आयुर्वेदीय चिकित्सा पद्धति का
प्रयोजन और वात पित्त और कफ का सिद्धांत
आयुर्वेदीय चिकित्सा पद्धति का दो प्रयोजन है -
1- ऐसे भोजन, देश - काल तथा कार्यों का
उपदेश,जिसके द्वारा व्यक्ति स्वयं अपने
स्वास्थ्य को स्वस्थ रख सके तथा निरोगी रह
कर दीर्घायु होवे।
2- अहित आहार -विहार के सेवन से यदि
व्यक्ति रोगी हो गया है ,तो क्या उपचार करें ?
जिससे वह व्यक्ति रोगमुक्त हो जाए ।
आयुर्वेद के प्रथम प्रयोजन के उपदेश “ स्वस्थ
वृत्त” के अंतर्गत वर्णित है।स्वस्थ वृत्त के भी दो
भाग हैं -
1- असाधारण स्वस्थ वृत्त- जो व्यक्ति के
स्वास्थ्य से सम्बंधित हैं और जिस के नियम
प्रत्येक पुरुष के लिए आचरण योग्य हैं । तथा
2-साधारण स्वस्थ वृत्त -जो जन सामान्य के
स्वास्थ्य से सम्बंधित हैं ,जिस के अंतर्गत नगर
के कूड़े कचरे को दूर करने, वायु शुद्धि द्वारा रोग
निवारण आदि कार्यों का वर्णन है ।
आयुर्वेद के द्वित्तीय प्रयोजन का विस्तार 8
अंगों में विभक्त समग्र आयुर्वेद में है अर्थात् रोगों
को दूर करने के लिए रोगों के लक्षणों का ज्ञान
तथा रोग का निदान वर्णित है ।
इस प्रकार आयुर्वेद का ज्ञान जहां स्वस्थ व्यक्ति
के लिए महत्वपूर्ण है ,वहीँ रोगी के लिए भी
आवश्यक है ।
आयुर्वेद के अनुसार यह शरीर 1-दोष (जिसे
आयुर्वेद में वात पित्त और कफ कहा जाता है),
2-धातु(रस , रक्त , माँस, मेदस् , अस्थि ,मज्जा, शुक्र धातु)
3- उपधातु तथा 4-मल (जिसे आयुर्वेद में
किट्ट कहा जाता है)के समुदाय से बना है ।
यह वात पित्त और कफ शरीर के प्रत्येक
सूक्ष्म तथा स्थूल अवयव में विद्यमान है । शरीर
में प्रत्येक अंग के प्रकृति द्वारा नियत ;गुण और
कर्म हैं तथा अपने कार्यों के सम्पादन के लिए
प्रत्येक अंग के वात पित्त और कफ को एक
निश्चित मात्रा में रहना आवश्यक है ।
शरीरगत वात पित्त और कफ में क्रिया या विकृति
होती है, अतएव ये तीनों “दोष” कहे जाते हैं ।
जब वात पित्त और कफ निश्चित मात्रा से न तो
अधिक होते हैं और न कम ,बल्कि यथा योग्य
परिमाण में होते हैं तभी वह अंग अपनी प्रकृति
नियत गुण कर्मों को भली प्रकार से कर सकता
है । जब वात पित्त और कफ अपने प्रमाण में
होते हैं तब उन्हें सम या प्राकृत कहा जाता है
तथा उनकी इस स्थिति को साम्यावस्था कहते हैं।
दूसरे शब्दों में दोष(वात पित्त और कफ) की
साम्यावस्था में धातु ,उपधातु तथा मलकी
साम्यावस्था भी होती है यही उत्तम स्वास्थ्य है ।
किंतु यदि यह वात पित्त और कफ ,धातु- उपधातु
तथा मल समता से भिन्न अवस्था को अर्थात
विषमता को प्राप्त होते हैं तो उसे वैषम्य कहते
हैं ।
इस अवस्था में वात पित्त कफ, धातु ,उपधातु
तथा मल या तो वृद्धि को प्राप्त होते हैं या
क्षीणता को प्राप्त होते हैं । जब यह वृद्धि को
प्राप्त होते हैं तो अपनी प्रकृति नियत गुण कर्मों
को अधिक मात्रा में करने लगते हैं,जैसे कफ की
अधिकता होने पर कफ अधिक बनेगा और व्यक्ति
खांसी,जुकाम से विकार ग्रस्त होगा ।
दूसरी स्थिति में यह क्षीण होते हैं ,तो उनके
स्वाभाविक गुण ,कर्म न्यून मात्रा में होते हैं
जिससे शरीर में उन उन कार्यों को करने में क्षीणता
आती है ।जैसे -पित्त कम बनने पर भोजन के
पाचन में क्षीणता आएगी और भूख नहीं लगेगी।
शरीर में वात,पित्त, कफ, धातु ,उपधातु तथा
मल की विषमता ही रोगों को उत्पन्न करते हैं ।
वात आदि दोषों में से किन्ही दो दोषों के क्षय एवं
वृद्धि होने से जो विकृति होती है उसे संसर्ग कहते
हैं । जैसे –वात का वृद्ध (अधिक)होना और पित्त
का क्षीण (कम )होना ।या कफ का वृद्ध
(अधिक)होना और वात का क्षीण (कम )होना
इत्यादि । किन्तु किन्ही तीन दोषों के क्षय एवं वृद्धि होने से जो विकृति होती है ,उसे सन्निपात कहते हैं ।जैसे - वात कावृद्ध (अधिक)होना और पित्त का मध्य होना और कफ का अल्प (कम )होना ।या पित्त का वृद्ध (अधिक)होना और कफ का मध्य होना और वात का अल्प (कम )होना ।
अतः वात पित्त और कफ की विकृति से लक्षणों को पहचान कर और उन्हें पुनः साम्यावस्था में लाना ही,रोग का निदान है।
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