"Sanskrit Gyan Jyotsna: बौद्ध धर्म के आचारपक्षीय सिद्धांतों का ब्राह्मणधर्मी मूल

बौद्ध धर्म के आचारपक्षीय सिद्धांतों का ब्राह्मणधर्मी मूल

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    महात्मा बुद्ध एक महान शिक्षक एवं धर्मोपदेशक थे । छठी शताब्दी ई0 पूर्व  में उनका आगमन भारतीय समाज के उत्थान में सहायक सिद्ध हुआ । उन्होंने समाज को एक नई दिशा प्रदान की । महाराज शुद्धोधन का पुत्र सिद्धार्थ, जिस समय अपना घर छोड़कर निकले उस समय ,केवल दुखों से मुक्ति का हेतु ढूँढना  एवं उसे प्राप्त करना ही उनका लक्ष्य था ।किंतु इस छोटे से लक्ष्य ने ,इतना विस्तृत एवं व्यापक स्वरुप धारण कर लिया ,कि उसने समाज, देश तदनन्तर विश्व को भी समाहित कर लिया । बुद्ध ने उन्हीं तत्वों का प्रतिपादन किया जो सार्वकालिक एवं सार्वदेशिक थे । वे तत्व न  तो किसी वर्ग विशेष के लिए थे ,न ही जाति विशेष के लिए । आत्मश्लाघा से रहित वह संपूर्ण मानवता के लिए थे । उसमें न तो कर्मकाण्ड की जटिलता थी और न ही दर्शन शास्त्र की दुर्बोधता । यही कारण है कि वह चिरप्रतिष्ठित ब्राहमण धर्म के विरोध में और अनेक मतमतान्तरों के मध्य भी प्रतिष्ठित हो सका ।लेकिन क्या बौद्ध धर्म के सिद्धांत , ब्राह्मण धर्म के विरोधी थे ? 
       वस्तुतः महात्मा बुद्ध ने सर्वथा नवीन सिद्धान्तों की प्रतिष्ठापना नहीं की ,बल्कि उन्होंने  थोड़े बहुत परिवर्तनों के साथ बाह्रमण धर्म के सिद्धान्तों एवं कार्यप्रणालियों को ग्रहण किया । ब्राह्मण धर्म या पौराणिक धर्म का अनुशीलन करने पर यह स्पष्ट दिखाई पड़ता कि बौद्ध धर्म के व्यवहारिक सिद्धान्तों का आधार ,ब्राहमण धर्म ही रहा है । यहाँ मैं इन दोनों धर्मों की समानता पर प्रकाश डालूंगी ।
     हिन्दू अथवा ब्राह्मण व्यवस्थाकारों में धर्म की परिभाषा अत्यधिक व्यापक एवं उदात्त है । उनके अनुसार "ध्रियते लोक: अनेन इति धर्म:
अर्थात् जिससे लोकधारण किया जाय अथवा 
"धरति धारयति वा लोक: इति धर्म:
अर्थात् जो लोक को धारण करें । वृहदरण्यक उपनिषद् धर्म और सत्य को पर्यायवाची मानता है (1)। महाभारत में वर्णित है -
  यतो धर्मस्तत: सत्यम् । 
 मनु ने  ब्राहमण धर्म में धर्म के दस लक्षण बताए गये है।
      धृतिक्षमा दमोsस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रह:।
     धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्म लक्षणम् ।।
                                                मनु स्मृति 
तैत्तरीय उपनिषद्  में वर्णित है -     
सत्यं वद धर्मंचर स्वाध्यायान्मा प्रमद ... सत्यान्न प्रमदितव्यम् धर्मान्न प्रमदितव्यम्।
कुशलान्न प्रमदितव्यम् । भूत्यै न प्रमदिततव्यम्। 
इत्यादि तैत्तरीय उपनिषद् (2)के शब्द बौद्ध
धर्म (3) के नियमों के समान ही प्रतीत होते है ।
      महाभारत में वर्णित है कि इन्द्रियों और मन का दमन ही मोक्ष है (4) | महात्मा बुद्ध का उपदेश था कि रूप, शब्द, गंध, रस, स्पर्श, तथा मानसिक वितर्क और विचारों से मनुष्य आसाक्ति करने लगता है और यहीं तृष्णा का जन्म  होता है (5) ।सतृष्ण मनुष्य
कभी भी दुख से उद्धार नहीं पा सकता (6)।

      बौद्ध धर्म में जिन  चार आर्यसत्य का वर्णन मिलता है ,वह सांख्यशास्त्र के चार सत्यों के अनुकूल है । सांख्यप्रवचनभाष्य के अनुसार वे चार सत्य इस प्रकार है (i) जिससे हमें छुटकारा पाना है वह दुख है । ( ii) दुख के विनाश का नाम मोक्ष है । (iii) प्रकृति एवं पुरूष के  बीच भेद न करने से ही दुख उत्पन्न होता है। जिसके कारण प्रकृति व पुरूष का परस्पर संबंध बराबर बना रहता है । (iv) मोक्ष का उपाय सद्  असद्विवेक संबंधी ज्ञान ही है । 
    ब्राहमण धर्म  के समान बौद्ध धर्म ने भी  तप को  अत्यधिक महत्व दिया । ऋग्वेद का कथन है- तप से ऋत और सत्य की उत्पत्ति हुई है (7) उपनिषदों का कथन है कि तपस्या द्वारा ही ब्रह्रम को ढूंढा जाता है (8)।बौद्ध धर्म में भी तपस्या द्वारा ही लक्ष्य प्राप्ति संभव है। 
       ब्रह्मचर्य की महत्ता ब्राह्रमण धर्म में प्रतिष्ठित थी । छान्दोग्य उपनिषद का कथन है कि ब्रह्मचर्य के द्वारा ब्रह्मलोक की प्राप्ति होती है (9) । कठोपनिषद् में भी कहा गया है कि ब्रह्म प्राप्ति की कामना करने वाले व्यक्ति  ब्रह्मचर्य का अनुसरण करते हैं (10) । ब्राह्मण साहित्य में ब्रह्मचर्य का अनेकानेक गुणगान किया गया है । बौद्ध धर्म में श्रमण व्यवस्था के नियम एवं ब्राहमणों के संन्यास आश्रम के नियमों में समानता दृष्टिगोचर होती है ।जैसे उनके वस्त्र, उपकरण, भिक्षा संबंधी नियम, दिनचर्या आदि समान है। 
   ब्राहमण धर्म कर्मप्रधान धर्म है ।वृहदारण्यक उपनिषद का कथन है कि पुण्यकर्म से पुण्य और पाप कर्म से पाप की उत्पत्ति होती है (11) । छान्दोग्य उपनिषद् में उल्लिखित है' पुरूष कर्मप्रधान है' जैसा वह इस लोक में करता है उसी के अनुरूप मृत्यु के पश्चात उसे प्राप्त होता है (12) | बौद्ध धर्म के भी अनुसार मनुष्य अपने समस्त कर्मों के लिए उत्तरदायी है । कर्म के अनुरूप ही उसे फल मिलेगा । कर्म के कारण ही उसका पुर्नजन्म होता है । कर्म करते हुए भी उसमें लिप्त न होना ब्राहमण धर्म का प्रमुख सिद्धान्त है(13) I
       बौद्धों के विषय में सामान्य अवधारणा है कि ये वेदनिन्दक, यज्ञविरोधी और बाह्मण विरोधी हैं ।परंतु तात्विक दृष्टि से परीक्षण करने पर यह धारणा अनुचित प्रतीत होती है । गौतम बुद्ध ने अपने शिष्यों को आत्म प्रशंसा और पर- निन्दा से बचने का उपदेश दिया ।अत: वे स्वयं किसी की निन्दा कर सकते थे, यह संभव नहीं है । बुद्ध विभज्जवादी थे अर्थात् प्रत्येक मत में सत्य और असत्य का विभाजन करके ही, उसके अंशों को ग्रहण अथवा परित्याग करते थे ।उन्होंने अपने शिष्यों को भी विमंसक(मीमांसक) होने की सलाह दी थी (14) । उन्होंने वेदों का प्रमाण्य इसलिए अस्वीकार किया क्योंकि उनकी सत्योन्वेषिणी दृष्टि एकमात्र श्रद्धा के आधार पर किसी को भी पूर्ण एवं चिर सत्य मानने के लिए तैयार नहीं थी । यहाँ यह भी उल्लेखनीय है, कि उपनिषद् के मनीषियों को भी एकमात्र वेदज्ञान से संतुष्टि नहीं थी क्योंकि वेदों के ज्ञाता नारद ,छान्दोग्य उपनिषद् में कहते हैं - मैं केवल मंत्रों को जानने वाला हॅू आत्मा को जानने वाला नहीं हूँ (15) । अतः महात्मा बुद्ध ने भी नारद जैसे मनीषियों के मार्ग का ही अनुसरण किया था, किंतु वेदों में सत्य में जो कुछ सत्य सम्मत था, वह अवश्य ही उनके लिए ग्राहय था । बुद्ध ने स्वयं को कभी भी वेदों का विरोधी नही कहा बल्कि स्वयं को "वेदगू' (वेदाज्ञ)(16)कहा था ।
ज्ञान प्राप्त करने के पश्चात् बुद्ध ने कहा ' मैं ब्राह्रमण हूँ' अर्थात् ब्रहम जानाति इति ब्राह्रमणः' ब्राह्रमणों की जाति व्यवस्था को बुद्ध कर्म के आधार पर स्वीकार करते थे जन्म के आधार पर नहीं ।
    बुद्ध यज्ञ विरोधी नहीं थे ।वे तो एकमात्र हिंसात्मक एवं कर्मकाण्डीय यज्ञों के ही विरोधी थे । उत्तर वैदिक काल में यज्ञों में की गई हिंसा को रोकने के लिए ब्राहमण धर्म में भी प्रयास किया गया ।यही कारण है कि उपनिषदों में यज्ञ की आध्यात्मिक व्याख्या प्राप्त होती है।
      बौद्ध शिक्षा प्रणाली ने ब्राहमणीय शिक्षा पद्धति का अनुकरण किया । ब्राह्मणीय शिक्षा पद्धति के उपनयन संस्कार के समान ही बौद्ध शिक्षा प्रणाली में 'पबज्जा 'संस्कार
होता था तथा ब्राहमणीय शिक्षा पद्धति में संस्कार के पश्चात् विद्यार्थी को ब्रहमचारी की उपाधि दी जाती है ।उसी प्रकार बौद्ध पद्धति में पबज्जा संस्कार के बाद सामनेर की उपाधि दी जाती थी । विद्या आरम्भ  करने की आयु भी दोनों में समान थी । ब्रह्मचर्य से संबंधित भिक्षा पात्र, भिक्षा मांगने की विधि, भोजन करने , सोने, केश कटवाने, वस्त्र,पुष्पमालाओं सुगन्धित तेलों आदि विलासों का त्याग आदि नियमों का पालन बौद्ध भिक्षु
भी करते थे । गुरू शिष्य संबध भी बौद्ध शिक्षा पद्धति ने अपना लिया था ।
      बौद्ध धर्म की मोक्ष की अवधारणा भी ब्राह्मण धर्म के अनुसार है । छान्दोग्य उपनिषद के अनुसार विमुक्त आवागमन के चक्कर से छूट जाता है (17) कठोपनिषद् के अनुसार ब्रह्म प्राप्त मनुष्य अनासक्त और अमर हो जाता है (18) | बौद्ध धर्म में आत्मा, संसार एवं इसी प्रकार की अन्य समस्याओं की व्याख्या में हमें उपनिषदों के पारिभाषिक शब्दों का प्रयोग मिलता है यथा नामरूप, कर्मविपाक, अविद्या, उपादान अर्हत, श्रवण बुद्ध, निर्वाण, प्रवृत्ति, आत्मा, निवृत्ति इत्यादि ।
     किंतु दार्शनिक सिद्धान्तों के दृष्टिकोण से बौद्ध धर्म और ब्राहमण धर्म में विभिन्नता दिखाई पड़ती है । आत्मा, परमात्मा, सृष्टि से संबंधित विचारों में बौद्धों ने अपनी दृष्टि से खण्डन, मण्डन एवं परिवर्तन किया है । उनका अनात्मवाद, प्रतीत्यसमुत्पाद, अनीश्वरवाद, का सिद्धान्त भारतीय दर्शन परंपरा में प्राप्त नहीं होते है |
    अतः स्पष्ट है कि बौद्ध धर्म के व्यवहारिक स्वरूप के सिद्धान्त ब्राह्मण धर्म पर आधारित है । दूसरों शब्दों में यह भी कहा जा सकता है, कि उन्होंने ब्राह्मण धर्म के सूत्रों को लेकर ही अपना ताना बाना बुना है। इसी कारण अनेक विद्वान इसे Protastant Brahmanism प्रोटेस्टेंट ब्राहमनिज्म के नाम से पुकारते हैं।
       उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट होता है कि बौद्ध धर्म सर्वथा नई व्यवस्था या सिद्धान्त का संस्थापक नहीं था । मैक्समूलर ने सैकरेड बुक्स आफ इस्ट (19) में लिखा है 'उपनिषदों के बहुत से सिद्धान्त निःसंदेह विशुद्ध बौद्धधर्म के ही सिद्धान्त है अथवा इसे यो कहना अधिक संगत होगा कि अनेक विषयों में बौद्ध धर्म ने ठीक ठीक रूप में उन्हीं सिद्धान्तों को क्रियात्मक रूप दिया जो उपनिषदों में प्रतिपादित किए गये थे । लेकिन फिर भी यह तो मानना ही पड़ेगा कि बौद्ध धर्म के आने से समाज में एक महान
परितर्वन तो हुआ ही। साथ ही हिन्दू सभ्यता में चतुर्दिक उन्नति भी हुई । इतिहास में ऐसे परिवर्तन यद्यपि संपूर्ण विश्व में हुए हैं पंरतु उसका इतना अधिक विस्तार एवं सकारात्मक प्रभाव प्राप्त नहीं होता है । उदाहरणार्थ- जैन धर्म,जो बौद्ध धर्म से प्राचीन होने पर भी जनसाधारण तक नहीं पहुंच पाया । वैष्णव धर्म मात्र भारत तक ही सीमित रहा । जबकि बौद्ध धर्म विदेशों में भी पाया जाता है । योरोप में ईसाई धर्म के प्रभाव में
आने पर रोमन साम्राज्य में काला युग (डार्क ऐज) प्रारंभ हुआ । वहां सभी दर्शन के केन्द्र एवं स्कूल बंद हो गए। यूरोप के सभी दार्शनिक सुकरात, अरस्तु प्लेटो आदि इसी डार्क ऐज से पहले हुए थे तथा इस्लाम धर्म प्रचारकों को भी ऐसी अद्भुत सफलता नहीं मिली।
       अतः अब प्रश्न उठता है कि बौद्ध धर्म की इतनी उन्नति क्यों ? जबकि न तो उन्होंने जनसाधारण के जोश और मानसिक पक्षघात को भड़काया और न ही मोक्ष प्राप्ति का कोई सस्ता नुस्खा बतलाया ।न ही उन्होंने बौद्ध धर्म अपनाने के लिए किसी प्रकार का लालच लोगों को दिया । इस प्रश्न पर विचार करने पर यह निष्कर्ष निकलता है -
1 बौद्ध धर्म के सिद्धान्त अत्यन्त सरल और सुबोध थे । वैसे तो सभी धर्म आचार एवं नैतिक शिक्षा पर बल देते है लेकिन बौद्धों ने आचार तत्व को ही अपने धर्म की आधार शिला माना । वह विशुद्ध मानववादी धर्म था । जाति मत पूछ आचरण पूछ का उद्घोष आज भी मनुष्य को अपने आचरण के प्रति सचेष्ट रहने की ओर प्रेरित करता है।।
2. उसमें जातिवाद और कर्मकाण्ड के लिए कोई स्थान नहीं था । किसी भी जाति, वर्ण, सम्प्रदाय का व्यक्ति बौद्ध धर्म को अपना सकता था । मोक्ष का द्वार स्त्री, पुरुष, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य शूद्र, बालक, वृद्ध सभी के लिए खुला था । महात्मा बुद्ध ने यह कहकर कि जो कोई जातिवाद में फंसे है, मानववाद में फंसे
है, आवाह - विवाह में फंसे है, वे अनुपम विद्याचरण संपदा से दूर है (20) । के द्वारा साम्प्रदायिकता को समाप्त करने का प्रयास किया जो मनुष्य और मनुष्य के बीच की दीवार है । निष्कर्षतः उन्होने इस कृत्रिम अवरोधों को समाप्त करना चाहा।

      3. महात्मा बुद्ध ने उन्हीं विषयों का उपदेश दिया जो मनुष्य के परम कल्याण के लिए आवश्यक थे । लोक जीव और परमात्मा संबंधी अनेक विवादों को उन्होंने व्यर्थ समझा इसीलिए उनहोंने दश अकथनीय सिद्धान्तों का प्रतिपादन दिया । यही वे तत्व है जिनसे वर्ग, देश, धर्म आदि विभाजित होते है।
इसलिए विचारक होम्स (21) का मत है कि बुद्ध के धर्मप्रचार का उद्देश्य यह था कि उपनिषदों के आदर्शवाद को उसके उत्कृष्ट रूप में स्वीकार करके  उसे मनुष्य जाति की दैनिक आवश्यकताओं के लिए उपयोगी बना दिया जाए ।
डॉ0 राधाकृष्णन बुद्ध को सुधारक कहते है (22) और उनके अनुसार बुद्ध कोई ऐसा क्रान्तिकारी नहीं था जिसने उपनिषद् के सिद्धान्तों की प्रतिक्रिया रूपी लहर चलाकर ख्याति एवं सफलता प्राप्त की बल्कि उसका उद्धेश्य एक सुधारक के
रूप में उपनिषदों के प्रचलित सिद्धान्तों के ढांचे में परिवर्तन करके उसमें प्रतिपादित सत्यों को, जो भुला दिया गये थे फिर से प्राधान्य में लाना था ।
         सचमुच आज भी जब अनेक मतमतान्तरों के कारण व्यक्ति के सम्मुख धर्म के कारण भ्रम की स्थिति बन गई है ऐसे समय में बौद्ध धर्म के मूल उपादानों का मूल्यांकन कर पुनः उन सत्यों को प्राधान्य में लाकर ग्रहण करने से उसकी उपादेयता एवं प्रासंगिकता बढ़ जाती है।
        तृष्णा का त्याग, सत्य, अहिंसा एवं आचरण पर बल सभी धर्मों में विद्यमान है । यदि सभी भेदों को भुलाकर इसी पर बल दिया जाए तो समाज में व्याप्त आपसी मतभेदों की समस्या समाप्त हो जाएगी एवं चरित्र बल से स्वास्थ्य समाज का गठन संभव होगा जिससे ' वसुधैव कुटुम्बकम' का स्वप्न यथार्थ बन
जायेगा।

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सन्दर्भ सूची -
1- यो वै स धर्म: वै तत् - वृहदारण्यम 1.4-14
2-तैत्तरीय उपनिषद एकादश अनुवाक
3-महापरिनब्बानसुत्तम
4-दमस्योपकिवन्मोक्षः - शान्तिपर्व
5-महासति पटठान सुत्त (दीघ 2.9)
6-संयुक्त 21.10
7-ऋग्वेद 10.190.1
8-तपसा चीयते ब्रहम - मुण्डक 1.1.8
9-छान्दोग्य 8.4.3
10. कठ 1.2.15
11 वृहदारण्यक 4.4.
12.अन्य खलु ऋतुमय पुरूषः । यथा ऋतुरस्मिन लोकन पुरुषों भवति तथेत प्रेत्य भवति - छान्दोग्य  3.14 |
13. कुर्वन्नेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः ।
      एवन्त्यपि नान्यथेतोs स्ति न कर्म लिप्यते नरे ।।
       ईशावास्योपनिषद
14. वीमंसक सुत्तन्त (मज्झिमनिकाय1.5.7)
15. छान्दोग्य 7-2
16. मुत्तनिपात 5.1.16
17. न स पुनरावर्तते - छान्दोग्य 8.15.1
18. ब्रहमप्राप्तो विरजोs भूद्विमृत्यू: कठ 23-18
19. खण्ड 15, भूमिका पृष्ठ 37
20. वी01.3
21 द क्रीड़ा आफ बुद्ध, बाय होम्स,
22. भारतीय दर्शन - डॉ0 राधाकृष्णन पेज 435

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प्रो. कमलेशदत्त त्रिपाठी :व्यक्तित्व,कृतित्व और साहित्यिक अवदान

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