"Sanskrit Gyan Jyotsna: ऋग्वेद में नारी स्वतंत्रता (प्रो. भगवतशरण उपाध्याय के मत के परिप्रेक्ष्य में )

ऋग्वेद में नारी स्वतंत्रता (प्रो. भगवतशरण उपाध्याय के मत के परिप्रेक्ष्य में )

 

                ऋग्वेद में नारी स्वतंत्रता 

(प्रो. भगवतशरण उपाध्याय के मत के परिप्रेक्ष्य में )

   प्रो. भगवतशरण उपाध्याय ने अपनी पुस्तक Women in rigveda  के अध्याय Liberty  एवं Morality में ऋग्वैदिक काल में  नारी स्वतंत्रता पर विचार करते समय जो निष्कर्ष निकाले हैं उसमें से निम्न निष्कर्ष आपत्ति जनक हैं:- 

 1. ऋग्वेदिक काल में स्त्रियों को बाहर आने जाने की पूर्ण स्वतंत्रता थी प्रो. भगवतशरण उपाध्याय के मत में  स्त्रियों के रात्रि व्यतीत करने तक के अन्तहीन संदर्भ ऋग्वेद में मिलते हैं । 

  2. स्त्रियां  उत्सवों में जाती थीं तथा वे विभिन्न सगठनों एवं सम्मेलनों में भी भाग लेती थीं जिनमें तीन प्रमुख थे - (क) सभा (ख) विदथ (ग) समन ।

  इसमें विदथ तथा समन के उद्देश्य, स्वरूप एवं कार्य का जो उल्लेख उपाध्याय जी ने किया है वह आपत्तिजनक है । 

 3. नव युवतियां पुरूषों से मजाक (Tricks) भी करती थीं । 

 4. पुत्रियों के विवाह पर पिता का नियंत्रण अत्यधिक न्यून था । विवाह के संबंध में केवल भाई ही कुछ सुझााव दे सकता था । 

   प्रो. उपाध्याय के इन निष्कर्षों का आधार ऋग्वेद है क्योंकि प्रत्येक निष्कर्ष के समर्थन में उन्होने ऋग्वैदिक मंत्रों  को उद्धृत किया है। यहां पर उल्लेखनीय है कि ऋग्वेद के मंत्रों से उपर्युक्त निष्कर्षों का आधार मुख्यरूप से ग्रिफिथ की पुस्तक का अंग्रेजी अनुवाद ही रहा है । यही कारण है कि उन्होंने ग्रिफिथ के अंग्रेजी उद्धरणों को ही पुस्तक में सामान्यतया उद्धृत किया है । 

 मूल ऋग्वेद एवं सायण भाष्य का उल्लेख नहीं किया । यही कारण है कि अनेक स्थलों पर ऋग्वेद के जिन मंत्रों के द्वारा उन्होंने निष्कर्ष निकाला है उससे शब्दो से अर्थ निकालते समय कुछ स्थलों पर अर्थ में अत्यधिक भिन्नता भी आ गई है । 

 ऐसा प्रतीत होता है कि ग्रिफिथ के अंग्रेजी अनुवाद एवं मैक्समूलर के कथन के आधार पर नारी स्वतंत्रता के संबंध में वी.एस. उपाध्याय ने नवीन उद्भावना की है । 

  प्रस्तुत शोधपत्र में उपाध्याय जी के निष्कर्षों का समालोचनात्मक विश्लेषण एवं मूल्यांकन करने का प्रयास किया गया है । 

 01 ऋग्वैदिक काल में  समन नामक संगठन का उल्लेख करते हुए पृ0 191 पर उपाध्याय जी का कथन है- 

 "The popular assemblies to which women flocked and in which they spoke undeterred were the sabha ,vidatha and the samana ....The samana was a popular gathering of man and women .Mainly grown up boys and girls where they met and played loved and parted .

      उपाध्याय जी के उपर्युक्त मत का मूल्यांकन करने पर यह स्पष्ट होता है कि ऋग्वेद में समन शब्द का प्रयोग अनेक स्थलों पर हुआ है किन्तु उससे किसी संगठन का बोध नही होता है । अपने मत को प्रमाणित करने के लिये मैं उन्हीं संदर्भों को उद्धृत करना चाहती हॅू जो प्रो. उपाध्याय ने दिये हैं ।  women in rigveda के पृष्ठ 191 पर उपाध्याय जी ने ऋग्वेद 1.124.8, 4.58.8, 6.95.4 तथा 7.2.5 को समन के उदाहरण के रूप में उल्लिखित किया है । किन्तु इन उद्धरणों में से 1.124.8 में समनगा 4.58.8 में समना, 4.75.4 में समना तथा 7.2.5 में समनेषु शब्द का प्रयोग हुआ है । यदि समन एक संगठन का नाम है तब वह संज्ञा शब्द होगा तथा सदैव उसी प्रकार व्यवहार प्राप्त होता । साथ ही समनेषु शब्द के बहुवचन होने के कारण क्या तत्कालीन समाज में अनेक संगठन थे ? यह तथ्य भी स्पष्ट नही हो पाता है । वस्तुतः ऋग्वेद में इनके अतिरिक्त भी समन तथा उससे सम्बन्धित शब्दों  के अन्य उल्लेख भी प्राप्त होते हैं । ऋग्वेद में समन शब्द 10.69.11, 1.48.6,10.86.10 ,10.168.2 में प्राप्त होता है । समने शब्द 10.143.4 ,6.75.3 में समनेषु 7.2.5 में , समनगा 1.124.8,7, बल्कि समना शब्द का प्रयोग प्राप्त होता है । इसके अतिरिक्त मन, सुमनसः 4.4.9 ,सुमनस्यमाना 6.74.4,7.33.14 आदि उत्तम मन अथवा विचार अर्थ में प्राप्त होते है । सायण भाष्य में समन शब्द का अर्थ सामान्यतया यज्ञ (2) अथवा संग्राम (3) प्राप्त होता है तथा समना का अर्थ समान मनस्का (4) किया गया है । केवल 6.75.5 में समना का अर्थ सायण ने युद्ध किया है । 

 किन्तु सायण भाष्य के अनुसार कहीं भी समन का अर्थ युवक एवं युवतियों का संगठन अर्थ में प्राप्त नही होता

  है । 

   ग्रिफिथ के अग्रेंजी अनुवाद में भी समन शब्द भिन्न भिन्न अर्थों में दिखाई पड़ता है।उदाहरणार्थ -

 1.124.8 ,10.86.10 में festal meeting, 7.2.5. में God"s assembly,6.75.3 में battle, 6.75.5 में combat,10.168.2 में assembly (5)

  किन्तु इन अर्थों से भी यह स्पष्ट नही होता है कि समन नामक एक सामाजिक संगठन था । 

 ग्रिफिथ ने 6.75.3 तथा 6.75.5  में समन का अर्थ संग्राम किया है । उससे यह अर्थ नही निकाला जा सकता कि समन नाम उत्सव में युद्ध, दौड तथा नाटक आदि आयोजन होते थे । 

 इसी प्रकार 1.48.6 में जहां समन शब्द का प्रयोग हुआ वहां सायण ने उसका अर्थ किया है - "समीचीन चेष्टावंन्त" तथा ग्रिफिथ ने अर्थ किया है each man to his pursuit, इन दोनों ही अर्थों से समन नामक संगठन की बोध नही होता है । 

  इसके अतिरिक्त सात्वलेेकर एवं प. श्री राम आचार्य के हिन्दी अनुवाद से भी उपाध्याय जी के मत को समर्थन प्राप्त नही होता है । 

  दूसरे दृष्टिकोण से देखें तो ऋग्वेद के मण्डल के 75 वें सूक्त के देवता संग्रामाशिषः है । यहा तीन स्थलों पर समन शब्द का प्रयोग हुआ है । तथा उन स्थलों को उपाध्याय जी ने समन नामक संगठन से सम्बन्धित मानकर उद्धृत किया है । वे स्थल हैं 6.75.3 ,6.75.4,

 6.75.5 उन स्थलो पर सायण तथा ग्रिफिथ दोनों ने ही समन का अर्थ युद्ध किया है । जहां तक समन में स्त्रियों के एकत्रित होने की बात है इन उद्धरणों से तो समन का स्त्रियों से संबंन्धित होने का बोध नही होता है ।

 " योषा इव "का प्रयोग उपमा के लिये हुआ है । ग्रिफिथ ने भी यही अर्थ निकाला है । 6.75.3 में धनुष की डोरी कैसे शब्द करती है ?- ग्रिफिथ कहते हैंshe whispers like a women,4.75.4मेंआर्त्नी कैसे मिलती है ?-Meeting Like a women and her lover  तथा 6.75.5 में उल्लेख है -समनावगत्य तथा पद पाठ में समना अवगत्य । यहां  समन शब्द का प्रयोग ही नही हुआ है । तथा 6.75.3 के ऋषि कहते हैं - समने पारयन्ती अर्थात समन में ( संकट से ) पार करते हैं । ग्रिफिथ के अनुसार  Preserves us in the combet. 

   इन उद्धरणों से यह अर्थ निकालना है कि समन में युद्ध तथा रथदौड़ आदि आयोजन होते थे यह भी तर्कसंगत नही लगता है । ग्रिफिथ ने 6.75.3 में समन का अर्थ ही संग्राम किया है; न कि उससे यह अर्थ निकलता है कि समन नामक संगठन के अंतर्गत युद्ध दौड़ तथा नाटक आदि आयोजन होते थे । 

   इस पूरे प्रसंग एवं उद्धरणों पर दृष्टिपात करने पर इससे जुडे़ कुछ अन्य प्रश्न भी उपस्थित होते हैं । श्री उपाध्याय जिस समन नामक संगठन केा समाज में अत्यधिक प्रभावी बता रहे हैं; उसे स्पष्ट करने के लिये उन्होंने जिस उद्धरणों को आधार माना है; वे सारे ऋग्वेद से हैं

  साथ ही साथ वे समन नामक संगठन का संबंध अशोक काल की समज्ञा नामक संगठन से मानते हैं जिसको अशोक ने समाप्त करवाया था - (7) । 

 किसी अन्य वेद में अथवा वैदिक साहित्य में समन नामक संगठन के बारे में कोई उल्लेख उन्होंने नहीं 

किया ।

  निरूक्त (8) तथा निघण्टु (9) में समन शब्द की व्याख्या प्राप्त होती है । लेकिन उसके बारे में कोई संकेत श्री उपाध्याय जी ने नहीं दिया है । जबकि यह उल्लेखनीय है कि निरूक्त तथा निघण्टु में समन का जो अर्थ प्राप्त होता है उसी का विस्तार सायण भाष्य में भी होता है । 

  पाणिनि तथा पंतजलि ने भी समन नामक संस्था का उल्लेख नही किया है । 

 ऋग्वैदिक काल में वैदिक विद्यापीठ  के अर्थ मे चरणो का उल्लेख महाभाष्य मे मिलता है । किन्तु वैदिक काल के पश्चात चरणो  का उल्लेख प्राप्त नही होता है। यदि समन नामक संस्था होती तो पूरे वैदिक साहित्य में कही न कही इसका वर्णन प्राप्त होता । 

 

    उपर्युक्त विश्लेषण से स्पष्ट है कि उपाध्याय जी की समन परक व्याख्या पूर्णतया भ्रामक तथा काल्पित है। 

     यहाँ इस संदर्भ में यह भी स्पष्ट करना आवश्यक है कि समन नामक संगठन की अवधारणा तथा उसका उल्लेख अन्य इतिहासकारों ने भी किया है । उदाहरणार्थ विनोद चन्द्र पाण्डेय (10) किन्तु ऋग्वेद में नारी की स्थिति को लेकर संस्कृतज्ञों  ने जो विचार व्यक्त किये हैं । वहां समन को संगठन मानकर मत व्यक्त नही किया गया है जो यह स्पष्ट करता है कि इतिहासकारों ने केवल Maxmuller के कथन के आधार पर ही अपना निष्कर्ष किया है । मूल ऋग्वेद एवं उसके अर्थ पर विचार नही किया । 

ऋग्वेद में गणों का उल्लेख प्राप्त होता है:- 

संदर्भ सूची- 

(10) प्राचीन भारत का राजीनीति तथा सांस्कृतिक इतिहास पृ0 114

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