र की कहानियां हैं । मध्ययुग में ये कहानियां ‘विदापई की कहानियां,’ (विद्यापति की कहानियां) के नाम से प्रख्यात थीं । इसी प्रकार ‘बरलाम और जोजफ’ की कहानी मध्य युग में अत्यंत प्रसिद्ध हुई । इसमें जोजफ स्वयं बुद्ध हैं। मध्य युग में ‘गेएटा रोमनारूम ’ और बोकोचिओ की इताली भाषा में निबद्ध ‘डेकामेरा की कहानियां’ भी पंचतंत्र से प्रभावित रही हैं । चाउसर कृत ‘कैन्टर्बरी टेल्स’ जो अंग्रेजी साहित्य को आरम्भ करने वाला अग्रेजी कवि है तथा ‘ला फातेन’ जो फ़्रैच साहित्य के प्रख्यात कवि है, की कहानियों में भी पंचतन्त्र के सूत्र प्राप्त होते है । 

 यह बात विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि विश्व के देशों में भ्रमण के दौरान भारतीय कथाओं में कुछ परिवर्तन दिखाई पड़ता है जैसे भारतीय कथाओं में सत्तू की मटकी का उल्लेख है तो ला फातेन की कथाओं में दूध की मटकी का । इसी प्रकार बन्दर एंव मगरमच्छ की कहानी के फारसी अनुवाद में मगरमच्छ के स्थान पर कछुए का उल्लेख है । किन्तु इन कथाओं की आत्मा एक है। 

 इस प्रकार स्पष्ट है कि पचतंत्र सम्पूर्ण विश्व साहित्य का उपजीव्य रहा है । पंचतंत्र के इस महत्व के विषय में प्रो. हर्टेल ने अपनी पुस्तक Das Panchatantra में लिखा है- 

  The Panchatantra has made unparalleled progress from its native land over all the civilized parts of the globe and for more than thousands of years has delighted young and old ,educated and uneducated ,rich and poor, high and low and still delights them.Even the greatest obstacles of language,custom and religion have not been able to check that triumphal progress.” 

  पंचतंत्र के इस व्यापक प्रसार एवं विश्व साहित्य पर उसके प्रभाव को देखते हुए यह प्रश्न स्वतः उठता है कि पंचतंत्र में ऐसा क्या है ? कि सम्पूर्ण विश्व उसका ऋणी है तथा क्या पंचतंत्र आज भी प्रासंगिक है ? 

     इन प्रश्नों पर विचार करने पर हम पाते है कि पंचतंत्र में कथा साहित्य और नीति साहित्य का सुन्दर समन्वय प्राप्त होता है । पंचतंत्र की रचना विष्णु शर्मा ने की थी । उन्होंने अमरकीर्ति नामक राजा के पुत्रों को पंचतंत्र की कथाऐ सुनाकर अल्प समय में ही व्यवहारकुशल, सदाचार सम्पन्न तथा नीतिपटु बना दिया । इसलिये पंचतंत्र की कथाओं में सदाचार, राजनीति एंव लोकनीति स्पष्ट दिखाई देती है । इसके अलावा विष्णु शर्मा एक उपदेशक के समान शिक्षा नहीं देते हैं क्योंकि वह शिक्षा व्यक्ति पर साक्षात प्रभाव नहीं डालती है । 

  पंचतंत्र की शिक्षा ऐसी है कि उसे पढ़ने से बालक एवं प्रौढ़ स्वतः यह अर्थ निकाल लेते हैं कि इन परिस्थितियों में क्या उचित है और क्या अनुचित ? उसे क्या करना चाहिए एवं क्या नहीं करना चाहिये । बच्चों के कोमल अंतर्मन पर पंचतंत्र की इन कथाओं एवं पशुकथाओं के माध्यम से चरित्र निर्माण एंव व्यवहारिकता का संस्कार बनता है । वयस्क भी सूक्तियों के द्वारा जीवन के सार को आत्मसात् करते हैं। इस प्रकार पंचतंत्र की कथाओं में सभी वर्ग के लिये आकर्षण मौजूद है। पंचतंत्र में कुल 75 कथाऐं है तथा प्रत्येक कहानी के माध्यम से जीवन को सुखी एवं सफल बनाने के लिये शिक्षा दी गई है । 

  जिनमें से कुछ प्रमुख शिक्षा इस प्रकार है -प्रत्येक व्यक्ति को शारीरिक सुरक्षा, पर्याप्त धन ,विश्वासपात्र मित्र की आवश्यकता होती है । भाग्य पर निर्भर होने की अपेक्षा कर्म को अधिक महत्व देनाचाहिये । अर्जित धन का समुचित उपयोग करो। जितना हो सके परोपकार करों । विपदा आने पर धैर्य न खोएं एवं साहस से उसका सामना करो । अपने हाथ, पांव एवं मस्तिष्क का समुचित उपयोग करो । इसके अतिरिक्त इन शिक्षाओं को अधिक ग्राहय एवं व्यवहारिक बनाने के लिये गागर में सागर भरती सूक्तियां या सुभाषित विद्यामान है । 

 सुभाषितों को 3 वर्गो में विभाजित किया जा सकता है उदाहरणार्थः- 

  1. व्यवहारपरक सुभाषित- इन सुभाषितों से जीवन को सफल बनाने के लिये व्यवहार का ज्ञान होता है जैसे-

  कलहान्तानि हर्म्याणि कुवाक्यान्तं चसौहृदम्।

  कुराजान्तानि राष्ट्राणि कुकर्मान्तं यशो नृणाम् ।। 

 5/77 

    झगड़े से घरों का, दुर्वचन से मित्रता का, दुष्ट राजा से देश का और कुकर्मों से मनुष्यों के यश का नाश हो जाता है ।

  व्यवहार परक अन्य सुभाषित 1-118, 2-20, 2-79, 5-53, 5-36 में भी प्राप्त होते हैं । 

 2.सदाचार परक सुभाषित - सदाचार परक सुभाषित व्यक्ति को सत्कार्य करने हेतु प्रेरित करते हैं । उदाहरणार्थ- 

  उद्योगिनं सततमत्र समेति लक्ष्मी 

 र्देवं हि दैवमिति का पुरूषा वदन्ति ।

  दैवं निहत्य कुरू पौरुषमात्मशक्त्या 

 यत्ने कृते यदि न सिध्यति कोsत्र दोषः ।। 

   उद्योग में तत्पर मनुष्य को इस लोक में सदा लक्ष्मी प्राप्त होती रहती है । ‘भाग्य सब कुछ है’ ऐसा कायर पुरुष कहा करते हैं । भाग्य को ठुकराकर अपनी शक्ति भर पुरुषार्थ करो । प्रयत्न करने पर भी यदि कार्य सिद्ध न हो तो इसमें कौन सी त्रुटि रह गई है; इसका अनुसंधान करना चाहिये । 

  3. नीति परक सुभाषित- 

   आत्मनो मुखदोषेण बध्यन्ते शुकसारिकाः ।

    बकास्तत्र न बध्यन्ते मौनं सर्वार्थ साधनम् ।। 

  अर्थात शुक और सारिकाएं (मैना) अपने मुख दोष अर्थात बोलने के कारण पकड़े जाते हैं परंतु बगुले नहीं पकड़े जाते हैं अतः चुप रहना सब कार्यों का साधक है।

  पंचतंत्र से प्राप्त शिक्षाएं एवं सुभाषित जीवनदायक अमृत है यही कारण है कि एक प्राचीन किवंदंती में उसे सभी वर्ग के लिये अमृत स्वरूप कहा गया है ।

   वह किंवदन्ती इस प्रकार है कि ईरानी सम्राट के मंत्री बुर्जुए ने किसी पुस्तक में पढ़ा कि भारत वर्ष में किसी पहाड़ पर संजीवनी औषधि है जिसके सेवन से मृत व्यक्ति जी उठते हैं । उत्कट जिज्ञासा में वह 550 ई .के लगभग इस देश में आया और यहां चारों ओर उसने संजीवनी की खोज की । जब उसे वह बूटी नहीं मिली तब निराश होकर उसने एक भारतीय विद्वान से पूछा इस देश में अमृत कहां है ? उसने उत्तर दिया तुमने जैसा पढ़ा था वह ठीक है । विद्वान व्यक्ति वह पर्वत है जहां ज्ञान की बूटी होती है और जिसके सेवन से मूर्ख रूपी मृत व्यक्ति फिर से जी जाता है । इस प्रकार का अमृत हमारे यहां पंचतंत्र नामक ग्रंथ में है । तब बुर्जुए पंचतंत्र की एक प्रति ईरान ले गया और वहां के सम्राट नौशीखां के लिए उसने पहलवी भाषा में उसका अनुवाद किया तथा वहां से यूरोप एवं अरब, जापान देशों में उस अमृत बिन्दु की वर्षा की । 

 

   जहां तक आज के युग में पंचतंत्र की प्रासंगिकता का प्रश्न है वह आज और अधिक प्रासंगिक एवं महत्व रखता है क्योंकि आज के युग में पुस्तकीय ज्ञान, धन लालसा, बाह्य आडम्बर के प्रति झुकाव बढ़ा है । शिक्षा संस्थान भी बच्चों के चरित्र निर्माण तथा व्यवहारिक ज्ञान की शिक्षा नहीं देते हैं वे केवल पुस्तकीय ज्ञान की वृद्धि हेतु तत्पर रहते हैं । पहले माता-पिता भी बच्चों के चरित्र निर्माण पर अत्यधिक ध्यान देते थे किन्तु आज व्यस्तता के कारण वे भी बच्चों को अधिक समय नहीं दे पाते हैं । ऐसे समय में बच्चों को व्यवहारिक ज्ञान देने ओर उनके चरित्र निर्माण करने का दायित्व पंचतंत्र आदि नीतिकथाओं पर आ जाता है । पंचतंत्र की इसी उपयोगिता के कारण ही समय के अनुसार पंचतंत्र की कहानियों के प्रस्तुतीकरण का स्वरूप भी बदलता रहा है अर्थात् पहले वे कहानियां बच्चे मां पिता से सुनते अथवा स्वयं पढ़ते थे । फिर इन कथाओं में चित्र एवं कहानी के साथ ‘अमर चित्र कथा’ कहानी जैसी पुस्तकें प्रकाशित होने लगीं जो हिन्दी अंगे्रजी आदि अनेक भाषाओं में प्रकाशित होती हैं । आजकल पंचतंत्र की कहानियों पर animation film एवं सी.डी. सरलता से बाजार में मिलती है । साथ ही you tube इत्यादि site पर पंचतंत्र की ये कहानियां सरस ढंग से दिखाई जाती हैं।जिनसे इन कहानियों की उपयोगिता एवं महत्व स्वतः स्पष्ट होता है । भारत ही नहीं विश्व के सभी व्यक्तियों ने पंचतंत्र की कहानियां सुनी हैं तथा अपने बच्चों को सुनाई हैं और आज के बच्चे भी उन्हें सुन रहे है तथा माता पिता सुना रहे हैं । चाहे वह पुस्तकों में पढे या सी.डी में देखे या इन्टरनेट पर देखे । आज भी हर बच्चे को ये कथाएं लुभाती है ,व्यवहारिक बनाती है , संस्कारों के बीज बोती हैं। 

 

  यहां यह भी उल्लेखनीय है कि सामान्यतया साहित्य व्यक्ति स्वयं पढ़ कर ही आनन्द उठाते हैं। एक पूरा परिवेश चाहिए होता है किन्तु पंचतंत्र की कथाएं विभिन्न प्रकार से व्यक्ति तक पहुचाई जा रही है जो मानवता की शिक्षा देती हैं । 21 वीं सदी में जब मानव मूल्यों का हृास सर्वत्र दिखाई पढ़ रहा है तब उन मानवीय मूल्यों के ज्ञान का प्रकाश फैलाने के कारण पंचतंत्र आज और अधिक प्रासंगिक बन गया है तथा उनकी कथाएं सुनकर विश्व के समस्त मानव व्यवहारिक, सदाचारी, नीति संपन्न एवं विद्वान बनें ऐसी मेरी कामना है ।

 

 

 संदर्भ ग्रंथ - 1. 

2.Hertel--Das SudlichePanchatantra,Leipzig;B.G.Teubner 

3-The Panchatantra reconstructed Vol. 1 Text and critical Apparatus and Vol. II Introduction and Translation.

 4- संस्कृत साहित्य का इतिहास .बलदेव उपाध्याय,शारदा संस्थान,वाराणसी 1973

 5.History of indian Literature vol.iii part i ,Motilal Banarsidas,Delhi 1963

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