"Sanskrit Gyan Jyotsna: मधुसूदन सरस्वती के काव्यशास्त्रीय सिद्धान्तों की समीक्षा (भगवद्भक्तिरसायन के संदर्भ में)

मधुसूदन सरस्वती के काव्यशास्त्रीय सिद्धान्तों की समीक्षा (भगवद्भक्तिरसायन के संदर्भ में)

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     मधुसूदन सरस्वती की प्रसिद्धि मुख्य रूप से उनके ग्रन्थ अद्वैतसिद्धि के कारण है। यही कारण है कि उनका नाम लेते ही शंकर शिष्य एवं अद्वैत वेदान्ती के रूप में ही उनकी छवि मस्तिष्क में उभरती है। विद्वानों का चिन्तन एवं ग्रंथों का प्रणयन भी सामान्यतया अद्वैतसिद्धि, सिद्धान्तबिन्दु, वेदान्तकल्पलतिका पर ही केन्द्रित रहा है तथा मधुसूदन सरस्वती कृत भगवद्भक्तिरसायन नामक ग्रंथ उपेक्षित रहा। जबकि मधुसूदन सरस्वती कृत भगवद्भक्तिरसायन नामक ग्रंथ अनेक दृष्टियों से महत्वपूर्ण है। 
   1- सर्वप्रथम मधुसूदन ने भक्ति की स्थापना अद्वैत की मर्यादा में रहकर ही की है। 
   2- दूसरे इस ग्रंथ में मधुसूदन भक्ति को स्वीकार ही नहीं करते बल्कि काव्यशास्त्रीय सिद्धान्तों के द्वारा वे उसकी रसरूपता एवं सर्वश्रेष्ठ रस की स्थापना करते है। 
 3-तीसरे इस ग्रंथ के भक्ति परक दार्शनिक एवं काव्यशास्त्रीय दोनों ही सिद्धान्तों का मूल्यांकन रचनाकार एवं साहित्य के दृष्टिकोण से करना भी आवश्यक है और 
4-चौथा- मधुसूदन की इस नई दृष्टि का तत्कालीन साहित्य व समाज पर क्या प्रभाव पड़ा ? 
       मोक्ष के साधन के रूप में ज्ञान कर्म और भक्ति को लेकर एक ओर जहा पर्याप्त विवेचन हुआ है ,वही दूसरी ओर ब्रह्मस्वाद-सहोदर विगलित वेद्यान्तर आनन्द के रूप में रसास्वाद की चर्चा साहित्य शास्त्रियों ने विस्तृत रूप में की है। भरत मुनि के सूत्रानुसार विभाव, अनुभाव और व्यभिचारी के संयोग से निष्पन्न होने वाले रस की जो अवधारणा दसवीं शाताब्दी तक सर्वमान्य हो चुकी थी ,उसके अनुसार भक्ति का रस में समावेश नहीं था। आठ या नौ स्थायी भावों की ही व्यंजित दशा को रस मानने वालों ने भक्ति के लिए किसी भी स्थायीभाव की गणना नहीं की। पारंपरिक विचार में भक्ति भाव मात्र है ;जो रस के ही समान ध्वनित होता है।
        भरत से लेकर पण्डित राजजगन्नाथ तक अलङ्कारशास्त्रियों ने भक्ति को रस रूप में स्थान नहीं प्रदान किया ,जबकि उस काल में भी धार्मिक साहित्य का पर्याप्त विस्तार था किंतु इतना जरूर है कि समय-समय पर इन अलंकार शास्त्रियों की विचारधारा में परिवर्तन हुआ।
 भरत जहां इस विषय में पूर्णतया मौन हैं, वही दण्डी अस्पष्ट रूप से कुछ मुरवर हुए है ।वे उसे अलंकारों के अंतर्गत मानते हैं। किंतु भक्ति को रस मानकर दशम रस के रूप में मान्यता देने के विषय में वे भी एक स्वर से निषेध करते हैं ।वस्तुतः अभी तक लक्ष्य ग्रन्थ अपनी विषयवस्तु आदि के क्षेत्र में परपरागत मार्ग का ही अनुसरण कर रहे थे। चूंकि लक्षण ग्रंथों का निर्माण लक्ष्य ग्रंथो के आधार पर ही होता है और लक्ष्य ग्रन्थों में परिवर्तन के अभाव में लक्षण ग्रन्थों में भी थोड़ा परिवर्तन हुआ है ,वह परिवर्तन उसके प्रस्तुतिकरण में हुआ अर्थात् मात्र कलापक्ष में ही परिवर्तन हुआ ,भावपक्ष अपरिवर्तित ही रहा। 
     लेकिन भक्ति आन्दोलन के सूत्रपात के पश्चात् भक्ति परक साहित्य की रचना हुई ; फलतः लक्षण ग्रंथों में भी परिवर्तन की आवश्यकता हुई; अतएव परंपरागत विचारधारा के सर्वथा विपरीत नई विचारधारा का सूत्रपात हुआ; जिसने भक्तिरस की स्थापना का प्रयास किया। यह प्रयास 10वीं से 17वीं शती तक दिखाई पड़ता है ।यही वह समय है ,जब एक ओर तो रस संप्रदाय का बोलबाला था तथा दूसरी ओर भक्ति आंदोलन ने संपूर्ण देश को व्याप्त कर लिया था। भक्ति को रस रूप में प्रतिष्ठित करने वाले आचार्यो को चार कोटि में विभाजित कर सकते हैं - 
 1. वे जिन्होंने भक्ति रस का उल्लेख तो किया है किंतु रसशास्त्र के सिद्धांतों के आधार पर सिद्धान्तों का प्रतिपादन नहीं किया है। जैसे - शांडिल्य। 
2. वे आचार्य जिन्होंने पारम्परिक रस प्रक्रिया में ही भक्ति रस की स्थिति मानी, लेकिन भक्ति को एक नया रस नहीं माना। इस कोटि में वोपदेव आते हैं।
 3. वे आचार्य जिन्होंने भक्ति को नया रस मानकर रससिद्धान्त का प्रतिपादन किया तथा जिन्होंने भक्तिरस में नौ रस को भी अन्तर्भूत किया। प्रथम कोटि में लक्ष्मीधर तथा द्वितीय में श्रीधर आते हैं। 
4. वे आचार्य जिन्होंने भक्तिरस की पूर्वरूपेण प्रतिष्ठा की। इसके अंतर्गत रूपगोस्वामी, मधुसूदन सरस्वती एवं नारायण भट्ट आते है। 
          यहां यह उल्लेखनीय है कि नारायणभट्ट कृत भक्तिरस-तरंगिणी में श्री भट्ट ने रूपगोस्वामी के भक्तिरसामृतसिंधु एवं उज्जवल नीलमणि को आधार बनाकर भक्ति का रसत्व प्रतिपादित किया है। अतः भक्ति रस की प्रतिस्थापना में मधुसूदन सरस्वती एवं रूपगोस्वामी का ही प्रमुख योगदान रहा है। रूपगोस्वामी ने भक्तिरस की स्थापना करते समय भक्ति रस, उसके स्थायी भाव, विभाव, अनुभाव ,संचारीभाव आदि का विस्तृत निरूपण किया है तथा उनका यह वर्णन काव्यशास्त्रीय उपादानों को लेकर प्रवृत्त हुआ है किंतु मधुसूदन सरस्वती ने; काव्य शास्त्र की पारंपरिक विचार धारा जिसके अनुसार -भक्ति रस नहीं ,भाव है  - इसका खंडन करके फिर दार्शनिक आधार पर ,भक्ति का रसत्व पुष्ट किया है। 
    अलंकार संप्रदाय के आचार्यों ने सामान्य रूप से भक्ति को रसवत्,  प्रेय या उर्जस्वित् अलंकारों के अंतर्गत माना है तथा मम्मट, विश्वनाथ आदि रस संप्रदाय के आचार्यों ने उसे भाव माना है ।भक्ति के रसत्व का निषेध करते हुए अभिवनगुप्त का मत है कि- भक्ति एक पृथक रस नहीं है ,क्योंकि रस तो वहां होता है जिसमें अतिशय रंजना हो तथा जो पुरूषार्थेपयोगी हो और इस दृष्टिकोण से केवल नौ रस हैं ।भक्ति ईश्वर प्रणिधान का विषय है ।अतएव स्मृति, मति, धृति आदि संचारीभावों में अथवा उत्साह स्थायीभावों में अथवा प्रसंगानुकूल अन्य रसों में इसका अन्तर्भाव कर देना चाहिये। 
     नवैव रसाः पुरुषार्थोपयोगित्वेन रंजनाधिक्येन वा इयतामेवोपदेश्यत्वात्। अतएवेश्वरप्रणिधानविषये भक्तिश्रद्धेस्मृतिमतिधृत्युत्साहापनुप्रविष्टेभ्योऽन्यर्थेववा अंगमिति न तयोः पृथग्रसत्वेन गणनम्। (1) 
    ऐसा प्रतीत होता है कि अभिनवगुप्त के उपर्युक्त मत को ही पूर्वपक्ष मानकर मधुसूदन भगवद्भक्तिरसायन के मंगलाचरण में ही भक्ति रस को स्थापित करते हुए कहते है - 
  नवरसमिलितं वा केवलं वा पुमर्थम् 
 परममिह मुकुन्दे भक्तियोगं वदन्ति     
 निरूपमसुखसंविद्रूपमस्पृष्टदुखं 
तमहमखिलतुष्टयै शास्त्रदृष्ट्या व्यनज्मि।। भगवद्भक्तिरसायन1/1 
अभिनवगुप्त ने भक्ति को रस न मानने के दो कारण बताये है - 1. अतिशयरंजना न होना 2. पुरूषार्थोपयोगी न होना 
 इसके विपरित मधुसूदन का मत है कि भक्ति निरूपमसुखसंवित् रूप तथा अस्पृष्टदुखं है। इन दोनों विशेषणों की व्याख्या मधुसूदन ने भगवद्भक्तिरसायन में वृति में की है जिसके द्वारा न केवल उन्होंने भक्ति में निरतिशय पुरुषार्थता एवं आनन्द की सिद्धि की बल्कि लौकिक रस से उसकी विलक्षणता भी सिद्ध की है। उनका कथन है - 
 भक्तिसुखधारायाः सर्वदेशकालशरीरेन्द्रियादिसाधारण्येन ब्रहमविद्याफलवदुपभोक्तुं शक्यत्वात् क्षयित्वपारतन्त्र्ययलक्षण दुखद्वयानुवेधाभावेन निरतिशयत्वोपपत्तेः। ..... (2) अतएवाऽऽपत्तावपि दुखासंस्पर्शित्वप्रतिपादनायास्पृष्टदुखमिति विशेषणमुपात्तम्। अतएव च न परिणतिविरसेन स्वर्गादिना साम्यम्। एतेन लौकिकरसवैलक्षण्यपि व्याख्यातम्, तस्यापि शास्त्रविहितत्वेन पापक्षयाहेतुत्वेनाऽऽपत्तौ दुखसंस्पर्शित्वात्। (3) 
       भक्ति परम पुरूषार्थ रूप है यह स्पष्ट करने के लिए पूर्वपक्ष प्रस्तुत करते है - 
अत्रोच्यते- फलसाधनभेदेन भक्तिद्वैविध्योपपत्तेरदोषः। तथाहि - भजनमन्तःकरणस्य भगवदाकारतारूपं भक्तिरिति भावव्युत्पत्त्या भक्तिशब्देन फलमभिधीयते। तस्य च निरतिशयपुमर्थत्वात् पूर्वोक्तवादानां प्रमाण्यमव्याहतम्। तथा, भज्यते सेव्यते भगवदाकारमन्तकरणं क्रियतेऽनयेति ‘करण व्युत्पत्त्या भक्तिशब्देन श्रवणकीर्तनादि साधनमभिधीयते, तस्य पुरूषार्थत्वाभावात् साधनत्ववादानामपि प्रामाण्यमविरूद्धम्। (4)
      अतः फल और साधन भेद से भक्ति के दो प्रकार मानने से कोई दोष नहीं होता है। इसी के साथ मधुसूदन एक और पूर्वपक्ष भी रखते है कि यदि भगवद्भक्ति ही परम पुरूषार्थ है तो ब्रहमविद्या और इसमें कोई अन्तर नहीं प्रतीत होता है अतः ब्रहमविद्या का ही नामान्तर भगवद्भक्ति है- ऐसा माना जाय –
      ननु तर्हि नामान्तरेण ब्रहमविद्यैव भगवद्भक्तिरित्युक्तम्। (5) 
   काव्यशास्त्रियों के अनुसार भक्ति रस नहीं; भाव है क्योकि उसका स्थाईभाव रसता को प्राप्त नहीं होता है ।अतः भक्ति भाव है ,साथ ही रस की अपेक्षा उसमें आनंद भी न्यून होता है। मधुसूदन सरसवती ने भी 'विभावानुभावव्यभिचारिसंयोगाद्रसनिष्पत्तिः 'इस रस सूत्र से ही भक्ति रस की निष्पत्ति मानी है और भक्ति के स्थायीभाव की रसत्वसिद्धि को सिद्ध करने के लिए मधुसूदन भगवान् की परमानन्दरूपता का उपपादन करते है - 
   भगवान् परमानन्दस्वरूपः स्वयमेव हि। मनोगतस्तदाकारों रसतामेति पुष्कलम्।। (9) 
    अर्थात परमांनद भगवान का बिंब मन रूप उपाधि में प्रतिबिम्बित हो स्थायिभावता को पाकर रसता को प्राप्त होता है इसलिये भक्तिरस की परमानन्दरूपता निर्विवाद सिद्ध है। वृत्ति में लौकिक रस एवं भक्तिरस की आनंदरूपता को और स्पष्ट करते हुए निष्कर्ष रूप में कहते है ,कि विषयावच्छिन्न चैतन्य ही द्रवीभूत हुई मनोवृत्ति में आरूढ होने से भाव होकर रसत्व को प्राप्त होता है। इसलिये लौकिक रस के भी परमानंदरूप होने में कोई अनुपपत्ति नहीं है। अंतर केवल इतना है कि भक्तिरस की स्थिति में अनवच्छिन्न चिदानंदघन भगवान् की ही प्रतीति होने से आनंद अत्यधिक होता है ,किंतु लौकिक रस में विषयावच्छिन्न चिदानंद का ही स्फुरण होता है ,इसलिये उसमें आनंद कम रहता है। अतः आनंद का आधिक्य होने से लौकिक रसों को छोड़कर भक्तिरस का ही सेवन करना चाहिए। स्थाईभाव की रसता मधुसूदन ने वेदान्त एवं सांख्य दोनों ही आधार पर सिद्ध की है। 
    अतः काव्यशास्त्रियों के अनुसार भक्ति रस नहीं; भाव है ।अतः उसमें आनंदरूपता कम है ,इस मत का खण्डन करते हुए भक्ति में लौकिक रस से अधिक आनंदरूपता प्रमाणित की है।      
          मधुसूदन के अनुसार काम, क्रोध, भय , स्नेह, हर्ष, शोक, दया और शम इन आठ तापकों से चित्त द्रुति संभव है ।चित्त में जितने प्रकार की द्रुतियां होती हैं, उतने ही स्थायीभाव होते हैं। मधुसूदन ने इन आठ स्वतंत्र तापकों से सत्रह स्थायीभाव माने हैं- 
 1. संभोगरति 2. विप्रलम्भरति 3. ईर्ष्या जन्य  द्वेष 4. भयजन्य द्वेष 5. प्रीतिजनक भय 6. वत्सल रति 7. प्रेयोरति 8. शुद्धा रति 9. हासरति 10. विस्मय 11. युद्धोत्साह 12. शोकरति 13. जुगुप्सा 14. दयोत्साह 15. दानोत्साह 16. धर्मोत्साह 17. शम
   इन स्थाई भावों में से कुछ भक्तिरसता को प्राप्त नहीं होते हैं। इनके भक्तिरसता को प्राप्त न होने के दो कारण है - 1. भगवद्विषयक न होकर अन्य विषयक होना। उदाहरणार्थ - धर्मोत्साह दयोत्साह, तीन प्रकार की जुगुप्सा, (उद्वेगिनी , क्षोभिणी ओर शुद्धा) और शम 2. साक्षात् चित्तद्रुति का न होना। जैसे - ईर्ष्या जन्य  एवं भयजन्य द्वेष भगवद्विषयक होने पर भी चित्तद्रुति के साक्षात्कारण न होने के फलस्वरूप शुद्ध रौद्र एवं रौद्र भयानक रस भक्तिरसता को प्राप्त नहीं होते। 
  अतः उपर्युक्त स्थाईभावों .1. संभोगरति 2. विप्रलम्भरति से श्रृगांर, शोकरति से करूण, प्रीतिजनक भय से प्रीति भयानक, हासरति से हास्य, विस्मय से अद्भुत , युद्धोत्साह से युद्धवीर , दानोत्साह से दानबीर मिश्रित रसों की अनुभूति होती है। मिश्रण से मधुसूदन का तात्पर्य है भावों . स्थायी, विभाव, अनुभाव, व्यभिचारी तथा दो या अनेक रसों का परस्पर मिश्रण। शुद्धारति, वत्सलरति और प्रेयोरति का अन्य स्थायीभावों से मिश्रण न होने के कारण क्रमशः विशुद्ध, वत्सल और प्रेयान् अमिश्रित रति एवं अमिश्रित रस कहलाते हैं। यह रस ही ग्रंथकार के शब्दों में परिपुष्कल अर्थात् सर्वश्रेष्ठ होता है। इन तीन अमिश्रित रसों की अवधारणा वैष्णवचार्यों की देन है। अलंकारशास्त्र की लम्बी परम्परा में वैष्णवचार्यों के अतिरिक्त अन्य किसी आचार्य न इनको स्वीकृति नहीं प्रदान की है। 
   अतः प्राचीन अलंकारशास्त्र के नौ रसों के विपरीत मधुसूदन ने दस रसों को मान्यता प्रदान की है। जिसे निम्न तालिका से समझा जा सकता है- 
 प्राचीनअलंकारशास्त्र में रस/        मधुसूदन द्वारा वर्णित रस 
 श्रृंगार                                     श्रृंगार 
 करूण                              करूण 
 भयानक                        प्रीतिभयानक 
 हास्य                          हास्य 
 अद्भुत                         अद्भुत 
 वीर                          युद्धवीर 
 वीभत्स                    दानवीर 
 शांत                      विशुद्ध 
 रौद्र                       वत्सल 
                              प्रेयान् 
        मधुसूदन के रस विवेचन के देखते हुए हम इस निष्कर्ष पर पहुचते हैं ,कि रसों के प्रति उनकी दृष्टि आलंकारिकों से भिन्न है। प्रतिष्ठित नवरसों को वे अस्वीकार नहीं करते; पर रस को उन्होंने दो श्रेणियों में विभाजित किया है। लौकिक धरातल पर अनुभूत होने वाले जो रस है, जिन्हें श्रृंगारादि के रूप में अलंकार शास्त्र ने पारिभाषित किया है ,वे उनको भी मान्य है पर इन सबका भक्ति के धरातल पर रसत्व नहीं माना जा सकता। इनमें से जिन रसों में कृष्ण विषयकत्व है और उसी के कारण चित्तद्रुति की जनकता है ,वे ही भक्तिरस के रूप में मान्य है। इसी दृष्टि से उन्होंने जुगुप्सा, शम , क्रोध अर्थात् वीभत्स, शान्त और रौद्र इन रसों को भक्ति की भूमिका से बाहर रखा है। पर लौकिक धरातल पर उनकी रसता का खण्डन वह नहीं करते साथ ही इन तीनों रसों को जैसे उन्होंने छोड़ दिया है ।उसी प्रकार आलंकारिकों के द्वारा अस्वीकृत तीन नए रसों को वह मानते है- विशुद्ध, वत्सल, और प्रेयान् भले ही लौकिक धरातल पर आलंकारिक ,उसे भाव की कोटि से रखते हैं। रस संप्रदाय के आचार्यो ने देवादि विषयारति और निर्वेदादि संचारी भावों को भाव माना; रस नहीं। मधुसूदन भी भक्तिरस में कृष्ण विषया रति मानते है ।अतएवं भक्तिरस की निष्पत्ति कैसे होगी ? इस शंका का समाधान करते हुए मुधसूदन कहते हैं कि कृष्ण के अतिरिक्त अन्य देवता विषयक रति तो भाव होती है ,लेकिन कृष्ण विषयक रति रस है और वह लौकिक रसों से श्रेष्ठ है। सामान्य देवता जीवरूप तथा मलिनसत्व प्रधान होते हैं इस कारण परमानंद के धाम नहीं है ।कृष्ण इसके विपरीत हैं। इसीलिये सामान्य देवरति की अपेक्षा कृष्णरति में आनंद अधिक और विलक्षण होता है - 
  देवान्तरेषु जीवत्वात् परानंदप्रकाशनात्।
 तद्योज्यं परमानदरूपे न परमात्मनि।।(10) 
     लौकिक रस की भक्ति रस से तुलना करते हुए मधुसूदन कहते हैं कि कृष्ण विषयक रति, लौकिक कान्तादि विषया रति से श्रेष्ठ होती है। कान्तादि विषया रति में सुख की अनुभूति तो होती है ,लेकिन उसमें पूर्ण सुख का स्पर्श नहीं हो पाता ,जबकि कृष्ण विषयक भक्तिरस परिपूर्ण रस वाला है, उसके समक्ष लौकिक रस उसी प्रकार प्रतीत होता है - जैसे सूर्य के समक्ष जुगनुओं की प्रभा। इसके अतिरिक्त लौकिक रस में क्रोध, शोक, भय आदि तो सुख विरोधी है परंतु उनकों थोड़े से अनुभव के कारण रस मान लिया गया है। इनकी तुलना में भक्तिरस से अनुभूत होने वाला आनंद सहस्त्रगुना है। अतः मधुसूदन के मत में भक्तिरस की स्थिति से इंकार नहीं किया जा सकता।      
           भगवद्भक्ति रसायन में मधुसूदन सरस्वती की रस संप्रराय के आचार्यो के मत से विभिन्नता तीन स्थलों पर विशेष रूप से दिखाई देती है। 
  1. भक्ति रस नहीं अपितु भाव है ।
 2. स्थाई भाव की स्थिति एवं उसकी रसरूपता 
 3. रस के प्रकार 
      किन्तु रस प्रक्रिया, रस की प्रतीति, रस का आधार, रस की नित्यता, विभाव, अनुभाव, व्यभिचारी भाव का लक्षण, अलौकिक रस की उत्पत्ति, व्यंजना के द्वारा रस की प्रतीति, आदि सिद्धान्तों को मधुसूदन ने उसी रूप में स्वीकार करते हुए तृतीया उल्लास में वर्णन किया है। 
       प्रसंगत यह उल्लेखनीय है कि मधुसूदन ने रसों का प्रतिपादन मात्र किया है ,उन्हें उदाहरणों द्वारा स्पष्ट नहीं किया है जबकि हरिभक्तिरसामृतसिन्धु में रूप गोस्वामी ने प्रत्येक रस को उदाहरण के द्वारा स्पष्ट ही नहीं किया ,बल्कि प्रत्येक रस के स्थाई भाव, विभाव, अनुभाव, सात्विक और व्यभिचारी भावों का भी निरूपण पृथक रूप से किया है। जिसके आधार पर यह कहा जा सकता है कि रूपगोस्वामी ने भक्ति की रसरुपता की नींव डाली तथा मधुसूदन ने भक्ति की रस रूप की स्थापना में उन्होंने दर्शन के आधार पर भी विषय को स्पष्ट करने   का प्रयास किया है ,क्योंकि रस सिद्धान्त की व्याख्या आचार्योंने दर्शन के आधार पर की थी ।अतः उनके तर्कों को खण्डित किये बिना भक्ति रस की स्थापना विद्वत्वर्ग में समादृत नहीं हो पाती। दूसरी ओर भक्तिपरक साहित्य का सृजन अपने चरम विकास पर था। उन रचनाओं की भक्ति भावना को रस कोटि में रखने से आचार्य हिचक रहे थे। ऐसे समय में उन रचनाओं एवं कवियों को मान्यता प्रदान करने के लिए ही भक्तिरस की स्थापना करना ही मधुसूदन का उद्देश्य था। अतः मधुसूदन ने अपने गुरू आचार्य शङ्कर के सिद्धान्तो का अनुसरण करने के बजाय सामाजिक चेतना के साथ सामंजस्य स्थापित करने में अधिक रूचि दिखाई क्योंकि वही उस युग की मांग थी।
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 संदर्भ ग्रन्थ - 1. नाट्य शास्त्र 6/82 अभिनव भारती-पृष्ट - 340 
2. भगवद्भक्तिरसायन ,जनार्दन शास्त्री पाण्डेय ,गिरिजेश कुमार पाण्डेय ,पञ्चगङ्गा ,वाराणसी ,द्वितीय संस्करण पृष्ठ- 27 
3.वही , भगवद्भक्तिरसायन-पृष्ठ - 28
 4. वही ,भगवद्भक्तिरसायन पृष्ठ - 19 
5. वही ,भगवद्भक्तिरसायन - पृष्ठ - 24 
6. रस गंगाधर प्रथम आननम् पृष्ठ- 184-1/-9 
7. वही, भगवद्भक्तिरसायन 1/-9 
8. वही, भगवदभक्तिरसायन- पृष्ठ-41 
9. वही ,भगवदभक्तिरसायन-1/10 
10. वही,भगवदभक्तिरसायन-2/75

विशेष-    Global journal of Multidisciplinary Studies ,Volume 3,Issue 9,August 2014,ISSN NO.2348-0459 ,Available online at www.gims.co.in में प्रकाशित लेख  

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