साहित्य अकादमी पुरस्कार से पुरस्कृत तथा विश्व विश्रुत कालिदास अकादमी (उज्जैन) के निदेशक के पद पर कार्यरत प्रो० कमलेश दत्त त्रिपाठी (1) देश विदेश में भारतीय विद्याविद और शास्त्रविद् के रूप में प्रख्यात है । अत्यधिक शान्त एवं सरल स्वभाव वाले त्रिपाठी जी के तीक्ष्ण ज्ञान चक्षु, पाण्डित्यपूर्ण लेखनी, तेजस्वी व्यक्तित्व का प्रभाव उनके कार्यों में स्पष्ट परिलक्षित होता है।अपनी उल्लेखनीय साहित्य साधना एवं अप्रतिम सर्जनात्मक प्रतिभा से प्रोफेसर त्रिपाठी ने संस्कृत को समृद्ध कर जो प्रतिमान स्थापित किये हैं, वह उल्लेखनीय है। धर्म, दर्शन और व्याकरण पर उनका पूर्ण अधिकार रहा है।नाटयशास्त्र एवं संस्कृत रंगमंच को उन्होने पुनर्जीवन प्रदान किया है। विदेशों में संस्कृत का प्रचार प्रसार करके,उसे विस्तृत फलक पर ले जाने वाले प्रोफेसर त्रिपाठी महान साहित्यकार एवं समीक्षक हैं ।
सौन्दर्य शास्त्र, नाटयशास्त्र एवं संस्कृत रंगमंच के क्षेत्र में,वे जीवन भर सक्रिय रहे । शास्त्र और प्रयोग दोनों में समान रूप से उनकी रूचि और गति रही है, शायद इसी कारण मध्यप्रदेश शासन ने सर्व प्रथम उन्हें 1981 में कालिदास अकादमी के निदेशक के रूप में आमंत्रित किया। जून1986 तक वे इस पद पर बने रहे । इस अवधि में उन्होने कालिदास अकादमी के कार्यक्षेत्र का परिकल्पन किया, जिससे अकादमी पूरे देश में ही नहीं, विदेश के मानचित्र पर भी अपना स्थान बना सकी।
मध्यप्रदेश शासन द्वारा उन्हें दूसरी बार कालिदास अकादमी का निदेशक नियुक्त किया गया है। कालिदास को केन्द्र में रखकर व्यापक भारतीय सांस्कृतिक संदर्भो में उनका कार्य चल रहा है और वे कालिदास अकादमी को नई दिशा की ओर ले जा रहे हैं। इसके अतिरिक्त सम्प्रति वे काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के 'एमरेट्स' प्रोफेसर हैं ।
इन उपलब्धियों के पीछे उनका गहन अध्ययन एवं अथक परिश्रम भी शामिल है । प्रो0 कमलेश दत्त त्रिपाठी का जन्म उत्तरप्रदेश के इलाहाबाद नगर के उसी मोहल्ले में हुआ था ,जिसमें महामना मदन मोहन मालवीय का जन्म हुआ था ।उन्होंने उत्तरप्रदेश के सबसे प्राचीन संस्कृत महाविद्यालयय धर्मज्ञान, उपदेश पाठशाला में पारम्परिक रीति से व्याकरण एवं धर्मशास्त्र विषयों मे शिक्षा प्राप्त कर संपूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय से उपर्युक्त दोनों विषयों में आचार्य की उपाधि प्राप्त की।इलाहाबाद विश्वविद्यालय के सुप्रसिद्ध विद्वान, प्रोफेसर क्षेत्रेशचन्द्र चटटोपाध्याय से वेद की शिक्षा प्राप्त की । धर्मशास्त्र की शिक्षा उन्होने प्रोफेसर भूपेन्द्रपति त्रिपाठी के चरणों में बैठकर प्राप्त की । काश्मीर शैव दर्शन एवं वाक्यपदीयम् का अनुशीलन मिथिला के प्रकाण्ड विद्वान महामहोपाध्याय पं0 रामेश्वर झा के सानिध्य में किया । इस प्रकार प्रोफेसर त्रिपाठी भारतीय विद्या की पारंपरिक एवं आधुनिक दोनों ही विधियों से शिक्षा प्राप्त की।वे समकालीन साहित्य और कला में चिन्तन की प्रवृतियों के अधिगत विद्वान हैं ।इलाहाबाद विश्वविद्यालय से संबंद्ध कॉलेजों में संस्कृत भाषा और साहित्य का अध्यापन करने की अवधि में उन्होंने संस्कृत काव्यशास्त्र और धर्मशास्त्र का गहन अध्ययन भी किया। पाणिनीय व्याकरण का उच्चतम अनुशीलन उन्होंने इसी अवधि में पूरा किया ।
'पंडितराज जगन्नाथ का संस्कृत काव्यशास्त्र को योगदान विषय पर इलाहाबाद विश्वविद्यालय से डी0फिल् की उपाधि प्राप्त की। इस प्रकार महान गुरुओं के श्री चरणों मे बैठ कर उन्होंने शैक्षणिक योग्यता अर्जित की।
अध्यापक के रूप में प्रो0 त्रिपाठी ने संस्कृत की विभिन्न प्रकार से सेवा की है।1958 से 1990 तक इलाहाबाद विश्वविद्यालय से संबद्ध कॉलेज में संस्कृत विभागाध्यक्ष के रूप में कार्य करने के पश्चात् प्रो० त्रिपाठी ने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय वाराणसी के संस्कृत विद्या एवं धर्मविज्ञान संकाय तथा कला संकाय में दर्शन विभाग में अध्यापन का अवसर प्राप्त किया । संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय में व्याकरण,काव्यशास्त्र और हिन्दू धर्म परंपरा के अध्यापन के साथ दर्शन विभाग में उन्होंने भारतीय दर्शन के विभिन्न प्रस्थानों का अध्यापन किया तथा देशभर से आए छात्रों एवं विदेशों से आए अनुसंधानकर्ताओं को पढ़ाने के साथ ही मार्गदर्शन द्वारा निर्देशित किया । इसी अवधि में उन्होंने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में आगम एवं तंत्र विभाग की स्थापना की । काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के तीन और शिवराजविजय, प्रतापविजय, वेणीसंहार, मुद्राराक्षस, मृच्छकटिकम् आदि नाटकों में भाग लेते हुए उन्होंने साठ के दशक में इलाहाबाद में कालिदास अकादमी के द्वारा कालिदास के रंगमंच के लिए विशेष रूप से कार्य आरंभ किया। अभिज्ञानशाकुन्तलम् की मूल प्रस्तुति में उन्होंने दुष्यन्त के रूप में भूमिका ग्रहण की और इस नाटक का निर्देशन “लक्ष्मी कान्त वर्मा” ने किया और पूर्ण संयोजन इलाहाबाद के सुप्रसिद्ध लेखक श्रीकृष्ण दास ने किया। इस प्रस्तुति का आवर्तन लगातार होता रहा और 1968 में बहुभाषी नाटय समारोह में श्री उत्पल दत्त की प्रस्तुति 'मानुशेरअधिकारा'और कोलकता के निर्देशक और अभिनेता विन्द्योपाध्याय की प्रस्तुति 'आमरेमञ्जरी' के साथ किया। अभिज्ञानशाकुन्तलम् की इस प्रस्तुति का नाट्यालोक ,प्रकाश के क्षेत्र के जादूगर श्री तापस सेन ने किया, यही प्रस्तुति बाद में माधव महाविद्यालय के रंगमंच पर उज्जैन में भी आयी और आदरणीय सुमनजी ने उसे सराहा।70 के दशक में वाराणसी के बाद प्रोफेसर त्रिपाठी ने स्वर्गीय प्रोफेसर प्रेमलता शर्मा के साथ अभिनय-भारती नामक संस्था की स्थापना की और उसमें ऋतुसंहार, मालविकाग्निमित्रम्,उत्तररामचरितम्, वेणीसंहार के अश्वत्थामांक आदि प्रस्तुतियों में न केवल भाग ग्रहण किया बल्कि सक्रिय निर्देशन में हिस्सा लिया। उज्जयिनी में कालिदास अकादमी के निदेशक के रूप में वर्ष 1981 के बीच श्री कावलम पणिक्कर तथा श्री रतन थिएम के निर्देशन में की गई विक्रमोर्वशीयम् के चतुर्थ अंक की प्रस्तुति की, जिसमें उनके निर्देशन में स्वर्गीय श्री धीरेन्द्र परमार और सुप्रसिद्ध नृत्याचार्य श्री राजकुमुद ठोलिय के साथ-साथ अनेक स्थानीय कलाकारों ने हिस्सा लिया इसका संगीत श्री ओमप्रकाश शर्मा और स्वर्गीय प्रोफेसर प्रेमलता शर्मा के साथ किया गया जिसमें संस्कृतऔर प्राकृत की ध्रुवाओं का पहली बार उपस्थापन किया गया। इसके रंगमंच विधान के अनुसंधान में डॉ0 जगदीश शर्मा ने प्रोफेसर त्रिपाठी के साथ गहरे शोध कार्य संपन्न किये। इसके. बाद भी लगातार प्रोफेसर त्रिपाठी संस्कृत रंगमंच के क्षेत्र में अभिनय और निर्देशन के लिए ही नहीं बल्कि आधुनिक रंगमंच के निर्देशक ,रंगकर्मियों और पारंपरिक विद्वानों के बीच सेतु स्थापित करने के लिए काम करते रहे। फलस्वरूप उज्जैन में संस्कृत रंग मंच तथा आधुनिक रंगमंच को केन्द्र में रखने के लिए अविस्मरणीय योगदान किया।
प्रो० त्रिपाठी को 1981 में जब मध्यप्रदेश शासन ने कालिदास अकादमी के निर्देशक के रूप में आमंत्रित किया तब उन्होने कालिदास अकादमी का निर्माण किया तथा अकादमी में साहित्यिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियां भी आरंभ की। डॉ0 त्रिपाठी उज्जैन में 05 वर्षों तक निदेशक के रूप में कार्य करते रहे और कालिदास अकादमी राष्ट्रीय ही नहीं अपितु अन्तर्राष्ट्रीय क्षितिज पर भी स्थापित हो गई। देशभर की सर्जनात्मक, साहित्यिक और कलात्मक गतिविधियों से कालिदास अकादमी जुड़ गई ।आधुनिक रंगकर्म का पारम्परिक रंगकर्म के साथ संबंध बना और देश के सुविख्यात रंगनिर्देशक, नृत्यांगनाएं, नर्तक, संगीतज्ञ एवं कलाकार कालिदास को केन्द्र में रखकर व्यापक रूप से जुड गये। देश और विश्व से विद्वान कालिदास एवं नाट्यशास्त्र पर संबंधित शोध के लिए तथा कालिदास अकादमी द्वारा आयोजित अधिवेशन में आने लगे।
सारी दुनिया में भारतीय धर्म, प्राचीन भारतीय व्याकरण, दर्शन, नाट्यशास्त्र एवं संस्कृत रंगमंच के पारम्परिक अध्ययन को उन्होंने प्रचारित किया है और इस क्षेत्र में उनका महत्वपूर्ण योगदान है|1987 में जापान सरकार के आमंत्रण पर उन्होंने टोक्यो की यात्रा की और अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में भाग लेने के बाद यहीं से शिन्तो धर्म के केन्द्रों का अध्ययन –अनुशीलन किया और जापान के विश्व प्रसिद्ध भारत विद्याविदों के साथ उनका संबंध बना। इसी वर्ष हॉलैण्ड के विश्व संस्कृत सम्मेलनों में भी उन्होंने भाग लिया और वहां से बेल्जियम और फ्रांस की यात्राएं भी की। इस क्रम में प्रो०त्रिपाठी ने आगामी वर्षों मे पोलैण्ड में क्रेको में संपन्न विश्व संस्कृत सम्मेलन में भी सत्रों की अध्यक्षता की और अपने शोधपत्र प्रस्तुत किये। इसी तरह पेरिस मे सोरबोन विश्वविद्यालय ने तथा डेनमार्क में कोपेनहेगेन विश्वविद्यालय ने, स्वीडन में माल्मों विश्वविद्यालय ने प्रो० त्रिपाठी को विजिटिंग प्रोफेसर के रूप में आमंत्रित किया। प्रो० त्रिपाठी ने थाईलण्ड में अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में भी भाग लिया। पिछले वर्ष उन्होंने स्पेन और चीन की यात्राएं की।
प्रोफेसर त्रिपाठी संस्कृत काव्य के लिए भी सक्रिय रहे और काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में कविभारती के सचिव के रूप में उन्होंने बारह वर्षों तक अनवरत कार्य किया। संस्कृत कवि के रूप में उनकी एक अलग शैली है। प्रो.त्रिपाठी ने बच्चों के लिए महाकवि कालिदास व महाकवि बाणभट्ट और पंचतंत्र पर लेखन का 1968 से लगातार कार्य आरंभ किया। 1962 में उन्होंने “अमरूशतकम्' का वैज्ञानिक सम्पादन किया।हिन्दी में काव्यानुवाद किया जो बाद में हिन्दी में वर्ष की सर्वोत्तम रचना के रूप में प्रशंसित हुई। किरातार्जुनीयम् के कुछ सर्गों पर उन्होंने समालोचनात्मक काम किया जो अपनी तरह का पहला आंरभ था। सारे देश में भारतीय संस्कृत, दर्शन, संस्कृत साहित्य, संस्कृत रंगमंच और नाटयशास्त्र पर उनके व्याख्यान होते रहे हैं।संस्कृत रंगमंच पर इनके व्याख्यानों का अंग्रेजी भाषा का पाठ श्री राम आर्ट सेन्टर नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित किया जा चुका है। नाट्यशास्त्र के प्रथम अध्याय के अभिनवभारती का अंग्रेजी अनुवाद प्रकाशनाधीन है। अभिनवगुप्त के परमार्थसार और उस की विवृति पर उनका अंग्रेजी अनुवाद इंग्लैंड के प्रतिष्ठित प्रकाशक के द्वारा प्रकाशित हो रहा है।भर्तहरि के वाक्यपदीय पर उनका काम प्रकाशन की ओर अग्रसर है।उनके दर्जनों शोध निबंध राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलनों में भारतीय भाषा,दर्शन, सौन्दर्यशास्त्र, आगम शास्त्र और नाट्यशास्त्र पर प्रस्तुत किए जा चुके है और देश विदेश देश के प्रतिष्टित जर्नलों में प्रकाशित किये जा चुके है। नाट्यशास्त्र के समालोचनात्मक संस्करण और हिन्दी तथा अंग्रेजी में अनुशीलन की कालिदास अकादमी द्वारा प्रवर्तित योजना में वे प्रधान संपादक के रूप में काम कर रहे हैं। इसके विभिन्न भाग अब प्रकाशित होने आरंभ हो गये है। उनके व्याख्यानों और शोधपत्र का फ्रांसीसी एवं जापानी भाषाओं में अनुवाद हुआ। उनके लेखों का प्रकाशन पोलेण्ड की शोध पत्रिकाओं में भी हुआ । इस तरह स्वदेश और विदेश में भारतीय विद्या के आचार्य और संस्कृत रंगमंच एवं नाट्यशास्त्र के व्याख्याता के रूप में उनको विशेष आदर मिला है ।
सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय विद्वत् सम्मान, राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान मानित विश्वविद्यालय, दिल्ली के द्वारा प्रदत्त विद्वत् सम्मान, ज्ञान सम्पदा न्यास, नयी दिल्ली के द्वारा प्रदत्त विद्वत् सम्मान तथा देश की अन्य ऐसी कई संस्थाओं द्वारा दिय गये सम्मानों से उन्हें सम्मानित किया गया है ।
गत वर्ष साहित्य अकादमी, नई दिल्ली ने उन्हें संस्कृत साहित्य से किये अनुवाद तथा संस्कृत की व्यापक सर्जनात्मक उपलब्धि के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार से पुरस्कृत किया ।
जिस प्रकार नल ने अधीति, बोध ,चारण ,प्रचारण के द्वारा चतुर्दश विद्याओ को छप्पन (56) प्रकार का बना दिया (2)उसी प्रकार प्रो0 त्रिपाठी ने पारम्परिक ज्ञान को आधुनिक ज्ञान के साथ संयुक्त कर तथा शास्त्र को प्रयोग के साथ अन्वित कर संस्कृत कोअनेक नये आयाम प्रदान किये।
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सन्दर्भ -
1-पता-
निदेशक,
कालिदास अकादमी,
विश्वविद्यालय मार्ग
उज्जैन-456010
फोन0-0734-2515404(0) & Fax
2515405(R)
e-mail: kalidasa@sancharnet.in
visit usat:www.kalidasaakademi.org
2-अधीतिबोधचारणप्रचारणै
र्दशाश्चतस्त्रः प्रणयन्नुपाधिभिः
चतुर्दशत्वं कृतवान् कुतः स्वयं
न वेद्यमि विद्यासु चतुर्दश् ।।
नैषधीयचरितम्-1-4
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**ज्ञानायनी भारत के मनीषी विशेषांक ,(वर्ष 3 संयुक्तांक (3 -4 )2006 सम्पादक डा.शिशिर कुमार पाण्डेय ,लखनऊ )में प्रकाशित लेख
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