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प्रो. कमलेशदत्त त्रिपाठी :व्यक्तित्व,कृतित्व और साहित्यिक अवदान

        साहित्य अकादमी पुरस्कार से पुरस्कृत तथा विश्व विश्रुत कालिदास अकादमी (उज्जैन) के निदेशक के पद पर कार्यरत प्रो० कमलेश दत्त त्रिपाठी (1) देश विदेश में भारतीय विद्याविद और शास्त्रविद् के रूप में प्रख्यात है । अत्यधिक शान्त एवं सरल स्वभाव वाले त्रिपाठी जी के तीक्ष्ण ज्ञान चक्षु, पाण्डित्यपूर्ण लेखनी, तेजस्वी व्यक्तित्व का प्रभाव उनके कार्यों में स्पष्ट परिलक्षित होता है।अपनी उल्लेखनीय साहित्य साधना एवं अप्रतिम सर्जनात्मक प्रतिभा से प्रोफेसर त्रिपाठी ने संस्कृत को समृद्ध कर जो प्रतिमान स्थापित किये हैं, वह उल्लेखनीय है। धर्म, दर्शन और व्याकरण पर उनका पूर्ण अधिकार रहा है।नाटयशास्त्र एवं संस्कृत रंगमंच को उन्होने पुनर्जीवन प्रदान किया है। विदेशों में संस्कृत का प्रचार प्रसार करके,उसे विस्तृत फलक पर ले जाने वाले प्रोफेसर त्रिपाठी महान साहित्यकार एवं समीक्षक हैं ।      सौन्दर्य शास्त्र, नाटयशास्त्र एवं संस्कृत रंगमंच के क्षेत्र में,वे जीवन भर सक्रिय रहे । शास्त्र और प्रयोग दोनों में समान रूप से उनकी रूचि और गति रही है, शायद इसी कारण ...

मानसिक स्वास्थ्य का स्वरूप ( संस्कृत ग्रंथों के अनुसार )

          सामान्यतया स्वारथ्य का तात्पर्य शारीरिक स्वस्थता से लिया जाता है। आजकल व्यक्ति  इसी शारीरिक स्वास्थ्य को प्राप्त करने हेतु जागरूक एवं प्रयत्नशील दिखाई देते हैं किंतु मानसिक स्वास्थ्य की उपेक्षा कर रहे है ।     प्राचीन  संस्कृत ग्रंथों में शारीरिक स्वास्थ्य के साथ-साथ मानसिक स्वास्थ्य को भी अत्यधिक महत्व प्रदान  किया गया  है । फलस्वरूप संस्कृत ग्रंथों के अनुसार शरीर और मन की स्वस्थता ही रवास्थ्य है।     संस्कृत ग्रंथों की इस अवधारणा को आधुनिक चिकित्सा शास्त्री भी मानने लगे हैं । तदनुसार ही  विश्व स्वास्थ्य संगठन ने स्वास्थ्य की परिभाषा दी है - Health is the physical mental, and social  wellbeing of man and  not merely the absence of disease or infirmity.    अतः मानसिक स्वारथ्य भी स्वास्थ्य सामान्य का ही अंग है । स्वास्थ्य की यह परिभाषा  संस्कृत के अति प्राचीन ग्रंथ सुश्रुत संहिता में प्राप्त होती है- समदोषः समाग्निश्च समधातु मलक्रियः । प्रसन्नात्मेन्द्रिय मनाः स्वस्थ्य इत्यभिधीयते ।।...

आधुनिक कथा साहित्य और नारी का बदलता स्वरूप एक मूल्यांकन

  आधुनिक कथा साहित्य और नारी का बदलता स्वरूप                             एक मूल्यॉकन         प्रमोद भारतीय कृत  सहपाठिनी के परिप्रेक्ष्य में              सहपाठिनी आधुनिक संस्कृत कथाकार श्री प्रमोद भारतीय की रचना है ।   जिसमें बारह कथाओंका संग्रह है तथा प्राचीन प्रसिद्ध कथा संग्रह -कथासरित्सागर  एवं  पंचतन्त्र  से नितांत भिन्न है । प्राचीन शास्त्रीय परम्परा से हटकर इस संग्रह को   रचनाकार ने नवीन कथानक  एवं नवीन शैली से सुसाज्जित किया है । प्रस्तुत संग्रह की  सभी कहानियॉ आत्मकथात्मक शैली में लिखी गई है ।           जैसा कि नाम से ही स्पष्ट  है यह  नायिका प्रधान रचना है। नारी के माता,बहन, पत्नी, प्रेमिका और पुत्री इन सभी रूपों  में  से कामिनी अथवा प्रेयसी रूप के चारों ओर ही ये कथाएं घूमती है, जिसके माध्यम से   कथाकार, पुरूष   एवं स्त्री के संबंधों को विभिन्...

जनार्दन प्रसाद मणि रचित 'नीराजना '

           आधुनिक संस्कृत साहित्य में डॉ. जनार्दन प्रसाद मणि विरचित  " नीराजना " काव्यकृति का एक महत्त्वपूर्ण स्थान है । यह काव्यकृति दो  भागों में विभक्त है-पूर्व भाग और उत्तर भाग । पूर्व भाग भगवान शिव को  समर्पित है तथा उत्तर भाग में भगवान् विष्णु की स्तुति की गई है ।                 प्रस्तुत काव्यकृति एक स्तोत्र काव्य है ,किन्तु प्रस्तुत स्तोत्र काव्य एवं  कवि की भक्ति ;निश्चित रूप से प्राचीन स्तोत्र काव्य परम्परा से भिन्न है।  प्रस्तुत कृति में कवि प्रभु के माहात्म्य मात्र का वर्णन नहीं करता है; वह  उनके महनीय कार्यों एवं अनुग्रहों को भी महिमा मंडित नहीं करता है ।वह   प्रभु भक्ति एवं प्रभु प्रेम में सुधबुध खोना भी नहीं चाहता है बल्कि दीपकों  से सुशोभित मणि जी की नीराजना है-मानव मात्र की पीड़ा, जो उनके  अन्तस्तल में प्रदीप्त है । उस पीड़ा के निवारणार्थ ही वह अपने एवं मानव   मात्र के कष्ट, प्रभु से निवेदित कर रहे हैं ।           स्त...

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