जनार्दन प्रसाद मणि रचित 'नीराजना '
आधुनिक संस्कृत साहित्य में डॉ. जनार्दन प्रसाद मणि विरचित "नीराजना" काव्यकृति का एक महत्त्वपूर्ण स्थान है । यह काव्यकृति दो भागों में विभक्त है-पूर्व भाग और उत्तर भाग । पूर्व भाग भगवान शिव को समर्पित है तथा उत्तर भाग में भगवान् विष्णु की स्तुति की गई है ।
प्रस्तुत काव्यकृति एक स्तोत्र काव्य है ,किन्तु प्रस्तुत स्तोत्र काव्य एवं कवि की भक्ति ;निश्चित रूप से प्राचीन स्तोत्र काव्य परम्परा से भिन्न है। प्रस्तुत कृति में कवि प्रभु के माहात्म्य मात्र का वर्णन नहीं करता है; वह उनके महनीय कार्यों एवं अनुग्रहों को भी महिमा मंडित नहीं करता है ।वह प्रभु भक्ति एवं प्रभु प्रेम में सुधबुध खोना भी नहीं चाहता है बल्कि दीपकों से सुशोभित मणि जी की नीराजना है-मानव मात्र की पीड़ा, जो उनके अन्तस्तल में प्रदीप्त है । उस पीड़ा के निवारणार्थ ही वह अपने एवं मानव मात्र के कष्ट, प्रभु से निवेदित कर रहे हैं ।
स्तोत्र काव्य परम्परा में प्रभु भक्ति का स्वरूप भिन्न-भिन्न दिखलाई पड़ता है। वैदिक काल की भक्ति में श्रद्धा के साथ-साथ एक तत्त्व यह भी था कि हम तुम्हें (देवता को) हव्य देते हैं, तुम हमें धन, ऐश्वर्य, पुत्र एवं आयु प्रदान करो । उपनिषद् काल में भक्ति मोक्ष का साधन थी तथा 'अहं ब्रह्मास्मि 'की अनुभूति का हेतु । नारद एवं शाण्डिल्य भक्ति सूत्रों में भक्ति 'परानुरक्ति 'रूप है अर्थात् वहां भक्ति का तात्पर्य है, ईश्वर एवं उसके अलौकिक स्वरूप से प्रेम ।
भक्ति आन्दोलन के समय भगवद्भक्ति में प्रभु प्रेम तथा उनसे अनुग्रह प्राप्त करना ही प्रमुख तत्त्व था । शिवस्तोत्र काव्यों में पुष्पदंत विरचित "शिवमहिम्न:स्तोत्र" सर्वाधिक प्रसिद्ध है जिसमें शिव की महिमा तथा उनकी शक्ति का गुणगान किया गया है किन्तु मणि जी प्रभु से प्रथमतः न तो भगवत्प्रेम चाहते हैं और न ही प्रभु कृपा । संभवत: उनके अनुसार यह तो संकुचित दृष्टि है । उनकी स्पष्ट मान्यता है कि जब चारों ओर दुःख व्याप्त है, कष्ट है ,तो हे प्रभु ! तुम इन सबके कष्टों को दूर करने के लिये तत्पर क्यों नहीं होते हो ? नीराजना नामक स्तोत्र काव्य में मणि जी चतुर्दिक संतप्त एवं व्याकुल जनों को देखकर, क्षुब्ध हो ,प्रभु से अपने मन की पीड़ा निवेदित कर रहे हैं ।
मणि जी साहित्य के सजग प्रहरी हैं । समाज में व्याप्त विसंगतियों की
उपेक्षा कर केवल शिव तथा विष्णु के माहात्म्य का वर्णन करना उनकी दृष्टि में उचित नहीं है । वह तो ऐसे संवेदनशील कवि हैं जो एक ओर संसार के दुःख की अभिव्यक्ति करते हैं(१)। वहीं दूसरी ओर उससे दु:खी, कवि हृदय की पीड़ा भी व्यक्त करते हैं(२) । मणि जी भूख, रोग, अभाव, गरीबी आदि से ग्रस्त व्यक्ति के प्रति भी चिन्तित नहीं दिखाई देते हैं, किन्तु उन्हें सर्वाधिक कष्ट इस बात का है कि जो सज्जन हैं, अच्छे कर्म करते हैं, वे तो छले जा रहे हैं तथा जो भोग एवं लिप्सा से युक्त हैं, ऐसे लोभी छलभरी वाणी वाले, पाखण्डी दुर्जन उन्नति को प्राप्त हो रहे हैं।
वाग्भिःछद्मसुधानिषेकचतुरैर्वा गध्वरैर्वाग्धरै-
र्मिथ्याश्वासनदायकैः पुनरधःपातोन्मुखैः प्रत्यहम् ।
या नित्यं परिवर्ध्यतेऽश्रुकलिता मन्मानसीयं व्यथा...
(नीराजना, श्लोक ४८)
विश्व में प्रेम, मित्रता, नीति, नैतिकता का निरन्तर ह्रास हो रहा है,
जिससे भारतीय संस्कृति का आदर्श एवं मानव सभ्यता ही नष्ट हो जायेगी (३)।सतयुग में जो कुछ अस्वाभाविक एवं तिरस्कृत था आज कलियुग में वही सब कुछ हो रहा है(४) ।
विद्वानों एवं शास्त्रज्ञों को दु:खी देखकर कवि उसे सत्य की दुर्गति एवं
असत्य का सत्कार मानते हुए कहता है :
वर्षन्तीं बुधदृग्भ्य उन्मदगतिं मुक्ताश्रुधाराततिं
दर्श दर्शमनन्तदुःखकलितां दैनन्दिनी शास्त्रिणाम् ।
सत्यानामनुभूय दुर्गतिमहो तां सत्कृतिम् चासतः
सन्दिग्धस्तव कल्प्यते नु महिमा सम्प्रत्यपर्णेश्वर ।।
(नीराजना, पूर्व भाग ३०)
संसार में जनसामान्य में ईर्ष्या द्वेष एवं स्वार्थ व्याप्त हो गया है । न्याय
रो रहा है तथा दुष्टात्माएं पल्लवित हो रही हैं -
ईर्ष्याद्वेषमहोदधावनुदिनं सृष्ट्याः पतन्त्या ध्रुवं
चेतस्तन्नवनीतलेपनपटुस्वार्थान्धकैर वृतम् ।
न्यायो रोदिति फूत्करोत्यविरतं दुष्टात्मनां हुंकृति-
स्तस्माज्जागृहि मुञ्च मौनमधुना जृम्भस्व नो धूर्जटे ॥
(नीराजना, पूर्व भाग श्लोक १०)
संसार में व्याप्त असंतोष तथा विसंगतियों के कारण कवि स्वयं भी इन परिस्थितियों के प्रति स्वयं को असहाय सा अनुभव करता है क्योंकि वह कहता है -
दुश्चिन्ता विजिगीषते मम धृतिं शुश्रूषतेऽपि प्रभो ।
कञ्चेदाकुलनिःस्वनञ्च निभृतं भीतिस्वरं मामकम् ।
सर्वं तद्धि बुभूषतेऽभिलषितं यन्नो कदाचित्क्वचित् ।
किञ्चिन्न प्रतिभाति खण्डपरशो! किञ्चेतयै दिश्यताम् ।
(नीराजना, पूर्व भाग श्लोक ४५)
संसार के इन कष्टों को देख कवि कह उठता है कि हे शिव ! मेरी तो नींद ही भाग गई है :
निद्रा हन्त पलायिता व्यपगतास्तुष्टिक्षणास्सस्पृहाः
(नीराजना, पूर्व भाग १५)
तथा उनके रुदन को सुन कर मेरा कोमल हृदय विदीर्ण सा हो गया
है:
श्रावं श्रावमनन्तशल्यनिहितं तज्जल्पितं हा क्वचित्
हे स्थाणो ! स्फुटति प्रसूनहदयं क्लिद्यत्यथास्त्रेस्तनुः ।।
(नीराजना, पूर्व भाग १३)
दूसरों के दुखों से क्लांत प्रस्तुत स्त्रोत काव्य का कवि उस प्रभु से कहता है कि व्यक्ति की इस पीड़ा ,इस दुर्दशा पर भी हे प्रभु !तुम आराम से बैठे हो ;सो रहे
हो (५)। ऐसी स्थिति में कवि स्वयं प्रभु से कहता है कि समाज की यह स्थिति तुम्हारे द्वारा देखी जाए, सुनी जाए ।
उष्णोच्छ्वासमलीनकान्तिकलितं विद्यावतां श्रीमुखं
दृष्ट्या नोत्सहते दृढ़ं रचयितुं सारस्वतं स्वं तपः।
शंके यत्प्रविहाय सत्कुलवधूरूपाणि लज्जाsधुना
योग्यानां मुखमण्डलेषु रमते सा लोक्यतां शंकर ॥
(नीराजना, पूर्व भाग ३२)
सामाजिक विसंगति, वैश्विक समस्याएं, नैतिक पतन, विषम परिस्थितियां आदि से जनित हृदय की पीड़ा व्यक्त करते - करते कवि का शिव के प्रति रोष मुखर हो उठा है एवं वे शिव को कटघरे में खड़ा कर उनसे प्रश्न पूछते हैं कि आप ही संसार के प्राणियों के प्रति न्याय करते हैं तब समाज की इन विसंगतियों के प्रति, इन अधर्मियों को इनके कुकृत्यों का फल क्यों नहीं दे रहे हैं? क्या आपके तृतीय नेत्र की अग्नि अवरुद्ध हो गई है।(६) ?
कवि कहते हैं कि शिव उत्तर दो-
मा मूकीभव दीयता प्रतिवचों हे सर्वलोकाधिप ।
(नीराजना, पूर्व भाग ,श्लोक ३१)
क्योंकि न तो तुम विषद्रव्य पी रहे हो(७) और न ही अपनी माया को
प्रेरित कर रहे हो (८)। इसलिए इन स्तुतियों के द्वारा कवि ;शिव व विष्णु की आराधना कर उनसे लोकमंगलकारिणी शक्तियों का आह्वान करता है क्योंकि प्रभु ही "सत्यं शिवं सुन्दर" की स्थापना करने में समर्थ हैं सहायक हैं। नीराजना उत्तर भाग में मणि जी कहते हैं:
धात्रा वा स्मरशत्रुणा वितरिताश्चञ्चत्तपः प्रीतिभि-
र्दैत्येभ्यो ऽपरिमेयपौरुषवरा ये ते चमत्कारिणः ।
तानाश्रित्य महामदा यदि जगज्जीवान्बुधान्सज्जनान्
देवानिन्द्रगणांस्तुवन्ति भगवन् लोकैरत्वमाहूयसे ॥
(नीराजना, उत्तर भाग १३)
किंतु फिर भी कवि शिव के प्रति आशान्वित हैं एवं नतमस्तक है इसीलिए वह कहते हैं
संबंधं गुरूमीश्वरं प्रियजनं धर्मं द्विजं मातरं
पत्नीं पुत्रमथानुजंच जनकं व्यष्टिं समष्टिंजगत्।
देशं स्वं युगसाहितीं प्रति तु यत्कर्तव्यमस्त्यत्र मे
पूर्णीकर्तुमदो वृषध्वज ! विराडाधार उत्पाद्यताम् ।।
(नीराजना, पूर्व भाग ,श्लोक ४६)
अर्थात् चाहे सभी कुकर्म एवं अनैतिक कार्य करें ,किंतु हे प्रभु !
मुझमें ऐसी शक्ति दो कि सभी के प्रति अपने कर्तव्यों का निर्वहन मैं समुचित प्रकार से कर सकू । यहां ऐसा प्रतीत होता है की कवि की यह आकांक्षा मात्र अपने लिये नहीं है बल्कि इस संसार के प्राणी मात्र के लिएभी उसकी यही कामना है।
और अन्त में मणि जी विनम्र भाव से प्रभु से निवेदन करते है कि
मेरी यह नीराजना जो पीड़ा से आर्द्र हृदय की भाव रचना है उसे स्वीकार करो -
पीड़ार्द्रां हृदयस्य भावरचनां नीराजनां मामकीम्
(नीराजना, पूर्व भाग ,श्लोक ५१)
तथा ऐसी स्थिति में हे शिव ! तुम्हारे द्वारा सभी को कल्याण प्रदान किया
जाय -
शुभं दीयताम् ।।
नीराजना में शिव भक्ति परक तीन भावों की धारा प्रवाहित हुई है :-
(१) आत्माभिव्यक्तिपरक :- इन श्लोकों में कवि की मानसिक व्यथा व्यक्त हुई है। आदर्शों, मूल्यों एवं सत्यप्रियता के स्थान पर चाटुकारिता ,धनलोलुपता, हिंसा , असत्य समादृत हो रहे हैं ।अतएव इन श्लोकों में निराशा, खिन्नता एवं अवसाद की भावना प्रमुख है ।
(२) शिव को सम्बोधनपरक -इन श्लोकों में कवि शिव को अनेकधा सम्बोधित करता है कि संसार की इन बुराइयों को देखो ,सुनो तथा दुष्टात्माओं को दण्ड दो एवं इनके संहार के लिए प्रस्तुत हो ।
(३) सकारात्मक दिशा : इन श्लोकों में कवि ने अपने हताश मन के साथ साथ समाज को भी सकारात्मक दिशा प्रदान की है कि हे प्रभु ! चाहे कितनी भी वितरीत परिस्थितियां हों ,मैं सदैव अपने कर्तव्यपथ पर अग्रसर होऊँ।
वास्तव में यदि सभी अपने कर्तव्यों के प्रति सचेत हो तब समाज में व्याप्त ये सारी बुराइयां दूर हो जायेगी ।
भाषा पर मणि जी का अधिकार एवं भाव गांभीर्य दोनों ही परस्पर मिलकर भाव सम्प्रेषण में सहायक हुए हैं । मन की पीडा एवं सामाजिक विद्रूपता जिस सरलता से अभिव्यक्त हुई है, उससे स्पष्ट है कि कवि बाह्याडम्बर के बिना स्वाभाविक रूप से ही परम पिता के समक्ष अपना हृदय खोल रहा है । वहाँ न तो उसे किसी शब्द जाल की आवश्यकता है और न ही उपमा आदि अलंकारों की । शिव के विभिन्न उदबोधनों से जहां एक ओर भाव प्रवाह को बल मिला है ,तो वहीं दूसरी ओर उनके शब्द भण्डार का बोध भी होता है।
अतः नीराजना में एक क्रान्तदर्शी एवं जागरूक कवि तथा सरल, असहाय व शरणागत भक्त एकाकार हुए हैं। जिसके द्वारा कवि मानवजाति को पुनः सुसंस्कृत करने एवं धर्म की रक्षा तथा सत्यं शिवं सुन्दर की स्थापना के लिये शिव के आह्वान हेतु अग्रसर हुआ प्रतीत होता है ।
संदर्भ सूची
१. देखिये नीराजना पूर्व भाग श्लोक संख्या ४, ५, १०, २१, २५, २६, २७, २८
३०,३१,३२, ३४, ३८
२. नीराजना ,पूर्व भाग श्लोक संख्या ६, ८, १२, ३९, ४०, ४३, ४४, ४७
३. नीराजना ,पूर्वभाग, श्लोक संख्या २९, ३५, ३६
४. नीराजना पूर्वभाग, श्लोक संख्या २५
५. वही, श्लोक २१
६. वही, श्लोक २४
७. वही, श्लोक २३
८. वही, श्लोक २३
विशेष -अर्वाचीन संस्कृतम ३०/२ अप्रैल २००८ पृष्ठ संख्या ९- १४ में प्रकाशित
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