आधुनिक कथा साहित्य और नारी का बदलता स्वरूप एक मूल्यांकन


 आधुनिक कथा साहित्य और नारी का बदलता स्वरूप 

                           एक मूल्यॉकन
        प्रमोद भारतीय कृत  सहपाठिनी के परिप्रेक्ष्य में

 
           सहपाठिनी आधुनिक संस्कृत कथाकार श्री प्रमोद भारतीय की रचना है । जिसमें बारह कथाओंका संग्रह है तथा प्राचीन प्रसिद्ध कथा संग्रह -कथासरित्सागर  एवं पंचतन्त्र  से नितांत भिन्न है । प्राचीन शास्त्रीय परम्परा से हटकर इस संग्रह को रचनाकार ने नवीन कथानक  एवं नवीन शैली से सुसाज्जित किया है । प्रस्तुत संग्रह की सभी कहानियॉ आत्मकथात्मक शैली में लिखी गई है । 

         जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है यह नायिका प्रधान रचना है। नारी के माता,बहन, पत्नी, प्रेमिका और पुत्री इन सभी रूपों  में से कामिनी अथवा प्रेयसी रूप के चारों ओर ही ये कथाएं घूमती है, जिसके माध्यम से कथाकार, पुरूष एवं स्त्री के संबंधों को विभिन्न दृष्टिकोण से प्रस्तुत करने में समर्थ हो सका है । अतः  सहपाठिनी  पुस्तक में वार्णित नारी चरित्र का विश्लेषण आवश्यक है ।

    सर्वप्रथम प्राचीन काव्यशास्त्रीय परिप्रेक्ष्य में  सहपाठिनी  का मूल्यॉकन करें, तो हम देखते हैं कि साहित्य शास्त्र में नायिका तीन प्रकार की मानी गई है - स्वकीया, परकीया एवं साधारण स्त्री( 1) । स्वकीया नायिका के तीन भेद हैं। मुग्धा, मध्या और प्रगल्भा ।परकीया नायिका दो प्रकार की है - कन्या और विवाहिता ।  सहपाठिनी  में स्वकीया एवं परकीया दोनों ही प्रकार की नायिकाएं प्राप्त होती है । मलिनवसनम्, हृदयवेदना, अनुमतिः, कथाओं की नायिका स्वकीया है एवं पारितोषकम्
चक्रवात: की नायिका विवाहिता परकीया की कोटि में आती है एवं श्रृंगार रस का आलम्बन भी बनती है जबकि साहित्यशास्त्र की यह मर्यादा है कि जहॉ श्रृंगार रस हो उस श्रृंगार का आलम्बन परोढा को नहीं बनाया जा सकता -

                  नान्योढाs ड्गी रसे क़्वचित्

( 2) क़्योंकि इस प्रकार का प्रेम वर्णन रसाभास(श्रृंगाराभास) होगा । इसके साथ ही साहित्य शास्त्र की यह भी मान्यता है कि प्रणय निवेदन प्रथमतया नायक द्वारा ही होना चाहिये अन्यथा वहॉ भी श्रृंगाराभास का प्रसंग उपस्थित होगा । काव्यशास्त्र की उपर्युक़्त दोनों ही मान्यताओं का उल्लघंन प्रस्तुत कथासंग्रह में प्राप्त होता है । यद्यपि आचार्य भरत ने अत्यधिक उदार दृष्टिकोण अपनाते हुए कहा है कि कथाकार को लोक के अनुसार कथा में परिवर्तन करना चाहिए ।

 (3)किन्तु यदि शास्त्रीय दृष्टिकोण को छोड दे तो यह कहा जा सकता है कि सहृदय पाठक को रसास्वादन में कहीं भी बाधा उत्पन्न नहीं होती । जहॉ तक मेरा दृष्टिकोण है इन मान्यताओं के उल्लंघन का कारण समाज एवं नारी की स्थिति , जीवन शैली एवं विचारधारा में परिवर्तन है । इसी कारण आज के संस्कृत कवि जीवन के बदलते संन्दर्भों और आवश्यकताओं के अनुरूप स्वयं को ढालकर नये साहित्य का सर्जन करने में समर्थ हो सके है । उनके नव सृजित काव्य साहित्य में योरोप के स्वच्छन्दतावादी कवियों के प्रभाव तथा आधुनिक भाव बोध के साथ, नये परिवेश की अनुभूतियॉं संक्रान्त हुई है । आधुनिक
संस्कृत काव्य भी इसी प्रगतिशील भावना से पूर्णरूपेण समन्वित है ।
         प्राचीन कथानकों की नायिका सामान्यतया रानी रूप में चित्रित की गई है वह स्थिति आज प्राप्य नहीं है । फिर भी हम प्राचीन परिपाटी को मानकर, उसी रूप में यदि उन्हें चित्रित करेंगे तो वह पाठकों के उतनी करीब नहीं हो पायेगी । संभवतः यही कारण है कि प्राचीन नाटककारों में शूद्रक जन सामान्य का चित्रण करने के कारण अधिक लोकप्रिय हैं ।

             आज की नारी पुरूषों के समान ही पढ़ी लिखी है , सुसंस्कृत है। कहीं भी आने-जाने में स्वतंत्र है साथ ही अपनी जीवन वृत्ति के प्रति भी सचेत है । स्त्री और पुरूष की मित्रता भी आज समाज में देखी जाती है । इस प्रकार प्राचीन एवं आधुनिक सामाजिक परिस्थितियों में अत्यधिक अंतर दिखाई पडता है । अतः  प्राचीन संस्कृत साहित्य की नायिकाओं के लिये निर्मित मानदण्डों के द्वारा,आधुनिक परिवेश वाली इन कथाओं की नायिकाओं की तुलना करना न्यायसंगत नहीं होगाबल्कि इस विषय में यह आवश्यक है कि इन नायिकाओं का वैचारिक एवं मनोवैज्ञानिक विश्लेषण आधुनिक दृष्टिकोण से किया जाये ।

            साहित्य तो समाज का प्रतिबिम्ब होता है, इसलिए आज " के समाज में विद्यमान विभिन्न वैचारिक दृष्टिकोण एवं चरित्र वाली नारियों का चित्रण ही सहपाठिनी  की विभिन्न कथाओं में मिलता है । प्रस्तुत कथा संग्रह की नायिकायें 18 से30 वर्ष की है तथा सामान्य कोटि के नारीवर्ग का प्रतिनिधित्व करती है ।  सहपाठिनी कथा जिसके नाम पर पुस्तक का नाम रखा गया है, की नायिका केतकी नायक की सहपाठिनी है तथा नायक के विवाह प्रस्ताव को ठुकराते हुए कहती है कि सहपाठिनी जीवन संगिनी नहीं हो सकती । निाश्चित रूप से संस्कृत कथा परम्परा में यह एक नया अध्याय जोडता है । इसके विपरीत अनुमति कथा की नायिका सरिता अपने सहपाठी सागर की विवाह हेतु 12 वर्ष तक प्रतीक्षा करती है । तथा अपने प्रेम को सफल बनाती है ।इस प्रकार दोनों कथाओं की नायिकाए सहपाठिनी  के दो विपरीत स्वरूप को प्रदार्शित करती है । इस प्रकार  मलिनवसनम्  एवं आश्चर्यम्  कथा की नायिकाए भी एक दूसरे से सर्वथा विपरीत स्वभाव वाली है ।  मलिनवसनम्  की नायिका मधुमिता वेश्या की पुत्री होने पर भी एक सुशील एवं सुसंस्कृत दिखाई गई है । वह अपने वास्तविक स्वरूप को छिपाकर अथवा छल करके अपने प्रेम को सफल बनाना नहीं चाहती है जबकि आश्चर्यम् की नायिका सुचित्रा एक रईस जमीदार की सुन्दर इकलौती फुत्री है तथा नायक से विवाह होने के उपरांत भी पति की अनुपस्थिति में अन्य पुरूषों

के समीप जाती है । इसी प्रकार चक्रवात  की नायिका विवाहिता है एवं दो बच्चों की मॉं है । पति के अपने कार्य में अत्यधिक व्यस्त होने के कारण नायक का सामीप्य चाहती है । पारितोषिकम् की नायिका चक्रवात की नायिका से विपरीत स्वभाव की है । वह विवाहिता है किन्तु परपुरूष नायक की सहायता केवल शोध प्रबंध की रूपरेखा के निर्माण हेतु चाहती है । अपनी जीवनवृत्ति (carrer) का उत्कर्ष ही उसका लक्ष्य है जो उसकी एवं आधुनिक नारियों की अध्ययन एवं जीवनवॄत्ति के प्रति रूचि एवं लगन को प्रदार्शित करता है । वह नायक को मात्र मित्र के रूप में ही सामान्यतया चाहती है ।अंशकालिक पति की नायिका सुसंस्कृत एवं अध्यापिका है । वह बातचीत,उठने-बैठने के शिष्टाचार (manners) को अत्यधिक महत्व देती है और इसी कारण अपने पति को शासित (Dominate ) करती है ।

              'पक्षपात 'एवं 'चतुष्कोण' की नायिकाए नायक से आकर्षित हो उससे प्रेम करती है एवं मुग्धा नायिका की कोटि में आती है जबकि 'हृदयवेदना 'की नायिका गंभीर प्रकृति की है ,नायक से प्रेम करती है एवं प्रगल्भा नायिका की कोटि में आती है । 'सौप्रस्थानिकम् ' एवं  'व्याभिचारिणी 'में बेमेल विवाह की बुराई को दिखाया है । ' सौप्रस्थानिकम्' की सोलह वर्षीय नायिका का विवाह 40 वर्षीय व्यक्ति के  साथ होता है जिसके चार पुत्र है जो युवावस्था को प्राप्त है। वह पतिगृह से भाग जाती है किन्तु दैववश उसका विवाह अन्य व्यक्ति के साथ हो जाता है जहॉ वह सुखपूर्वक रहती है जबकि ' व्याभिचारिणी'' की नायिका बेमेल विवाह के पश्चात किसी अन्य युवक के
वाक़्जाल में फॅसकर पतित हो जाती है तथा समाज के कोप का भाजन बनती है ।कालांतर में जब उसे अपनी भूल का अहसास होता है वह वापस पति के पास आती है तब वह न केवल अपने परिवार की बल्कि समाज की सेवा में संलग्न हो समाजवादी दल की महिला प्रकोष्ठ की अध्यक्षा पद को अलंकृत करती है । अतः प्रस्तुत कथा से स्पष्ट है कि समाज व्यक्ति को उसके कार्यों के अनुरूप ही निान्दित एवं प्रशंसित करता है ।
    

               निष्कर्षत:'सहपाठिनी' की नायिकाए न तो एतिहासिक है और न ही अत्यन्त ऊॅचे आदर्शों वाली त्याग तपस्या की मूार्ति है बल्कि वह सामान्य नारी है जो पाठकों के
द्वारा नित्यप्रति अनुभव की जाती है । इस कारण ही वे अधिक जीवन्त एवं निकटस्थ प्रतीत होती है । अतः नायिकाओं के प्रकार एवं  स्थिति में प्राचीन काव्यशास्त्रीय परम्परा का
उल्लघंन कर जो परिवर्तन प्रस्तुत कथा संग्रह में दिखाई पडता है उसकी आवश्यकता 
निश्चित रूप से आज संस्कृत साहित्य को है क्योंकि ऐतिहासिक एवं दैवीय कथानक सामान्यतया व्यक्ति को अपने से नहीं लगते ।

    परिवर्तन प्रकृति का नियम है । आज समाज , परिस्थिति , व्यक्ति एवं उसकी विचारधारा में परिवर्तन दिखाई पड़ता है । उस प्रभाव से साहित्यकार अछूता कैसे रह सकता है । इसी कारण आज के संस्कृत साहित्यकार जीवन के बदलते संदर्भो और आवश्यकताओं के अनुरूप स्वयं को ढालकर नव साहित्य का सृजन कर रहे हैं । उनके इस नव सृजित काव्य साहित्य में आधुनिक भाव बोध के साथ-साथ नये परिवेश की अनुभूतियाँ संक्रान्त हुई है । पारंपरिक संस्कृत कवियों की परम्परा में एक समय ऐसा था जब आलंकारिक शैली पर अत्यधिक बल था तथा वे अत्यधिक आदर्शात्मक स्वरूप का निरूपण करते थे | राम को वनवास मिला लेकिन राम के मन में द्वन्द नहीं था कि वह बनवास जाये या पिता की आज्ञा का उल्लंघन कर राज्य प्राप्त करें । सीता के मन में भी द्वन्द नहीं था कि राम के साथ वन जाये अथवा नहीं। सर्वत्र एक आदर्शात्मक प्रवृत्ति दिखायी
पड़ती है किन्तु आधुनिक साहित्य में कवि आदर्श की स्थापना द्वन्द्व के परिप्रेक्ष्य में करता है| उदाहरणार्थ-" सौप्रस्थानिकम् एवं व्याभिचारिणी ।

        अतः जीवन तथा परिस्थिति में परिवर्तन के साथ-साथ
भाव दृष्टि भी परिवर्तित होती है । यथार्थ के नये पहलू दृष्टिगोचर होते हैं | स्त्री का जो स्वरूप आज से 100 वर्ष पूर्व था वह बिल्कुल परिवर्तित हो चुका है| अतएव काव्य में भी उस परिवर्तित स्वरूप का चित्रण आवश्यक है । उस परिवर्तित स्वरूप को एक ओर तो पुरानी परम्पराओं से पूर्णतया बांधा नहीं जा सकता तो दूसरी ओर उसे सर्वथा बन्धन रहित भी नहीं किया जा सकता है । क्योंकि बंधन रहित साहित्य भी बंधन रहित नदी की भांति विनाश का हेतु होगा ।

     अतः आधुनिक काव्यों एवं कवियों के मूल्यांकन हेतु हमें नयी दृष्टि एवं नये मानदण्डों की आवश्यकता है । आधुनिक कवियों के मूल्यांकन के संबंध में गजानन माधव मुक्तिबोध (4) ने उचित ही लिखा है- आज के विकासमान कवि को तीन क्षेत्रों में एक साथ संघर्ष करना है (क) तत्व के लिये संघर्ष (ख) आभिव्यक्ति सक्षम बनाने के लिये संघर्ष और (ग) दृष्टि विकास के लिये संघर्ष ।

         तत्व के लिये संघर्ष का अर्थ अपने वास्तविक जीवनानुभव को संदर्भ सहित व्यक्त करने के लिये उचित विषय संकलन के विवेक से संबंधित है । हमें अपने ही युग के ऐसे सारभूत बिम्बों और मूल प्रवृत्तियों को उठाना और चित्रित करना होगा जिससे कि हम अपना युग वस्तुतः जी सके और हम सच्चे अर्थों में समसामयिक हो पाएँ । विषय संकलन का विवेक हमारी अपनी अनुभूतिजन्य मार्मिक ज्ञान दृष्टि  से उत्पन्न होगा ।इसलिए यह आवश्यक है कि हमारा ध्यान दृष्टि विकास  की ओर जाये और हम आज के तनाव भरे जगत की मूल गति और दशा को समझ सके किन्तु विश्व दृष्टि का विकास तब तक नहीं होगा, जब तक हम मानवता के भविष्य निर्माण के संघर्ष में आस्था न रखे और आध्यात्मिक रूप से उससे संबद्ध न हो जाए ।"

    
                     सहपाठिनी का मूल्यांकन जब हम गजानंद
माधव मुवित्तबोध के मानदंडों के अनुसार करते हैं तो हम देखते हैं कि पारितोषकम्, व्यभिचारिणी, पक्षपातः, मलिनवसनम्, सहपाठिनी इत्यादि कथाओं की नायिकाओं में तत्व के लिये, अभिव्यक्ति को सक्षम बनाने के लिये तथा दृष्टि विकास के लिये संघर्ष है । इन संघर्षों के द्वारा ये नायिकाएं आधुनिक समाज की स्त्रियों के विचारों एवं मनोविज्ञान को प्रतिबिंबित करते हुए आदर्श स्थापित करती है । नायक एवं नायिका के मध्य आदर्श प्रेम की स्थापना लेखक ने मलिनवसनम् एवं अनुमतिः में की है वहीं दूसरी ओर आधुनिक समाज में स्त्री और पुरूष को मध्य पाई जाने वाली मित्रता सहपाठिनी ' एवं ' पारितोषिकम् 'कथाओं में देखी जा सकती है ।समाज में व्याप्त कुरीतियों को समाप्त करने का स्तुत्य प्रयास भी लेखक ने मलिनवसनम् में किया है | सौप्रस्थानिकम् तथा व्यभिचारिणी के द्वारा समाज में बेमेल विवाह पर कुठाराघात किया है| पक्षपातः के द्वारा लेखक विद्यार्थी नवयुवकों को यह संदेश देता है
कि विद्याध्ययन के समय वे अपना ध्यान अन्य स्थानों से हटाकर
अध्ययन में ही केन्द्रित करें ।

        किन्तु प्रस्तुत कथा संग्रह के 'चक्रवात 'तथा 'आश्चर्यम्'कथा की नायिकाओं के संबंध में मैं यह आवश्यक कहना चाहूँगी कि इन कथाओं की नायिकाओं के द्वारा नारी की स्वच्छन्दता का वर्णन करते हुए, लेखक नारी के मर्यादित स्वरूप का वर्णन  करता हुआ नहीं दिखाई पड़ता है बल्कि  उल्लंघन करता दिखाई पड़ता है । दोनों ही कथाओं की नायिकाएँ पति से सर्वथा असंतुष्ट नहीं है तथा नायक के विवाह प्रस्ताव को अस्वीकार कर देती है । नायिका के मन के संघर्ष एवं अन्तर्द्वन्द को उभारे बिना तथा किसी अन्य कारण के अभाव में नायिकाओं के इस स्वरूप का चित्रण निश्चित रूप से मर्यादित नहीं कहा जा सकता नवीन संबंधो की स्थापना के साथ-साथ क्या नये जीवन मूल्यों की संस्थापना के लिये प्रयासरत होना आधुनिक साहित्य का आधुनिक कवि का कर्त्तव्य नहीं है ? 
  डॉ हजारी प्रसाद द्विवेदी के शब्दों में - मैं उन रचनाओं को किसी प्रकार प्रगतिवादी मानने के पक्ष में नहीं हूँ जिनमें को नए सिरे से उत्तम रूप में ढालने का दृढ संकल्प न हो । रचना केवल
हमारी मानसिक चिंताओं का विश्लेषण करने का दावा करके जहाँ का तहाँ छोड़ देती है , उनमें गति नही है। उसे प्रगतिशील तो कहा ही नहीं जा सकता।

        अत: कथा का उददेश्य सदैव बोधात्मक ,उपदेशात्मक अथवा प्रेरणात्मक होना चाहिए।यथार्थ वर्णन उचित है किन्तु अतियथार्थता काव्य में त्याज्य है।
           सत्यस्य वचनं श्रेय: सत्यादपि हितं वदेत् ।

              अर्थात् यथार्थ चित्रण भी आदर्शोन्मुख होना चाहिये । केवल नवीनता या अतियथार्थ से प्रेरित काव्य आजकल के दूरदर्शन एवं चलचित्र की भांति हो जायेगा ।अत: कवि को सदैव ही नायक एवं नायिका के मर्यादित स्वरूप का ही वर्णन करना चाहिये।मृच्कछकटिकम् की नायिका गणिका है लेकिन फिर भी प्रेम एवं उसकी मर्यादा का पालन करती है।स्वेच्छाचारी नारी के बोधार्थ प्राचीन संस्कृत साहित्य का शुकसप्तति: उत्तम कथा ग्रंथ है। किंतु चक्रवात कथा की नायिका वाटिका एवं आश्चर्यम् की विवाहिता नायिका की चरित्रहीनता के कारण लेखक नारी के मर्यादित स्वरूप का उल्लंघन करता दिखाई देता है ऐसे साहित्य की रचना न हो, ऐसा प्रयास करना चाहिये। जिससे नारी की मर्यादा की रक्षा हो सके।

        अतः आज के संस्कृतज्ञ एवं काव्य शास्त्रियों को आचार्य भरत के समान यह प्रयास करना चाहिये कि आज की परिस्थितियों के अनुरूप नये मानदण्ड तैयार करें जिससे
हमें ऐसा स्वस्थ एवं सशक्त साहित्य प्राप्त हो जो मर्यादित हो, जिसके संघर्षों से प्रेरणा और प्रकाश ग्रहण कर सके तथा उनके संचित जीवन विवेक से स्वयं लाभान्चित हो सकें।

       दूसरी ओर कवि के लिये यह आवश्यक है कि यह मानवता के भविष्य निर्माण की ओर सचेष्ट हो । नैतिक ह्रास को थामने की ओर प्रेरित हो, शोषित की मुक्ति की ओर प्रयासरत हो तथा अन्याय के विरोध में मुखरित हो; किन्तु इसके साथ मर्यादा की रक्षा में अग्रसर हो चाहे वह पुरूष की हो, स्त्री की हो, समाज की हो अथवा देश की। 

 


संदर्भ सूची--
1. दशरूपकम्- 2-15
2. दशरूपकम् 2-20
3- नाट्य शास्त्र-
4- नयी कविता का आत्मसंघर्ष- गजानन माधव मुाकिक़्तबोध पृष्ठ 37-राजकमल प्रकाशन,
नई दिल्ली


विशेष -दृक्  (दृग्  भारती इलाहाबाद  अंक ११ जनवरी -जून २००४ में प्रकाशित 

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