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How Food Shapes the Mind: Insights from Chandogya & Brihadaranyaka Upanishads
This concept elaborates on how food, once ingested, is processed and distributed within the body. According to the Chandogya Upanishad, food is divided into three parts: 1.Gross Part ( Sthūla Bhāga ) : • Deposition : This part is the heaviest and least refined. It is the solid waste that is eventually excreted from the body. • Function : This component provides bulk to the diet and helps in the elimination of waste, maintaining the digestive health of the individual. 2.Middle Part ( Madhyama Bhāga ): • Deposition : This part gets transformed into flesh and other tissues in the body. • Function : This component is responsible for nourishing and building the body’s tissues, including mu...
कालिदास के 'मेघदूत' में 'काकोदुम्बर' का उल्लेख:साहित्यिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि
कालिदास के 'मेघदूत' में 'काकोदुम्बर' का उल्लेख:साहित्यिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि कालिदास का साहित्य विविध विधाओं का आकर है। इसमें संगीतशास्त्र विविध प्रकार के पशु-पक्षियों, वृक्षों, ऋतुओं एवं फलों तथा पुष्पों आदि से सम्बद्ध प्रचुर सामग्री भी उपलब्ध होती है, परन्तु उनके द्वारा वर्णित स्थलों, पशु-पक्षियों तथा पुष्पों के अभिज्ञान के सम्बन्ध में कहीं कहीं विद्वानों में वैमत्य है। इस शोध-पत्र में कालिदास द्वारा 'मेघदूत' में उल्लिखित 'काकोदुम्बर' नामक फल की पहचान के विषय में भारतीय एवं पाश्चात्य व्याख्याकारों के विषय में भारतीय एवं पाश्चात्य व्याख्याकारों के परस्पर भिन्न मतों के विश्लेषण का प्रयास किया गया है। कालिदास ने मेघदूत में मेघ को अलकापुरी का मार्ग बताते समय उज्जयिनी के पश्चात् देवगिरी पर्वत का वर्णन करते समय मेघ को काकोदुम्बर नामक फल को पकाने वाले के रूप में वर्णित किया है- नीचैर्वास्यत्युपजिगमिषोर्देवपूर्वम् गिरिं ते ...
कालिदास का कर्म सिद्धान्त: भारतीय दर्शन में कर्म का दार्शनिक विवेचन
भारतीय मनीषी प्रारंभ से ही कर्मवाद के पोषक रहे हैं ।अथर्ववेद (1)में कहा गया है-कर्मशील व्यक्ति ही जीवन का मधु पाता है। वही सुस्वादुफल काआस्वादन करता है। सूर्य की ओर देखो,वह निरंतर कर्मरत रहता है।अतः कर्मशील बनो। ऐतरेय ब्राहमण अपने"चरैवेति" गीत में उद्घोष करता है- जो बैठा रहता है, उसका सौभाग्य बैठा रहता है पर जब कोई खडा होता है, तो उसका सौभाग्य भी खडा होता है ।पडे रहने वालों का सौभाग्य भी पडा रहता है तथा चलने वाले (कर्मरत) का सौभाग्य भी चलने लगता है।अतः कर्मशील बनो । कर्म में विश्वास रखने वाले एक प्राचीन मनीषी को अपने कर्म पर इतना भरोसा है कि वह कहता है – कॄतं में दक्षिणे हस्ते जयो में स्वख्य आहितः( 2)। आलोचकों ने कालिदास को प्रेम एवं सौन्दर्य का सर्वोच्च कवि माना है ।किन्तु कर्म का उदात्त स्वरूप भी कालिदास की लेखनी से अछूता नहीं रहा। उनके ग्रन्थों का अनुशीलन करने पर स्थान-स्थान पर उनके कर्म सम्बंधी सिद्धान्त प्रकट होते हैं। कालिदास के ग्रन्थों में उनके ...