"Sanskrit Gyan Jyotsna: स्त्रियों की स्थिति और पतञ्जलि के प्रत्यभिवादन नियम पर विचार

स्त्रियों की स्थिति और पतञ्जलि के प्रत्यभिवादन नियम पर विचार



           यह सर्वविदित है कि पतंजलि द्वारा वर्णित सामग्री का स्रोत अनेक स्थानों पर पाणिनि ही है । पाणिनी के 8.2,83 सूत्र -'प्रत्यभिवादे शूद्रे' के अनुसार छोटो के द्वारा बड़ो को प्रणाम करने पर बड़ो की ओर से किये प्रत्यभिवादन में शूद्र के लिए प्लुत नहीं किया जाता था । उदाहरणार्थ यदि देवदत्त गुरू को प्रणाम करता प्रत्याभिवादन में गुरू कहता -'भो
आयुष्मानेधि देवदत्ता 3 | इस वाक्य में गुरू देवदत्त के अंतिम स्वर को प्लुत बोलता किंतु यदि शूद्र प्रणाम करता तो उसे आशीर्वाद मिलता-' आयुष्मानेधि तुषजक' । तब तुषजक का अंतिम स्वर प्लुत नहीं किया जाता | पतंजलि ने इसी प्रत्यभिवादन के नियम में स्त्रियों का उल्लेख किया और उनके प्रणाम के उत्तर में भी प्लुत नहीं किया जाने लगा । व्याकरण के प्रयोजन पर विचार करते समय पतंजलि के महाभाष्य में वर्णित है-
अविद्वास: प्रत्यभिवादे नाम्नो ये न प्लुतिम विदुः ।
काम तेषु तु विप्रोष्य स्त्रीष्विवायमहं वदेत् ।
अभिवादे स्त्रीवन्मा भूमेत्यध्येयं व्याकरणम्। (1)
अर्थात् अभिवादन करते समय हम स्त्रियों के समान व्यवह्नत न किये जाए इसलिए व्याकरण पढ़ना चाहिए ।
 
वस्तुतः पतंजलि का यह कथन हमें यह सोचने के लिए बाध्य करता है कि
(क)पतंजलि कालीन समाज में स्त्री एवं स्त्री शिक्षा की क्या स्थिति थी ? क्योंकि
(1)पाणिनी ने तोवकेवल शूद्रो का उल्लेख किया था लेकिन पतंजलि स्त्री का उल्लेख कर रहे हैं तथा(!!) जो प्लुत उच्चारण करना नहीं जानते हैं वे अविद्वान होते हैं । अतः क्या यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि पतंजलि के समय में स्त्रियों को शिक्षा अप्राप्त थी जिस प्रकार प्राचीनकाल में शूद्रों के लिये वेदाध्ययन तथा शिक्षा निषिद्ध थी ? (ख) क्या इसके द्वारा समाज में स्त्रियों की निम्न दशा का ज्ञान होता है ? जैसा कि अग्निहोत्री जी आदि कुछ
विद्वानों का मत है।(ग) पतंजलि ने प्रत्यभिवादन नियम में शूद्रों के स्थान पर स्त्री शब्द का प्रयोग क्यों किया?

(क)प्रथम प्रश्न पर विचार करने पर ज्ञात होता है कि पतंजलि कालीन समाज में स्त्रिया शिक्षित थी । पतंजलि महाभाष्य से यह स्पष्ट है कि चरण वैदिक शिक्षण संस्था थी जिसमें वेद की एक शाखा का अध्ययन शिष्य समुदाय करता था । अतः ये वैदिक विद्यापीठ थे । पतंजलि के महाभाष्य से यह भी स्पष्ट होता है कि स्त्रियां भी चरणों में प्रविष्ट होती थी एवं अध्ययन करती थी । साथ ही साथ चरणों के नाम से स्त्रियों के नामकरण की प्रथा का उल्लेख भी हुआ है-
जातेरस्त्री विषयादयोपधात्' 
सूत्र मे जातिवाचक स्त्री नामो मे गोत्र और चरणवाची नामो का ग्रहण होता है। कशिका में कठी और वह्नची उदाहरण प्राप्त होते है । कठी का तात्पर्य है कृष्ण यजुर्वेद के कठ चरण में विद्या अध्ययन करने वाली स्त्रियां। इस प्रकार वह्नची नामक ऋग्वेद के चरण में अध्ययन करने वाली ब्रहमचारिणी कन्याएँ वह्रची कहलाती थी । चरणों में अध्ययनरत छात्राओं को छात्र के समान ही सम्मानित एवं उपाधि से विभूषित किया जाता है । उदाहरणार्थ कठ चरण में प्रविष्ट स्त्री कठी उनमें जो विशेष सम्मानित होती वह पूज्यमान कठी और जो अग्रपाद भी अधिकारिणी होती वह कठवृन्दारिका कहलाती थी । भाषा में कठमानिकी विशेषण के प्रयोग से स्पष्ट है कि कठ चरण की सदस्या होने के कारण वह गौरवान्वित अनुभव करती थी । गार्ग्य और कठ चरणे की प्रतिष्ठा विद्वत्वर्ग में बहुत अधिक थी ।कुमारियां बाल्यकाल से ही दीक्षा लेकर श्रमणा और प्रव्रजिता का जीवन बिताती थी।(2)। कुछ कुमारी रहकर अध्यापिका का काम करती थी । पतंजलि ने आचार्या और उपाध्यायी का उल्लेख किया है । उपाध्यायी या उपाध्याय वे स्त्री अध्यापिकाएं थी जिनके पास पढ़ने के लिए बाहर से छात्र आते थे (3)। लोकायत सम्प्रदाय की व्याख्यात्री वर्णिका
या वर्तिका नामक आचार्या का भी भाष्य में उल्लेख मिलता है(4)। उदमेथ गोत्र की अध्यापिका औदमेध्या का उल्लेख भी प्राप्त है जिसके शिष्य औदमेध कहलाते थे । अतः
कुमारी श्रमणाएं, (5)प्राजिताएं और तापसियां तथा कुमारी अध्यापिकाएं और पण्डिताएं समाज में विद्यमान थीं, इसमें संदेह नहीं ।
निष्कर्षतः पतंजलि काल में स्त्रियां शिक्षित होती थी ।
(ख), पतंजलि के प्रत्यभिवादन सूत्र से डॉ0 प्रभुदयाल अग्निहोत्री (6) आदि विद्वानों ने यह निष्कर्ष निकाला है कि इस सूत्र के द्वारा स्त्रियों की निम्न दशा का ज्ञान होता है |
किंतु महाभाष्य से यह स्पष्ट है कि स्त्रियों को धन, यज्ञ, परिवार एवं समाज में अधिकार प्राप्त थे । विवाह के पश्चात् स्त्री, पति के पद एवं प्रतिष्ठा की अधिकारिणी होती थी (7)। जैसे कि महामात्र की स्त्री महामात्री, आचार्य की पत्नी आचार्याणी, मातुल की स्त्री मातुली । वर चुनने का भी अधिकार कन्या को प्राप्त था (8)। स्त्रियां पति के साथ यज्ञ
करने के कारण की पत्नी कहलाती थी- पत्नीव पत्नी (महा0 4.1.33) अर्थात पति के साथ यज्ञकर्म करके उसकी सहधर्मणी होती थी इसलिए पतंजलि का कथन है -पत्य उर        संयोगे यज्ञसंयोग इत्यूच्यते तत्रेदं न सिद्धयति इयमस्य पत्नी । अयं तार्हे स्यात् ? पत्नीहै । उपाध्यायी या उपाध्याय वे स् इति यत्र यज्ञसंयोगः - एवमपि तुषजकस्य पत्नीति न सिद्धयति । उपमानात् सिद्धम् ।
पलीव पत्नी/4/1/33
तुषजक अर्थात शूद्रों को यज्ञ में अधिकार नहीं था । अतः स्पष्ट है कि स्त्रियों को शिक्षा के साथ ही साथ समाज में अन्य अधिकार भी प्राप्त थे । इसलिये यह कथन
युक्तियुक्त नहीं है कि प्रत्यभिवादन सूत्र से स्त्रियों की निम्न दशा का ज्ञान होता है ।
(ग) अब प्रश्न यह उठता है कि पतंजलि ने व्याकरण के महत्व को प्रतिपादित करते समय प्रत्याभिवादन नियम में शूद्रो के स्थान पर स्त्री का प्रयोग क्यो किया ? मेरे मतानुसार
पतंजलि के द्वारा किया गया यह परिवर्तन अत्यंत सोच समझ कर किया गया परिवर्तन है जो व्याकरण के महत्व एवं उनकी दूरदृष्टि को द्योतित करता है । पतंजलि के समय
ब्राहमणों का बोलबाला था तथा शूद्रों के लिए अध्ययन निषिद्ध था । महाभाष्य में वे कहते है अविद्वान अर्थात व्याकरण ज्ञान से रहित व्यक्ति को ह्रस्व दीर्घ प्लुत का भी ज्ञान नहीं होगा जिससे वह अभिवादन का ठीक उत्तर नहीं दे पायेगा और उसकी स्थिति स्त्रियों के समान होगी । यहाँ स्त्री शब्द के द्वारा पतंजलि कहना चाहते थे कि सामान्य स्त्री के व्याकरण ज्ञान से रहित होने के कारण स्त्री और शूद्रों को प्लुत नियम का ज्ञान नहीं होगा इसलिए प्लुत उच्चारण रहित प्रत्यभिवादन का नियम था लेकिन पतंजलि इसके साथ साथ ही यह भी कहना चाहते है कि अगर कोई दूसरा व्यक्ति( जो पुरुष भी हो सकता ह)प्लुत उच्चारण करना नहीं जानता है तो उसके प्रति भी वैसा ही संबोधन करे अर्थात प्लुत उच्चारण के बिना ही प्रत्याभिवादन करें ।अतः स्पष्ट है कि पतंजलि के अनुसार प्रत्यभिवादन करते समय यह देखा जायें कि प्रत्यभिवादन करने वाले व्यक्ति को व्याकरण ज्ञान है अथवा नहीं तथा उसी के अनुसार प्रत्यभिवादन किया जायें । यहाँ स्त्री शब्द तो केवल उपलक्षण मात्र है व्याकरण न जानने वालों के प्रति ,न कि इसके द्वारा स्त्रियों की स्थिति का बोध होता है ।पंतजलि कहते है जो प्लुत उच्चारण नहीं जानते हैं वे अविद्वान होते हैं अर्थात् जो व्याकरण नियम नहीं जानते हैं वे अविद्वान हुए । अविद्वान का स्वरूप महाभाष्य ये इस प्रकार वर्णित है
उत त्वः अपि खल्वेकः पश्यन्नपि न पश्यति वाचय् । अपि खल्वेकः श्रृण्वन्नपि न
श्रृणोत्येनामिति अविद्वासम् (9)
भाष्यकार के अनुसार शिक्षा के दो फल थे- बौद्धिक विकास और नैतिक उन्नति ।प्रथम आहिनक में उनके द्वारा गिनाये गये व्याकरण पढ़ने के सारे उपयोगों का भी समावेश
इनमें हो जाता है । नैतिक विकास पर इतना जोर देने के कारण ही उन्होंने इस बात को बार-बार दुहराया है कि विद्या कर्म और योनि तीनों की दृष्टि से अवदात व्यक्ति ही ब्राहमण
है । (10)पतंजलि आरत्वि जीन  थे और वैदिक संस्कृति के अनन्य उपासक । वे जानते थे कि व्याकरण के द्वारा ही संस्कृत की उन्नति को सकती है । उनके समय में प्रादेशिक प्राकृतों का विकास व विस्तार जन-जन में था । प्राकृत बहुजन समाज की भाषा बन चुकी थी ।  संस्कृत के प्रति जन सामान्य में उदासीनता व्याप्त हो गई थी तथा वह शिष्ट वर्ग तक ही ।सीमित रह गई थी । पुष्यमित्र शुंग ने यज्ञों के द्वारा वैदिक संस्कृति का पुनरूत्थान किया ।चूंकि विद्यार्थी व्याकरण ज्ञान के बिना ही वेदाध्ययन करने लगे । यह कष्ट महाभाष्यकार को था  । इस पीड़ा को महाभाष्य में व्यक्त करते हुए पतंजलि कहते हैं-
पुराकल्प एतदासीत्
संस्कारोत्तरकालं ब्राहमणा व्याकरणं स्माधीयते ।
तेभ्यस्तत्रस्थानकरणनादानुप्रदानेज्ञेम्यो वैदिकाः शब्दा उपदिश्यन्ते, तदद्यत्वे न तथा
वेदमधीत्य त्वरिता वक्तारो भवन्ति वेदान्नो वैदिकाः शब्दाः सिद्धा लोकाच्च लौकिकाः,
अनर्थकम् व्याकरणम् इति । (11)
2.वेदों की रक्षा व्याकरण ज्ञान के बिना असंभव है यह बात पतंजलि जानते थे ।अतः उन्होनें संस्कृत की उन्नति तथा वेदों की रक्षा के लिए व्याकरण अध्ययन पर बल दिया । पतंजलि के अनुसार अपशब्दों का उच्चारण करन से म्लेच्छ बनते है (12)। तथा व्याकरण के ज्ञान से रहित होने पर स्त्री (13)। व्याकरण ज्ञान न होने पर ब्राह्रमण अविद्वान् कहलाता है जबकि ब्राह्रमणों को आर्खिजीन होना चाहिये । आर्बिजीन वह है जो प्रत्येक पद, स्वर और अक्षर का संस्कार के साथ उच्चारण करता है जो व्याकरण के बिना नहीं हो सकता (14)।
अतः पतंजलि के प्रयासों का ही यह प्रतिफल था कि बाद में व्याकरण ज्ञान का अत्याधिक प्रचार तथा प्रसार हुआ कि भोज के समय में स्त्री कहती है कि 'तव  बाधति मे
बाधते' अर्थात् कालांतर में स्त्रियों में व्याकरण ज्ञान पतंजलि के प्रयासों का ही परिणाम था।


सन्दर्भ सूची:
1- व्याकरण महाभाष्य प्रथम आहिनक पृ0 10 चारुदेव शास्त्री, मोतीलाल बनारसी दास
2-1-70 महाभाष्य
3-उपेत्याधीयते तस्पा उपाध्यायी उपाध्याया । 3-3-21 वा पृ0 302
4-वर्णिका-भागुरी लोकायतस्य वर्तिका । 7-345 वा0 7,8 पृ 190
5- कुमारः श्रमणादिर्भि 2.1.70
6- पतंजलि कालीन भारत -डॉ0 प्रभुदयाल अग्निहोत्री
7- पुंयोगादारण्यायाम 4.1.48
8. पतिंवरा कन्या 3.3.46 महाभाष्य
9- व्याकरण महाभाष्य पृ0 13
10-त्रीणि यस्यावदातानि विद्या योनिश्च कर्म च ।
एतच्छिवे विजानीहिं ब्राह्रणाग्रयस्यलक्षणम् ।। 4-1-48- वा0 1पृ0 62
11-व्याकरण महाभाष्य प्रथम आहिनक पृ0 16
12- तस्माद् ब्रह्रमणेन न म्लेच्छतवै नापभाषितवै । प्रथम अहिनक पृ0 7
13-प्रथम अहिनक पृ0 10
14-यो वा इमां पदशः स्वरशो Sक्षरराश्च वाचं विदधाति स आविजीनो भवति ।

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