प्रोफेसर राधा वल्लभ त्रिपाठी शास्त्र से लोकधर्म तक

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      प्रोफेसर राधा वल्लभ त्रिपाठी --शास्त्र  से लोकधर्म तक


प्रो० राधावल्लभ त्रिपाठी संस्कृत के प्रतिष्ठित समीक्षक, कवि, काव्यशास्त्री एवं साहित्यकार हैं । वे बहुमुखी प्रतिभा के धनी साहित्यकार हैं। सन्धानम्, लहरीदशकम् ,गीत धीवरम् उनके काव्य संग्रह अखिल भारतीय पुरस्कारों से सम्मानित हुए हैं लहरी दशकम् को  1993 में कालिदास पुरस्कार , सन्धानम् को 1994 में साहित्य अकादमी पुरस्कार , गीत धीवरम्  को 1996 में कालिदास पुरस्कार प्राप्त हुआ है । इसके अतिरिक्त त्रिपाठी जी ने अनेक पुस्तकें लिखीं, जिनमें नाट्यशास्त्र विश्वकोश, संस्कृत काव्यशास्त्र और काव्य परम्परा, संस्कृत साहित्य का अभिनव इतिहास, संस्कृत कविता की लोकधर्मी परम्परा मुख्य हैं ।

        प्राचीन भारत में रंगमंच के उद्भव एवं विकास पर आपने डी0 लिट् उपाधि प्राप्त की। त्रिपाठी जी संस्कृत काव्य शास्त्र एवं रंगमंच के प्रमुख समीक्षक हैं । काव्यशास्त्र के किसी भी अंग की समीक्षा करते समय वे व्यवस्थित, प्रामाणिक एवं सुविचारित सामग्री का समावेश करते हैं । एक ओर उन्होंने अच्छे शिष्य की भाँति अनेक ग्रंथों का गहन अध्ययन किया है, वहीं दूसरी ओर अध्यापकीय व्यक्तित्व के कारण उनकी समीक्षाओं में सर्वत्र विषय विश्लेषण की क्षमता एवं गम्भीरता दिखाई देती है।


        संस्कृत काव्यशास्त्रीय परम्परा में आचार्यों के मतों में यत्र-तत्र मतान्तर ,अस्पष्टता एवं विरोध दृष्टिगोचर होता है । उन स्थलों की व्याख्या यदि त्रिपाठी जी ने की है तो निश्चित ही उनकी  लेखनी ने उसे सम्यक् दृष्टि से आलोकित किया है ।उनका चिन्तनर्वतोन्मुखी एवं गम्भीर है एवं विषय प्रस्तुति में स्पष्टता रहती है ।
       संस्कृत काव्यशास्त्र के सिद्धान्तों का क्रमबद्ध विश्लेषण करने में त्रिपाठी जी की पुस्तक ' संस्कृत काव्यशास्त्र और काव्य परम्परा " पूर्णतया सफल हुई है । काव्य रचना के स्तर, काव्य की उत्पत्ति, काव्य प्रस्थान और काव्य निकष, साहित्य की स्वायत्तता आदि अध्यायों में काव्यशास्त्र के बारीक सूत्रों को
सुश्रृंखलित रूप से स्पष्ट करने में प्रो0 राधावल्लभ त्रिपाठी पूर्णरूपेण सफल हुए हैं | त्रिपाठी जी ने काव्यशास्त्र
के कुछ नवीन बिन्दुओं पर पुस्तक में सप्रमाण प्रकाश डाला है जो उल्लेखनीय हैं -
        भारतीय काव्यचिन्तन के मूल आधार' (1) नामक अध्याय में प्रो० त्रिपाठी सप्रमाण स्पष्ट करते हैं कि भारत में नाटक और काव्य को पृथक करके कभी नहीं देखा गया तथा आचार्य भरत के समय तक भी दृश्य तथा श्रव्य के पार्थक्य की धारण भी इतने सुस्पष्ट रूप में नहीं आई थी । अपने मत के पक्ष में वे आचार्य भरत को प्रमाण रूप में रखते हुए कहते हैं कि नाट्यशास्त्र को लिखते समय भरत ने काव्य तथा नाट्य को
पर्याय ही माना क्योंकि नाटक के पाठ्य अंश लिये "काव्य" शब्द का प्रयोग भरत ने अनेक स्थानों पर किया है(2)।
     इसी पुस्तक में संस्कृत काव्यशास्त्र के पुनर्व्यवस्थापन के प्रश्न पर त्रिपाठी जी ध्यान आकर्षित ही नहीं करते बल्कि आधुनिक विद्वानों ने जो काव्य शास्त्र को नाट्य शास्त्र का परिशिष्ट या अनुवर्ती मानते हैं, की भ्रांत  धारणाओं के निराकरण का प्रयास भी करते हैं । (3)
     साथ ही भारतीय काव्य शास्त्र का अध्ययन सामान्यतया छः सम्प्रदायों के अन्तर्गत ही होता रहा है किन्तु त्रिपाठी जी काव्यशास्त्र के इस सम्प्रदायगत विभाजन को भ्रामक एवं असंगत मानते हैं तथा पुस्तक में आचार्यों के दृष्टकोण को स्पष्ट करते हुए , संप्रदायगत विभाजन से भिन्न काव्य शास्त्र के विकास पर उन्होंने प्रकाश डाला है ,जो प्रो० त्रिपाठी की सर्वथा नवीन दृष्टि है।
       इस प्रकार प्रस्तुत पुस्तक में अलंकार शास्त्र के विभिन्न अंगों पर नवीन दृष्टि से त्रिपाठी जी ने विचार किया है।
        त्रिपाठी जी का विषय क्षेत्र नाट्यशास्त्र है । नाट्यशास्त्र पर गूढ अध्ययन एवं अनुसन्धान के परिणामस्वरूप त्रिपाठी जी ने नाट्यशास्त्र की पारिभाषिक शब्दावली के आधार पर 'नाट्यशास्त्र विश्वकोश 'बनाया । प्रस्तुत पुस्तक चार भागों में है । नाट्यशास्त्रीय पारिभाषिक शब्दावली के विशद विवेचन के साथ-साथ प्रस्तुत पुस्तक में वेद, उपनिषद् संगीत, नृत्य आदि के प्राचीन ग्रंथों के साथ-साथ नाट्यशास्त्रीय परम्परा के प्रामाणिक संदर्भ भी यहां प्राप्त होते हैं। साथ ही नाट्यशास्त्र की भारतीय तथा पाश्चात्य परम्परा का ऐतिहासिक परिचय, अन्तः सम्बन्ध एवं तुलनात्मक विश्लेषण भी यहां मिलता है।

     
        सामान्यतया विश्वकोश जैसे ग्रंथ का निर्माण अनेक व्यक्तियों का सामूहिक प्रयास होता है किन्तु इतनी कम उम्र में अकेले ही नाट्यशास्त्र विश्वकोश जैसे ग्रंथ स्वयं ही प्रमाणित करते हैं कि- तेजसां वयः न समीक्ष्यते ।
       काव्य शास्त्र के विश्लेषण में अत्यन्त प्रौढ दृष्टि रखने वाले त्रिपाठी जी की लेखनी केवल शास्त्रीय पक्ष को ही उजागर नहीं करती है । आपका स्पष्ट मत है कि नाट्य और काव्य के समग्र चिन्तन के प्रवर्तक आचार्य भरत ने लोक को कविता और कला के केन्द्र में रखा है ।(4) लोकधर्म तो कला का अपना स्वभाव है,
नाट्यधर्मी विभाव है।
     स्वभावों लोकधर्मी व विभावों नाट्यमेय हि ।
                 नाट्य शास्त्र  11-193
काव्य के मर्म को समझने वाले त्रिपाठी जी ने इसीलिये कला के लोकधर्मी पक्ष पर भी प्रभूत प्रकाश डाला है।
           वे कहते हैं कि लोक की अन्तर्व्याप्ति को स्वीकार किये बिना न तो कविता सही दिशा में आगे बढ़ सकती थी, न कविता का शास्त्र (5)
        और यही कारण है कि त्रिपाठी जी ने शास्त्रीय पक्ष का जहां एक ओर विश्लेषण किया है वहीं दूसरी ओर संस्कृत कविता की लोकधर्मी परम्परा की भी उतनी ही सूक्ष्मता से व्याख्या की है।' संस्कृत कविता की लोकधर्मी परम्परा' नामक पुस्तक में संस्कृत के श्लोकों का हिन्दी अनुवाद उस लोक परम्परा को, लोक अर्थात् जन सामान्य के और समीप ले आता है उदाहरणार्थ-
बादल फट तो गये हैं बरस कर
ठहर कहा पायी है जर्जर घर में होती टपटप पर?
लो, वे बार-बार आ जाती है भीतर
मकड़ियों की जालियाँ छेद छेद कर 
पानी की बूँदें ,शहद जैसी भूरी 
बच्चे के माथे पर गिर ,बिखर जाती है छार छार फिर
देह  पर दे जाती है चोट ,उड़ा देती है गृहिणी की नींद 
तब वह  आसू बहाती होती है,अकेली,निःशब्द -
(काव्यालंकारसूत्रवृत्ति 4/2/10 में उद्धृत) (6)

      प्रस्तुत पुस्तक में आदिम अग्नि, घर और परिवार, बस्ती और अलाव आदि शीर्षक पर विभिन्न कवियों द्वारा
रचित मुक्तक छन्द हैं। इस कविता में किसान, मजदूर, खेत, खलिहान की स्वाभाविकता है ,तो वहीं बाढ़  एवं
शीत की विभीषिका । कही सर्दी से ठिठुरता बच्चा है तो कहीं भूख से व्याकुल बालक । किन्तु दरिद्रों और
किसान मजदूरों के सुख दुख की कथा कहने वाली कविता अपने आप में दरिद्र नहीं है ।न तो रूप के स्तर पर ,और न ही वस्तु के स्तर पर ।
           लोकनाट्य परम्परा पर त्रिपाठी जी के अनेक लेख पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए हैं । नाट्यम् के 54वें अंक में 'डोम्बी' पर उनका लेख उल्लेखनीय है।
      अतः काव्य के शास्त्रीय एवं लोक पक्ष के प्रति गहरी निष्ठा ,साहित्य मंथन एवं विषय के मर्म तक पहुँचने की बौद्धिक शक्ति, कठिन विषयों को भी सरल से सरल रूप में प्रस्तुत कर मर्म उद्घाटन करने  की विशेषता, सारग्राहिणी सूक्ष्म निरीक्षण दृष्टि, विचारों की समृद्धता, उन्हें विज्ञान-समीक्षक एवं महाप्राण शैलीकार सिद्ध करते हैं।


सन्दर्भ सूची
1-संस्कृत काव्य शास्त्र और काव्य -परम्परा -लेखक -राधा वल्लभ त्रिपाठी, प्रतिभा प्रकाशन 1981
2-वही पृष्ठ 6
3-  वही पृष्ठ 19
4-भूमिका पृष्ठ 12- संस्कृत कविता की लोकधी परामरा- राधा वल्लभ त्रिपाठी ,संस्कृत परिषद, विश्वविद्यालय सागर,
5-वही पृष्ठ-17
6- वही पृष्ठ -49


ज्ञानायनी -आचार्य राधा वल्लभ त्रिपाठी विशेषांक 2007 में प्रकाशित लेख 

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