महाभारत के उल्लेख एवं रज्मनामा के चित्र
‘कर्ण के द्वारा घटोत्कच वध’ का तुलनात्मक विश्लेषण
मुगल शासन काल में संस्कृत और फारसी सहित्य एवं संस्कृति को परस्पर नजदीक लाने के लिये अनेक प्रयास हुए। जिनमें सर्वाधिक प्रयास सम्राट अकबर के शासन काल में हुए। अकबर ने लगभग 15 पुस्तकों का अनुवाद फारसी भाषा में करवाया। जिनमें मुख्य है – अथर्ववेद, भगवद्गीता, कथासरित्सागर, सिंहासन वत्तीसी, रामायण एवं महाभारत ।
अब्दुल कादिर बदायुनी ने लिखा है कि 1582 ई. में अकबर को ऐसा महसूस हुआ कि कहानियों (fiction ) का अनुवाद कराने से बेहतर है कि महाभारत में वर्णित इतिहास एवं दर्शन का अनुवाद फारसी भाषा में कराया जाय। इस कार्य हेतु अकबर ने अपनी व्यक्तिगत रूचि दिखलाई। पर यह कार्य अत्यन्त सरल नहीं था क्योंकि संस्कृत के पण्डित फारसी नहीं जानते थे तथा फारसी के जानकार संस्कृत। अतः अकबर ने सबसे पहले नकीब खान को बुलवाया तथा महाभारत के अनुवाद के लिये नियुक्त किया। संस्कृत पण्डितों मे मधुसूदन मिश्र, देवी मिश्रा एवं सत्वधन प्रमुख हैं। तथा फारसी अनुवाद बदायुनी, मुल्ला शेरी, नकीब खान, सुल्तान हजी थानेसरी, शेख फैजी आदि द्वारा किया गया।
संस्कृत के पण्डित महाभारत का अनुवाद करते थे तत्पश्चात फारसी के मौलवी उसका फारसी अनुवाद करते थे। रज्मनामा (battle of war ) जिसे महाभारत की फारसी अनुवाद कहा जाता है वह वास्तव में सही अर्थो में अनुवाद नहीं है। बल्कि उसे स्वच्छन्द अनुवाद (Free Translation ) कहा जा सकता है जिसमें घटनाएं अथवा तथ्य अपने मूलस्वरूप में रहते हैं किन्तु वह शब्दशः नहीं होता है। बदायुनी ने स्वयं ही यह बात कही है कि रज्मनामा महाभारत का हूबहू या (यथावत) अनुवाद नहीं है। 1584 में एक लाख श्लोकों के अनुवाद के साथ, महाभारत का अनुवादरज्मनामा के नाम से सम्पूर्ण हुआ है।
तत्पश्चात् अकबर ने सुन्दर लिखावट ( Expert calligraphist )वाले व्यक्ति को बुलवा कर उसे सुन्दर अक्षरों में लिखवाया तथा अपने मौलवियों को आदेश दिया कि वे अपनी प्रति तैयार कर पढ़े। अकबर की प्रति आज भी जयपुर के सवाई मानसिंह म्यूजियम में रखी है।
तत्पश्चात् अकबर ने चित्रकारों को बुलवाया जिनमें मुहम्मद शरीफ, फारूख चेला, देशवन्त, बासवान लाल, मुकुन्द आदि प्रमुख थे जिन्होंने मुगल कालीन चित्रकला की खूबसूरत मिसाल इन चित्रों के द्वारा प्रस्तुत की। उन्होंने रज्मनामा की घटनाओं पर आधारित चित्रों को बनाया। अकबर की प्रति मे 168चित्र (paintings ) हैं जो सवाई मानसिह म्यूजियम जयपुर में रखी है।
मेरा यह शोध पत्र इन चित्रो (paintings ) में से एक चित्र (painting ) - जिसमें कर्ण के द्वारा घटोत्कच के वध का चित्रण एवं फारसी भाषा में उस घटना का वर्णन है -पर केन्द्रित है।
महाभारत के युद्ध में कर्ण एक प्रमुख योद्धा था । वह ही अर्जुन का वध करने में समर्थ था क्योकि कर्ण के पास दैवीय शक्ति थी । अर्जुन के वध का अर्थ था - पाण्डवों की हार।कर्ण की वह दैवीय शक्ति घटोत्कच का वध करने मे नष्ट हो गयी । महाभारत में कर्ण और घटोत्कच के युद्ध एवं उसकी मृत्यु के घटनाक्रम को इस प्रकार वर्णित किया गया है -
महाभारत के अनुसार - महाभारत के युद्ध में कर्ण कौरव की ओर से युद्ध कर रहा था तथा वह धनुर्विद्या में अर्जुन का प्रतिद्वन्दी था एवं महाभारत के युद्ध में अर्जुन को मारकर विजयी होना चाहता था। कर्ण; कुन्ती एवं सूर्य का पुत्र था तथा जन्म के समय से ही उसे कवच एवं कुण्डल प्राप्त थे जिसके विद्यमान रहते उसे हराना कठिन था।
अतएव युद्ध से पूर्व ही इन्द्र ने छल से उससे कवच और कुण्डल दान में ने लिया तथा बदले में वैजयन्ती नामक अमोघ अस्त्र उसे दिया जिसका प्रयोग वह एक बार ही कर सकता था। कर्ण ने उस अस्त्र को अर्जुन पर वार करने के लिये सुरक्षित रखा था।
किन्तु महाभारत के युद्ध में पाण्डवों की ओर से युद्ध करते हुए भीम पुत्र घटोत्कच ने कौरवों की सेना ने आतंक मचा दिया। महाभारत में घटोत्कच के रूप, उसके रथ, घोड़े तथा अस्त्र - शस्त्र का वर्णन है।
घटोत्कच का शरीर बहुत बड़ा था।उसका मुंह तांबे जैसा और आँखे सुर्ख रंग की थी। पेट धंसा हुआ, सिर के बाल ऊपर की ओर उठे हुए, दाढ़ी मुंह काली, कान खूंटी जैसे, ठोड़ी बड़ी और मुंह का छेद कान तक फैला हुआ था। दाढ़े तीखी और विकराल थी। जीभ और ओंठ तांबे जैसे लाल-लाल और लम्बे थे। भौहे बड़ी - बड़ी नाक मोटी, शरीर का रंग काला, कण्ठ लाल और देह पहाड़ जैसी भयंकर थी।
घटोत्कच की मायावी शक्ति से कौरवो की सेना में हाहाकार मच गया। तब समस्त कौरवो ने कर्ण से घटोत्कच का वध करने के लिये कहा - तब कर्ण ने इन्द्र द्वारा दी गई वैजयन्ती नामक अमोघ शक्ति हाथ में ली ; जो कर्ण ने अर्जुन को मारने के लिये सुरक्षित रखी थी। वह शक्ति कर्ण ने घटोत्कच के ऊपर चला दी। उस शक्ति ने उसकी छाती पर चोट की तथा वह प्राणों से हाथ धो बैठा । मरते समय भी उसके शरीर के नीचे आकर कौरव सेना का संहार हुआ ।
घटोत्कच की मृत्यु होने के पश्चात् का प्रसंग महाभारत में इस प्रकार वर्णित है। महाभारत के अनुसार - संजय कहते है कि घटोत्कच के मारे जाने से समस्त पाण्डव शोक मग्न हो गये सबकी आँखों से आंसुओं की धारा बहने लगी किन्तु कृष्ण को बहुत खुशी थी ।वे आनंद में डूब गये उन्होंने अर्जुन को गले लगाकर उसकी पीठ ठोंकी । भगवान को प्रसन्न जानकर अर्जुन बोले - हे मधुसूदन !आज आप इस बेमौके पर इतने खुश क्यों हो रहे हैं इसका कोई छोटा मोटा कारण नहीं हो सकता है ? कृपया कारण बताइये।
तब कृष्ण बोले कि सुनो। तुम जानते हो कर्ण ने घटोत्कच को मारा है, पर मैं कहता हूँ कि इन्द्र की दी हुई शक्ति का प्रयोग कराकर एक प्रकार से घटोत्कच ने कर्ण को ही मार डाला है अब तुम कर्ण को मरा ही समझो। संसार में कोई भी मनुष्य ऐसा नहीं है जो कर्ण के हाथ में शक्ति रहने पर उसके सामने ठहर सकता और यदि उसके पास कवच तथा कुण्डल भी होते तब वह देवताओं सहित तीनों लोकों को भी जीत सकता था। तुम्हारा ही हित करने के लिये इन्द्र ने छल से उसे कुण्डल और कवच से हीन कर दिया। उनके बदले में जबसे इन्द्र ने उसे अमोघ शक्ति दे दी थी तबसे वह सदा तुमको मरा हुआ ही मानता था। आज यद्यपि उसकी ये सारी चीजें नहीं रही तो भी तुम्हारे सिवा दूसरे किसी से वह नहीं मारा जा सकता। तुम्हारे हित के लिये ही मैने जरासन्ध, शिशुपाल आदि को एक-एक करके मरवाया है। एकलव्य का अगूंठा कटवाया। घटोत्कच धर्म का लोप कर रहा था इसलिये उसका विनाश करवाया। जो धर्म का लोप करने वाले हैं वे मेरे वध्य हैं। अतः तुम्हें घटोत्कच के विषय में विषाद नहीं करना चाहिये।
अब रज्मनामा के चित्र पर दृष्टि डालते है –
महाभारत के उल्लेख एवं रज्मनामा के चित्र -‘कर्ण के द्वारा घटोत्कच वध’ का तुलनात्मक विश्लेषण-शीर्षक से अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन ,फ़ारसी विभाग ,बरकतुल्लाह विश्वविद्यालय में शोधपत्र प्रस्तुत


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