संस्कृत ग्रन्थों में भोजन की अवधारणा
मनुष्य की मूलभूत आवश्यकताओं में सर्वप्रथम एवं सबसे महत्वपूर्ण आवश्यकता भोजन है । भोजन जहां व्यक्ति की शारीरिक वृद्धि एवं पोषण करता है ,वहीं दूसरी ओर उसे कार्य करने की शक्ति भी प्रदान करता है । अतः भोजन कैसा हो ? जिससे हमारा समुचित विकास हो सके ।
सूचना ऋवं प्रद्यौगिकी के वर्तमान दौर में विकास की गति अत्यधिक तीव्र है । मानव के विकास से जहां एक ओर सुविधाओं एवं आराम के साधनों में वॄद्धि हुई है ,तो वहीं दूसरी ओर उसकी जीवन शैली में आए परिवर्तनों से ,मानव एवं समाज के सामने अनेक समस्याए भी उत्पन्न हुई हैं । उसकी रोग प्रतिरोधक क्षमता में कमी हुई है तथा हर परिवार में दवाईयों का सेवन भी बहुलता से दिखाई पड़ रहा है । व्यक्ति अपने स्वास्थ्य के प्रति सचेष्ट रहने लगे हैं ,किन्तु फिर भी वे बीमारियों से बच नहीं पा रहे हैं । आज हम इन समस्याओं के निदान के लिये प्रयासरत हैं ।
ऐसे समय में संस्कॄत ग्रंथों में उल्लेखित संदर्भों
के अवलोकन से यह बात स्पष्ट होती है कि भोजन एवं स्वास्थ्य के प्रति आधुनिक
दृष्ट एकांगी है ,क़्योंकि वह शरीर को मन से अलग करके विचार करता है जबकि
संस्कॄत ग्रंथों में शरीर, मन एवं आत्मा के संयुक़्त रूप पर ही विचार
प्राप्त होते हैं ।
अपने इस शोध पत्र में मैंने संस्कृत ग्रन्थों में उल्लेखित तथ्यों को संकलित कर यह स्पष्ट करने का प्रयास किया है कि संस्कृत ग्रन्थों में उल्लेखित वे तथ्य आधुनिक दृष्टिकोण से अधिक उचित, व्यापक एवं सर्वांगीण है ।
संस्कृत ग्रन्थों में भोजन की अवधारणा के सम्बन्ध में निम्न तत्वों पर विशेष बल दिया है:-
1. भोजन की मात्रा एवं भोज्य पदार्थ के साथ साथ व्यक्ति को अपनी वात, पित्त या कफ प्रवृत्ति के अनुसार भोजन करना चाहिये ।
2. भोजन में पौष्टिकता के साथ भोजन करने वाले व्यक्ति के अग्निबल पर भी विचार करना चाहिए ।
3.भोजन का प्रभाव शरीर के साथ साथ मन पर भी पडता है ।अतः भोजन सात्विक होना चाहिये ।
(4 ) शारीरिक स्वास्थ्य के साथ-साथ मानसिक स्वास्थ्य की प्रााप्ति हेतु प्रयासरत होना चाहिए ।
संस्कृत ग्रन्थों की इस परम्परा के विपरीत आधुनिक पोषण वैज्ञानिक भोजन के संम्बन्ध में दो दृष्टि से विचार करते हैं ।
(क) भोजन में किन तत्वों की प्रधानता होनी चाहिये और (ख) भोजन की मात्रा कितनी होनी चाहिये । वे भोजन का सम्बन्ध केवल शारीरिक पोषण से ही मानते हैं ।
आधुनिक पोषण वैज्ञानिको के अनुसार भोजन में प्रोटीन ,वसा, कार्बोहाइड्रेट विटामीन , खनिज लवण आदि तत्वों की प्रधानता होनी चाहिये । भोजन की मात्रा के सम्बन्ध में 17 वीं शताब्दी में पेरिस में एन्टोनी लेवोसियर (1743-1794) जो (father of nutrition ) कहे जाते है, ने मनुष्य के metabolism (1 ) को मापा । कालान्तर में ग्राहम लस्क (1866-1932) ने जर्मनी में कैलोरी मीटर का निर्माण किया । इसी को आधार मानकर आजकल भोजन में पोषक तत्वों की उपयोगिता,उसकी संतुलित मात्रा एवं कैलोरी पर अत्यधिक बल दिया जाने लगा । आजकल यह बल इतना अधिक हो गया है कि भोजन की सात्विकता एवं पौष्टिकता से अधिक महत्वपूर्ण कैलोरी हो गई है । व्यक्ति एक समोसा खा कर सोचता है कि इसमें इतनी कैलोरी हो गई है ,शेष भोजन की क्या आवश्यकता है ? किन्तु पोषक तत्वों की एवं कैलोरी की मात्रा विभिन्न आयु,लिंग,स्थान, क्रिया, शरीर के आकार इत्यादि के अनुसार भिन्न -भिन्न होती है । यह तथ्य पोषण वैज्ञानिक भी मानते हैं । इसके अतिरिक्त इससे संबंधित एक अन्य प्रश्न भी अत्यधिक महत्वपूर्ण है कि कैलोरी उष्मा को मापने की ईकाई हैं । वह यह नहीं बताती कि जिस पदार्थ से यह कैलोरी प्राप्त हुई है ,वह पदार्थ उस व्यक्ति की प्रकृति के अनुरूप अर्थात उस के स्वास्थ के लिये हितकर है या नहीं । निष्कर्षतः पोषण वैज्ञानिक भोजन में दो तत्वों की ही प्रधानता मानते है कैलोरी एवं भोज्य पदार्थ ।
आयुर्वेद में भोजन की मात्रा ( कैलोरी) एवं द्रव्य के साथ-साथ भोजन करने वाला व्यक्ति कौन है अर्थात उसका अग्नि बल कैसा है ?इस पर भी विशेष ध्यान दिया गया है ।
मात्राशी स्यात् । आहार मात्रा पुनरग्निबलापेक्षिणी ।
न च नापेक्षते द्रव्यम् (2)।
अतः आहार की मात्रा के निर्धारण हेतु आयुर्वेद में अग्निबल, द्रव्य और मात्रा तीनों को महत्वपूर्ण माना है (3)। अतः अग्निबल, द्वव्य एवं मात्रा को ध्यान में रखकर भोजन करना उचित है क्योंकि वह भोजन वात, पित्त कफ को दूषित न करते हुये पूर्ण आयु को बढ़ाता है । अग्नि को नष्ट नहीं करता है और निरापद पच जाता है । यह अग्नि बल वात, पित्त और कफ प्रकृति के अनुसार स्वस्थ पुरूष में भी भिन्न-भिन्न होता है । अतः वात, पित्त और कफ की प्रधानता के अनुसार स्वस्थ पुरूष के लिये भोजन आदि का ग्रहण हितकर होता है ।
वस्तुतः अन्न से ही जीव उत्पन्न होते हैं एवं उसी अन्न को खाकर वे जीवन धारण करते हैं किन्तु सभी व्यक्तियो के लिये न तो आहार की मात्रा समान हो सकती है और न ही आहार। उदाहरणार्थः दुग्ध के समान हितकर पदार्थ भी कुछ लोगों के अनुकुल नहीं होता ,यह प्रत्यक्ष देखा जाता है ।घृत के सदृश पुष्टिकर पदार्थ भी ,मदाग्नि वालों के लिये अहितकर होता है । इस प्रकार स्थूल शरीर में भी भिन्न-भिन्न प्रकृति वालों के लिये भिन्न-भिन्न आहार की व्यवस्था होती है । क्योंकि पित्त प्रकृति के व्यक्ति में अग्नि अधिक होती है ।अतः उसे भोजन की मात्रा व वात के व्यक्ति की अपेक्षा अधिक चाहिये । (4)
आजकल आधुनिक चिकित्सक भी संभवतः इसी सिद्धांत को मानकर पित्त प्रधान व्यक्ति को ठण्डा दूध पीने की सलाह देते है किन्तु वहीं ठण्डा दूध कफ प्रधान व्यक्ति के लिये अहितकर होगा । अतः व्यक्ति की वात, पित्त ,कफ प्रकृति को अनदेखा करके सिर्फ कैलोरी को आधार मानकर भोजन करना उचित नहीं है ।
आधुनिक चिकित्सा शास़्त्र में शारीरिक स्वास्थ्य को ही सर्वोपरि माना गया है और सामान्यतया शारीरिक रोगों पर ही विस्तार से विचार किया गया है।
शारीरिक स्वास्थ्य संतुलित भोजन से प्राप्त होता है ,ऐसी उनकी अवधारणा है । वहां पर मानसिक रोगों पर जो भी विचार हुआ है वह शरीर को मन से अलग करके ही हुआ है किन्तु आजकल मनोदैहिकता का सिद्धान्त वे भी स्वीकार करने लगे हैं। तदनुसार ही विश्व स्वास्थ्य संगठन ( W.H.O.)ने स्वास्थ्य की परिभाषा दी है -
Health
is the physical ,mental and social wellbeing of
man and not merely the absence of disease or infirmity.
इस प्रकार मानसिक स्वास्थ्य भी स्वास्थ्य सामान्य का ही अंग है । स्वास्थ्य की यह परिभाषा संस्कृत के अति प्राचीन ग्रन्थ सुश्रुत संहिता में प्राप्त होती है ।
समदोषः समाग्निश्च समधातु मल क्रियः।
प्रसन्नात्मेंद्रिय मनाः स्वस्थ इत्याभिधीयते ।।
सुश्रुत सू. 15:41
अतः शारीरिक एवं मानसिक स्वस्थता को ही स्वास्थ्य माना गया है । स्वस्थ के स्वास्थ्य का रक्षण तथा आतुर के रोग का प्रशमन आयुर्वेद के दो प्रयोजन कहे गये हैं। (5) । यहां रोग प्रशमन की अपेक्षा स्वास्थ्य रक्षण को अधिक महत्व दिया गया है शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य का पोषण एवं स्वास्थ्य रक्षण भोजन के द्वारा ही संभव है ।
भारतीय परम्परा आहार को प्रभाव स्थूल शरीर के पोषण तक ही सीमित नहीं मानती है ,बल्कि उसके अनुसार स्थूल शरीर के पोषण के अतिरिक्त वह सूक्ष्म शरीर का भी सूक्ष्म रूप में आहार बनता है । छान्दोग्य उपनिषद (6)मे वर्णित है , कि जो अन्न खाया जाता है वह तीन रूप में परिणत होता है । उसका जो सबसे स्थूल भाग है वह पुरीष (मल) बनता है । जो मध्यम भाग है । वह मांस बनता है । जो स्थूल शरीर का पोषण करता है ओर जो सबसे सूक्ष्म भाग है वह मन बनता है । (मन को शक्ति प्रदान करता है ) इसी प्रकार जो जल पिया जाता है उसकी भी शरीर के भीतर तीन अवस्थायें होती हैं । स्थूल भाग से मूत्र बनता है , मध्यम भाग से लोहित बनता है ओर सूक्ष्मतम भाग से प्राण बनता है । तेज पदार्थ ( आग्नेय प्रधान पदार्थ ) के भी तीन रूप होते है । स्थूल से अस्थि का निर्माण होता है, । मध्यम भाग से मज्जा और सूक्ष्म सबसे सूक्ष्म तेज पदार्थ का परिणाम वाक् शक्ति का पोषक बनता है । इसी कारण मन अन्नमय है, प्राण अपोमय है ओर वाक् तेजोमयी है । वृहदारण्यक उपनिषद में आत्मा ही मन, प्राण वाड्मय कही गयी है ।
स वा एष आत्मा वाडमयः प्राणमयो मनोमयः।
इस प्रकार यह त्रिविध आहार अत्यन्त सूक्ष्म रूप से आत्मा का परिपोष करता है । छान्दोग्य उपनिषद में आचार्य ने इसका प्रयोग कराके भी दिखाया ।उन्होंने छात्र को आदेश दिया कि पन्द्रह दिन तक भोजन न करो, इच्छानुसार जल पियो । पानी पीते रहने से प्राण का विच्छेद न होगा क्योंकि प्राण अपोमय है । छात्र पन्द्रह दिन बिना भोजन के व्यतीत करके आचार्य के समीप पहुचा । आचार्य ने कहा -ऋक यजुः और साम बोलो । छात्र ने उत्तर दिया है मुझे उनका स्फुरण नहीं हो रहा अर्थात वे स्मरण पथ में नहीं आ रहे है । आचार्य ने कहा अच्छा अब भोजन करो । भोजनोपरान्त वह पुनः आचार्य के पास आया तब उन्होंने जो कुछ पूछा वह सब उसे याद आ गया । इससे स्पष्ट होता है कि मन अन्नमय है प्राण जलमय और वाक् तेजोमय ।
इसी प्रकार छान्दोग्य उपनिषद के सप्तम अध्याय के सोलहवें खण्ड में वर्णित है कि आहार शुद्वि होने पर अन्तः करण की शुद्वि होती है और क्रमशः अविद्या की निवृत्ति होती है (7)। वस्तुतः आहार शुद्धि से शरीर स्वस्थ होगा जिससे मन भी सत्वयुक्त होगा फलस्वरूप अविद्य का विनाश होगा ।
भोजन का प्रभाव मन पर किस प्रकार पडता है आयुर्वेद में यह विस्तार से बतलाया गया है । भोज्य पदार्थ में षड् रस होते हैं तथा जिस रस की भोजन में अधिकता होती है वही रस भोजन का होता है । इन रसों का शरीर तथा मन पर अच्छा या बुरा प्रभाव पड़ता है । किसी भी रस या स्वाद का भोजन यदि सही अनुपा़त में लिया जाता है तब वह शरीर एवं मन पर अच्छा प्रभाव डालता है किन्तु अनुचित अनुपात में वह शरीर पर दुष्प्रभाव डालता है । चरक संहिता के सत्रस्थान अंध्याय 26 में इस पर विस्तार से प्रकाश डाला गया है -
षडेव रसाः इत्युवाच भगवानात्रेयः पुनर्वसुः । मधुराम्ल लवण कटुतिक्तकषायः 16
तेषां षण्णां रसानामेकैकस्य यथाद्रव्यं गुणकर्मान्यनुष्याख्यास्यामः ।
1. तत्र मधुरो रसः शरीर सात्मयाद्रसरूधिरमांसमेधो स्थिमज्जौजः शुक्राभिवर्धनं
आयुष्यः षडिन्द्रिय प्रसादनो बलवर्णकरः पित्त विषमारूतध्नः तृष्णाप्रशमनः...
सएवं गुणो sप्येक एवं अत्यर्थमुपयुज्यमानः स्थौल्यं मार्दवं आलस्यं अतिस्वप्न.. संज्ञाप्रणाश...........इत्येवं प्रभृतीन् कफजान् जनयति ।(60)
2. अम्लो रसो भक्तं रोचयति अग्निं दीपयति देहं वृंहयति उर्जयति मनोबोध्यति इंद्रियाणि दृढीकरोति, बलं वर्धयति..... स एवं गुणोsपि एक एवात्यर्थ उपयुज्यमानः दंतान् हर्षयति तर्षयतिकफं विलापयति ...... परिदहति कण्ठपुरो हदयं च(61)
3. लवणो रसः पाचनः कलेदनो .........वातहरः........कफं विष्यंदयति सर्वशरीराववयवान् मृदु करोति,.......... स एवं गुणोsपि एक एवात्यर्थ उपयुज्यमानः पित्तं कोपयति..........मोहयति मूर्छयति.......इन्द्रियाण्युपरूणद्वि(62)
4. कटुको रसो वक़्त्रं शोधयति अग्निं दीपयति भुक्तं शोषयति स्फुटीकरोति इन्द्रियाणि......मांस विलिखति शोणितसंधात ...........स एवं गुणेsपि प्येकं एवात्यर्थमुयुज्यमानो विपाकप्रभावात् पुंस्त्वमुपहन्ति रसवीर्यप्रभावानमंयोहयति
मूर्छयति .... भ्रमयति.....मारूतजान् विकारानुपजनयति (63)
5. तिक्तो रसः स्वयंमरोचिष्णु: अरोचकध्नः .... मूर्छादहकण्डू्कुष्ठ तृष्णाप्रशमनः स एवं गुणोsप्येकं एवात्यर्थ मुपयुज्यमानों रौक्ष्यात् खरविशदस्वंभावाच्च रसरूधिरमांसमेदो sस्थि.......... मज्जा शुक्राणि उच्चोषयति ......मोहयति ।भ्रमयति.....अपरांश्च वात्यर्थमुपयुज्यमान आस्यं पीडयति...वात विकरानुपजनयति । //65//
एव ते षड्रसाः पृथक्त्वेन एकत्वेन वा मात्रशः सम्यगुपयुज्यमान उपकारकरा भवन्त्यध्यात्मलोकस्य । अपकारककरा पुनरतो न्यूथोपयुज्यमानाः तान विद्वानुपाकारार्थमेव मात्रशः सम्युगुपयोजयेत । //66//
भगवदगीता (8)और कल्किपुराण (9)में भोजन के सात्विक राजसिक और तामसिक तीन प्रकार वर्णित है ।जिनके कारण व्यक्ति के मन की प्रवृति सात्विक राजसिक एवं तामसिक हो जाती है । सुश्रुत एवं चरक संहिता में सत्वप्रकृति वाला व्यक्ति उत्तम मनोबल वाला राजसी प्रकृति का व्यक्ति मध्यम मनोबल वाला तथा तामसी प्रकृति वाला व्यक्ति अल्प मनोबल वाला होता है । इसी मनोबल तथा सत्व की प्रकृति पर ही मानस स्वास्थ्य निर्भर होता है ।जिसका पोषण भोजन द्वारा होता है । यह तथ्य वैज्ञानिक कसौटी पर भी खरा उतरता है क्योंकि यह सिद्ध है कि अधिक कटु, तीक्ष्ण, अम्ल आदि रस पित्त को कुपित करते हैं जिसके फलस्वरूप व्यक्ति शीघ्र क्रोध करने वाला चंचल आदि हो जाता है । वास्तव में यही राजसी प्रवृति है । संभवतः यही कारण है कि ध्यान करने वाले व्यक्ति के लिये अम्ल रूक्ष और तीक्ष्ण भोजन का निषेध किया गया है(10)। जबकि सात्विक प्रवृत्ति वालों के लिये अथवा ध्यान आदि में मन को एकाग्र करने वालों के लिये मधुर भोजन का विधान है क्योंकि वह व्यक्ति के पित्त का नाश करता है । (11)
भोजन के द्वारा शरीर एवं मन का पोषण होता है । शरीर और मन जीवित प्राणी के मुख्य परिपूरक घटक है। यही दोनों स्वास्थ अथवा व्याधि के स्थान है । अतः हमें सात्विक भोजन के लिये प्रयत्नशील होना चाहिये ।
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संदर्भ सूची
1. भोजन के पोषक तत्वों को शरीर के योग्य बनाने के लिये आक्सीजन की अत्यधिक आवश्यकता होती है एवं यह प्रक्रिया (metabolism)कहलाती है।
2. स्वस्थ वृत्त समुच्चय पृ-88 डा.अखिलेश्वर दत्त मिश्र
3. पुनर्नाग्नि संधु क्षणस्भावान्यसामान्यदतश्चातिमात्रं दोषवन्ति सौहित्योपयुक्तान्यन्यत्र व्यायामााग्नि बलात् सैषा भवत्यग्नि बलापेक्षिणी मात्रा ।वही पृष्ठ 89
दीप्ताग्नयः खराहाराः कर्मनित्या महोदराः।
ये नराः प्रति तांश्चिन्त्यं नावश्यं गुरू लाधवम् ।।
वही पृष्ठ
4.मन्दस्तीक्ष्णोथ विषमः समश्चेति चतुर्विधः।
कफपित्तानिलाधिक्यात् तत्साभ्याज्जाठरोनलः।।
विषमो वातजान् रोगोन्तीक्ष्णः पित्तनिमित्तकान् ।
करोत्यग्निस्तथा मन्दो विकारान्कफसंभवान् ।
समा समाग्नेरशिता मात्रा सम्यग्विपच्यते ।
स्वल्पापि नैव मन्दाग्नेर्विषमाग्नेस्तु देहिनः।।
कदाचित्पच्यते सम्यक्कदाचिच्च न पच्यते ।
तीक्ष्णाग्निरिति तं विद्यात्समाग्निः श्रेष्ठ उच्यते । मा.नि.वैधकग्रन्थे
5.प्रयोजन चास्य स्वस्थस्यस्वास्थ्य रक्षणमातुरस्य विकारं प्रशमनं च । च.सू.30/26
6.छान्दोग्य उपनिषद 6/5/1, 4,
7. आहारशुद्धौ सत्वशुद्धौ ध्रुवा स्मृतिः ।
स्मृतिलम्भे सर्वग्रन्थीनां विप्रमोक्षः।
छान्दोग्य उपनिषद 7-26-2
8.आहारस्वपि सर्वस्य त्रिविधो भवति प्रियः ।
यज्ञस्तपस्तथा दानं तेषां भेदभियं च श्रृणु ।।
आयुस्सत्वबलारोग्यसुख प्रीतिविवर्धर्ना ।
रस्याःस्निग्धा स्थिरा हयद्या आहाराः सात्विकप्रियाः ।।
कटबम्ललवणात्युषणतीष्ण रूक्षविदाहितः ।
आहारा राजसस्थेष्टा दुरव्यशोकामय प्रदाः ।।
यातयामं गतरसं पूर्तिपर्युवितं च यत ।
उच्छिष्टमपि चामेध्यं भोजनं तामसप्रियम।।
(भवदगीता अध्याय-17/7-10)
9.उच्छिष्टमविशष्टं वां पथ्यं पूतमभीक्षितय ।
भक्तानां भोजनं विषणोर्नवधं सात्विकम मतम ।।
इन्द्रियप्रीतिजनन शुक्रशोणित वर्धनम् ।
भोजनं राजसं शुद्धमायुरारोग्यवर्धनम्।
अतः परं तामसानां
कटवम्लोषणविदाहिकम् पूतिपर्युषितं ज्ञेयं भोजनं तामसप्रियतम ।। कल्कि पुराण अ-25/44
10.अम्लं रूक्षं तथा तीक्ष्णं लवणं सार्षपं कटु
वृहदयोगसोपान उपोद्धात प्रकरण ।
11. शुद्ध सुमधुरं स्निग्धमुदरार्थ विवर्जितम् ।
भुज्यते सुरसं प्रीत्या भिताहारमिमं विदुः
वृहद्योग सोपान.
विश्व संस्कृति को भारत की देन विषय पर विश्व संस्कृत सम्मेलनम् 5-9 अप्रैल 2001 विज्ञान भवन नवदेहली में पठित शोध पत्र
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