"Sanskrit Gyan Jyotsna: संस्कृत नाटकों में प्रयुक्त सम्बोधन पदों में औचित्य

संस्कृत नाटकों में प्रयुक्त सम्बोधन पदों में औचित्य

 

नाटकों में प्रयुक्त सम्बोधन पदों में नाटय धर्मी एवं

लोकधर्मी परम्परा का अन्तः सम्बन्ध

 

     भाषा अभिव्यक्ति का साधन है। वाचिक सम्प्रेषण में परस्पर वार्तालाप करते समय संवाद का महत्व सर्वविदित है किन्तु इसके साथ ही साथ इन संवादों में आने वाले सम्बोधन पद का भी विशिष्ट महत्व है।पाणिनि ने “दूराद्धूते च’’ के द्वारा सम्बोधन का विधान किया है किन्तु सम्बोधन पद को केवल इतनी ही सीमा में बांधा नहीं जा सका हैं। क्योंकि ये सम्बोधन पद अपने छोटे से कलेवर में बहुत सारी बातें कह जाते हैं। एक ही पद कभी क्रोध - रे।, कभी आश्चर्य अरे ! ;कभी धिक्कार हा धिक् !; कभी आदर - भगवन्, देव,;कभी प्रेम - प्रिये, सुन्दरि!; कभी दूर से बुलाने के लिये भोः भोः आदि हेतु प्रयुक्त होते हैं। कभी-कभी तो पूरे वाक्य की अभिव्यक्ति कर देते हैं जैसे मुझे धिक्कार है - हा धिक्। हा धिक्।

       इसके साथ ही साथ सम्बोधन पदों से पारस्परिक सम्बन्ध, सामाजिक स्थिति, मानसिक स्थिति का भी ज्ञान होता है। यह व्यवहारिक ज्ञान लोक में नित्य प्रति परस्पर वार्तालाप में स्पष्ट दिखाई पड़ता है। नाटकों में भी इन सम्बोधन पदों का अत्यधिक प्रयोग देखा जाता है तथा कवियों ने सम्बोधन पदों का कुशल प्रयोग करके उसे भावाभिव्यक्ति के एक सशक्त माध्यम के रूप में स्थापित किया है। यही कारण है कि शास्त्र एवं लोक दोनों में ही सम्बोधन पद केवल सम्बोधन मात्र ही नहीं होते हैं बल्कि उनके माध्यम से सामाजिक भाषा के स्वरूप एवं परिवर्तन पर भी प्रकाश पड़ता है।

       प्रस्तुत शोधपत्र में मुख्य रूप से कालिदास कृत  अभिज्ञानशाकुन्तलम् (1 ), शूद्रक  कृत मृच्छकटिकम्(2) तथा भवभूति कृत उत्तररामचरितम्(3) के परिप्रेक्ष्य में सम्बोधन पदों में नाट्यधर्मी एवं लोकधर्मी के अन्तः सम्बन्धों का विश्लेषण किया गया है।

       व्यक्ति को सम्बोधित करने के नाट्यशास्त्रीय मानदण्डों का उल्लेख नाट्यशास्त्र  अध्याय17/65-94, दशरूपकम् द्वितीय प्रकाश 67-71, साहित्य दर्पण षष्ठ अध्याय 144 से 157, नाट्य दर्पण चतुर्थ अध्याय 294-297 में प्राप्त होता है। इन सभी में सम्बोधन प्रकार का वर्णन किया गया है।किन्तु वे प्रकार सभी प्रकार के संबोधन के लिये पर्याप्त नही  है इसलिये  कवियो  ने उन मर्यादाओ से अलग भी अनेक पदो का प्रयोग किया है।

 

       नाटकों में प्रयुक्त सम्बोधन पदों का विश्लेषण करने पर उन्हें निम्नलिखित समूहों में रखा जा सकता है -

1.नाते रिश्ते के सम्बोधन पद - इस श्रेणी में वे सम्बोधन पद आते हैं। जो सामान्यतया रक्त सम्बधों पर आधारित होते हैं। इस श्रेणी में पिता-पुत्र, पिता-पुत्री, पति-पत्नी, माता-पुत्र, भाई-भाई आदि सम्बोधन पद आते हैं।

       सामान्यतया लोक एवं नाटकों दोनों में ही इसी रूप में तत् - तत् सम्बोधनों का प्रयोग प्राप्त होता है जैसे - माता के लिये पुत्र द्वारा अम्बे, पिता के द्वारा पुत्र के लिय वत्स, पत्नी के द्वारा पति के लिये स्वामी । पुत्र एवं पुत्री के द्वारा पिता के लिये तात आदि सम्बोधन सामान्य रूप से प्राप्त होते है।

       नाट्यशास़्त्रीय परम्परा में कुछ स्थानों पर उपर्युक्त परंपरा  से भिन्न सम्बोधन पदों के प्रयोग का विधान है –

रथी सूतेन चायुष्यान्पूज्यैः शिष्यात्मजानुजाः।

वत्सेति तातः पुज्योपि सुग्रहीताभिधस्तु तैः।(4)

  अर्थात् सारथि रथ के स्वामी को आयुष्मान् कहकर सम्बोधित करें।  गुरूजन - शिष्य, पुत्र तथा छोटे  भाई को वत्स पुकारे। शिष्य, पुत्र तथा छोटा भाई - पूज्यजनों को तात या सुगृहीतनामा शब्द से सम्बोधित करे। अनुचर जन कुटटनी को अम्ब  शब्द से तथा सभी लोग पूज्य वृद्धा को अम्ब शब्द से पुकारे।

       शास्त्रीय मानदण्डों के अनुसार ही ये सम्बोधन नाटकों में प्राप्त हैं। यथा-

 

 

नाटक 

संबोधन

कर्ता 

संबोधितव्यक्ति 

पद

उल्लेख

1

उत्तररामचरित

राम

लक्ष्मण

वत्स

अंक7 पृष्ठ 460

 

2

अभिज्ञानशाकुन्तलम्

अनुसूया

कण्व

तात

अंक4 पृष्ठ 239

 

3

उत्तररामचरित

तमसा

सीता

वत्से

 अंक3  पृष्ठ  253

4

अभिज्ञानशाकुन्तलम्

मातलि

दुष्यन्त

आयुष्मान्

अंक7 पृष्ठ  400

       शास्त्रों की उपर्युक्त मर्यादा का पालन करने के अतिरिक्त कुछ स्थल ऐसे भी हैं जहां पर रक्त सम्बन्ध न होते हुए भी रक्त सम्बन्ध के सम्बोधनों का प्रयोग दिखाई देता हैं वे स्थल द्रष्टव्य हैं -

()      शकुन्तला ऋषि कण्व की पालित पुत्री है। रक्त सम्बंध न होते हुए भी उनमें पिता पुत्री का  सम्बन्ध है। यही कारण है कि शकुन्तला की विदाई के समय पिता कण्व का गला रूद्ध  जाता है।कण्व शकुन्तला को वत्से  सम्बोधन(5  ) तथा शकुन्तला कण्व को तात शब्द से सम्बोधित करती है। (6)

()वसन्तसेना – चारूदत्त  के पुत्र रोहसेन को जात(7)कहकर सम्बोधित करती है। बच्चों के प्रति पुत्र आदि सम्बोधन सामान्यतया लोक मे भी  देखे जाते हैं।

()अभिज्ञानशाकुन्तलम्  में मृग को वत्स(8) सम्बोधन से कहा गया है इसी प्रकार उत्तर रामचरित में मयूर के लिये वत्स(9) सम्बोधन प्रयुक्त है। लोक में भी पालतू पशु पक्षी को भी  पुत्र, मेरा बेटा, आदि सम्बोधन पदो  से संबोधन  दृष्टिगोचर होते हैं।

2.पारस्परिक सम्बोधन - समान आयु स्तर पद के व्यक्ति अधिकांशत परस्पर मित्र, सखि, हला आदि शब्दों से सम्बोधित करते हैं। यथा -

      

नाटक   

 

संबोधनकर्ता

संबोधित

व्यक्ति

पद

 

उल्लेख

 

अभिज्ञानशाकुन्तलम्

अनुसूया

शकुन्तला

सखि, हला

अंक3  पृष्ठ 144

 

अभिज्ञानशाकुन्तलम्

विदूषक

राजा

वयस्य, सखे,

अंक2 पृष्ठ 97

 

अभिज्ञानशाकुन्तलम्

राजा 

विदूषक

वयस्य, सखे,

अंक6   पृष्ठ 335

 

 

3.नामोल्लेख द्वारा सम्बोधन - व्यक्ति को उसके नाम से सम्बोधित करने की शास्त्रीय मान्यता के अनुसार राजा विदूषक को नाम से सम्बोधित कर सकता है। पति पत्नी को नाम से सम्बोधित कर सकता है। ज्येष्ठ ,मध्यम ,और  अधम पात्र स्त्रियों को भी उनके पति के समान नाम  से सम्बोधित कर  सकते हैं।

              इन नियमों का पालन नाटकों में पाया जाता है जैसे-

नाटक

संबोधनकर्ता

संबोधित

व्यक्ति

पद

उल्लेख

अभिज्ञानशाकुन्तलम्

राजा

विदूषक

माधव्य

अंक2 पृष्ठ 111

अभिज्ञानशाकुन्तलम्

दुष्यन्त

शकुन्तला

शकुन्तले

अंक7 पृष्ठ435

अभिज्ञानशाकुन्तलम्

राजा

मातलि

मातले

अंक7 पृष्ठ 437

अभिज्ञानशाकुन्तलम्

काश्यप

अनुसूया

अनुसूये

अंक4  पृष्ठ 239

अभिज्ञानशाकुन्तलम्

काश्यप

शार्ङ्गरव

शार्ङ्गरव

अंक 4  पृष्ठ 227

उत्तररामचरित

राम

वासन्ती 

वसन्ति 

अंक3  पृष्ठ247 

मृच्छकटिकम्

विट   

वसन्तसेना   

वसन्तसेने

अंक5  पृष्ठ  210

मृच्छकटिकम्

चेट   

रदनिका 

 रदनिके 

अंक6   पृष्ठ  240

 

 

       लोक में उच्च पद या अधिक उम्र वाले  व्यक्ति निम्न पद या कम उम्र वाले व्यक्ति का नाम लेते हैं। कम उम्र वाले व्यक्ति भी  निम्न पद और अधिक  उम्र वाले व्यक्ति का नाम लेते है ।यह उल्लेख नाटकों में भी प्राप्त  होते है –जैसेमृच्छकटिकम् मे बच्चा दासी रदनिका को   रदनिके कहकर सम्बोधित करता  है(10 )।

         

       पदोल्लेख पूर्वक भी अनेक सम्बोधन प्राप्त होते हैं यथा राजा को संबोधित करने के लियेराजन् (11 ) महाराज(12 ), देव(13 ),र्तुः(14 ) आर्यपुत्र(15 ) का प्रयोग सारथि के लिये सूत(16), का प्रयोग आदि देखे जाते है

4.आदर पूर्वक सम्बोधन – समाज  में विभिन्न वर्गो के पात्रों के द्वारा भिन्न - भिन्न प्रकार के आदर सूचक सम्बोधनों का प्रयोग होता है। इस सम्बन्ध में शास्त्रों का कथन है कि

भगवन्तो  वरैर्वाच्या  विद्वद्देवर्षिलिङ्गिनः  ।विप्रामात्याग्रजाश्चार्या नटीसूत्रभृतौ मिथः ।।

   दशरूपकम्   प्रकाश 2/67

       अर्थात् उत्तम पात्र - विद्वान देव, ऋषि, सन्यासी को भगवन् कहकर सम्बोधित करे और ब्राह्मण अमात्य तथा बड़े भाई को आर्य कहकर। नटी और सूत्रधार भी एक दूसरे को आर्य शब्द से सम्बोधित करे ।   

नाटकों में यह उल्लेख यथा स्थान प्राप्त हुए हैं जैसे -

नाटक

संबोधनकर्ता

संबोधित

व्यक्ति

पद

उल्लेख

उत्तररामचरित

सीता

वाल्मीकि

भगवन्

अंक7 पृष्ठ  485

उत्तररामचरित

राम

अष्टावक्र

भगवन्

अंक1  पृष्ठ  33

उत्तररामचरित

लक्ष्मण

राम

आर्य

अंक1  पृष्ठ  73

अभिज्ञानशाकुन्तलम्

सूत्रधार

नटी

आर्ये

अङ्क 1 पृष्ठ 11

 

दशरूपक  में वर्णित  हैं-

भावोsनुगेन सूत्री च मार्षेत्येतेन सोऽपि च।

पारिपार्श्वक - सूत्रधार को भाव(17) शब्द से तथा पारिपार्श्वकको सूत्रधार मार्ष (18)शब्द से सम्बोधित करें।उत्तर राम चरित के प्रथम अंक में सूत्रधार और नट  के संवाद में नट सूत्रधार को भावसम्बोधन से पुकारता हैं।वस्तुतः यहां पर पारिपार्श्वक नहीं है किन्तु पारिपार्श्वक का अर्थ है सहचर और यह कार्य नट  के द्वारा सम्पादित किये जाने के कारण भाव एवं  मारिष सम्बोधन युक्ति युक्त है।

(5)सर्वनाम विशेषण पदो का सम्बोधन हेतु  प्रयोग- विदूषक  रानी तथा सेविका को भवती(19  )शब्द से पुकारे।

       नाटकों में विशेषण पदों का भी सम्बोधन के रूप में अत्यधिक प्रयोग दिखाई देता है। यद्यपि विशेषण पदों के सम्बंध में शास्त्रीय मानदण्डों का विधान नहीं है फिर भी  यह प्रयोग वस्तुतः व्यक्ति की भावनाओं एवं सम्बन्धों के फलस्वरूप दृष्टिगोचर होता है। यथा - सुन्दरि। प्रिये। मूर्ख ! निष्ठुर आदि।

नाटक

संबोधनकर्ता

संबोधित

व्यक्ति

पद

उल्लेख

 

अभिज्ञानशाकुन्तलम्

दुष्यन्त

शकुन्तला

प्रिये!

अंक7 पृष्ठ  429

 

अभिज्ञानशाकुन्तलम्

दुष्यन्त

विदूषक

मुर्ख!

अंक7 पृष्ठ  460

 

अभिज्ञानशाकुन्तलम्

दुष्यन्त

शकुन्तला

सुन्दरि!

अंक7   पृष्ठ  430

 

अभिज्ञानशाकुन्तलम्

दुष्यन्त

शकुन्तला

निष्ठुर

अंक पृष्ठ 

 

अभिज्ञानशाकुन्तलम्

दुष्यन्त

शकुन्तला

भीरू!

अंक3  पृष्ठ  १७०

 

 

(6)सम्बोधन और अपशब्द -    संस्कृत नाटकों के सम्बोधनों में अपशब्दों का प्रयोग भी प्राप्त होता है। वस्तुतः नाटकों में अपशब्द का प्रयोग दो कारणों से दिखाई पड़ता है -

(1)परिस्थिति जन्य

(2)निम्न वर्ग के लोग अथवा प्रतिनायक के मुख से

अपशब्दों के  प्रयोग    मे परिस्थिति जन्य कारण तब होता है जब अत्यधिक क्रोध या दुख से असन्तुलन होने पर व्यक्ति स्वीकृत मानदण्डों की अवहेलना का बैठता है। जैसे शाकुन्तलम् में दुष्यन्त के द्वारा न पहचाने जाने तथा  पत्नी रूप में स्वीकार न किये जाने पर शकुन्तला दुष्यन्त को अत्यधिक क्रोध  मे अनार्य (20) सम्बोधन से सम्बोधित करती है।

              इसी प्रकार प्रतिनायक के मुख सेमृच्छकटिकम् में अनेक अपशब्दों का प्रयोग प्राप्त होता है यथा –

नाटक

संबोधनकर्ता

संबोधित

व्यक्ति

पद

उल्लेख

 

मृच्छकटिकम्

शकार

चारूदत्त

अरे स्त्री घातक

नवम अंक पृष्ठ 358

 

मृच्छकटिकम्

शकार

वृद्धा

गर्भ दासी

नवम अंक पृष्ठ376

 

 

 

 

 

 

 

 

 

       मृच्छकटिक मे निम्न वर्ग के पात्र माथुर द्वारा धूर्त(21 ), वेश्यापुत्र(22 ), मूर्ख (23 ), पुंश्चलीपुत्रक(24 ) आदि अपशब्दों के द्वारा उसके अधम कोटि के पात्र का बोध कवि ने कराया है।

       इसी प्रकार कुछ अनादर द्योतक शब्द व्यक्ति के अतिरिक्त अन्य वस्तुओं के लिये भी प्राप्त होते है यथा -

 

नाटक

संबोधनकर्ता

संबोधित

व्यक्ति

पद

उल्लेख

1-

उतररामचरित   

राम

हस्त

रे हस्त !

 अंक2   पृष्ठ१४७

                       

(7)  सम्बोधन  पद एवं संवेग - सम्बोधन पदों के माध्यम से संस्कृत नाटकों में मन के संवेगों की अभिव्यक्ति भी प्राप्त होती है। यथा - उत्तर राम चरित (25)के प्रथम अंक में राम निरपराध सीता के अपवाद को सुनकर अत्यन्त  दुखी हो जाते है तथा सीता के लिये अनेक सम्बोधन पदों का प्रयोग कर  विलाप करते हैं। उनका यह विलाप व्यन्जना  प्रधान सम्बोधन पदों से और भी मार्मिक हो गया है यथा -

              हा देवि देवयजनसंभवे! हा स्वजन्मानुग्रहपवित्रितवसुन्धरे!      हा मुनिजनकनन्दिनि ! हा पावकवसिष्ठारून्धतीप्रशस्तशीलशालिनि  !       हा राममयजी विते ! हा महारण्यवासप्रियसखि ! हा तातप्रिये !

हा स्तोकवादिनि!कथमेवम्विधायास्तवायमीदृशः परिणामः ?

 

       प्रिय को याद करके इस प्रकार का विलाप लोक के भी देखा जाता ही उसी का कुशल प्रयोग भवभूति ने किया हैं।

उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि कालिदास, शूदक एवं भवभूति तीनों ने ही नाट्यशास्त्रीय परम्परा का पालन करते हुए सम्बोधनों का यथोचित प्रयोग किया है। तथा प्रसंगानुसार लोक का प्रभाव भी इन सम्बोधन पदों में दृष्टव्य होता है। अतः यह कहा जा सकता है कि कवियों ने सम्बोधन पदों के प्रयोग में नाट्यधर्मी एवं लोकधर्मी दोनों परम्पराओं का अनुसरण किया है।

              वस्तुतः शास्त्रों द्वारा वर्णित सम्बोधनों में सम्बोधनों के सम्बन्ध में विस्तृत उल्लेख प्राप्त नहीं है। शास्त्रीय उल्लेखों ने कवियों को एक दिशा दिखाई है।

       जैसे श्रद्धेय व्यक्ति को समुचित आदर आदि के साथ सम्बोधन किया जाय तथा दूसरी ओर नट ,सूत्रधार, पारिपार्श्विक  आदि पात्र जो लोक में प्राप्त नहीं है वे परस्पर संवाद में किन सम्बोधनों का प्रयोग करें इस हेतु भी दिशा निर्देश दिया है।

              किन्तु यह निर्देश विभिन्न प्रकार के सम्बोधन के लिये पर्याप्त नहीं है। इसीलिये कवियों ने उन  मर्यादाओं से अलग सम्बोधन पदों का प्रयोग किया है। वे पद एवं सम्बोधन लोक से प्रेरित हैं जो नाटकों के लोकवृत्तानुकरणम्  को स्पष्ट करते है तथा शास्त्र एवं लोक के मध्य अन्तः सम्बंध स्थापित करते हैं।

 

                                 

             

 

संदर्भ सूची –

1-         अभिज्ञानशाकुन्तलम्-कपिल देव द्विवेदी ,साहित्य संस्थान ,4 मोतीलाल नेहरू रोड , इलाहाबाद ,1980

2-मृच्छकटिकम् -श्री निवास शास्त्री ,साहित्य भण्डार ,सुभाष बाजार ,मेरठ ,1983 

 

3 –उत्तररामचरित-कृष्णकान्त शुक्ल ,साहित्य भण्डार ,सुभाष बाजार ,मेरठ ,1999

4-दशरूपक 2/ 68

5-अभिज्ञानशाकुन्तलम्  अंक 4   210 ,

6 -अभिज्ञानशाकुन्तलम्,अंक4  पृष्ठ 219

7 -मृच्छकटिकम् ,अंक6  पृष्ठ  240

8 -अभिज्ञानशाकुन्तलम्अंक4  पृष्ठ  223

9- उत्तररामचरितअंक3  पृष्ठ  223

             

10 -मृच्छकटिकम्अंक6  पृष्ठ     238

11 -अभिज्ञानशाकुन्तलम् अंक6   पृष्ठ  382

12-अभिज्ञानशाकुन्तलम्अंक7 पृष्ठ 425

13-अभिज्ञानशाकुन्तलम्अंक5 पृष्ठ  251,253

उत्तररामचरितअंक3  पृष्ठ  252

14-अभिज्ञानशाकुन्तलम् अंक2  पृष्ठ 129

15-अभिज्ञानशाकुन्तलम् अंक3  पृष्ठ  256,7/434

16-अभिज्ञानशाकुन्तलम् अंक1  पृष्ठ 18,23

17-उत्तररामचरित अंक1पृष्ठ19

18-उत्तररामचरित अंक1  पृष्ठ 23

१९-मृच्छकटिकम् अंक 4   पृष्ठ 184

20 -अभिज्ञानशाकुन्तलम् अंक5   पृष्ठ 288

21  -मृच्छकटिकम्अंक2   पृष्ठ  90

22 -मृच्छकटिकम्अंक2   पृष्ठ 87

23 -मृच्छकटिकम्अंक2  पृष्ठ 87

24 -मृच्छकटिकम्अंक2   पृष्ठ 87       

25-उत्तररामचरित अंक1  पृष्ठ 101

 

 

             

 

 

      

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