"Sanskrit Gyan Jyotsna: भक्ति रस और साधारणीकरण

भक्ति रस और साधारणीकरण

         भारतीय जीवन में भक्ति की अत्यन्त प्रमुख भूमिका रही है। यही कारण है कि प्राचीनकाल से ही भक्ति साहित्य की परम्परा हमें अनवरत रूप से प्राप्त होती है जिसका चरमोत्कर्ष हमें 15वीं से 17वीं शती (जो भक्ति आन्दोलन के नाम से प्रसिद्ध है) के साहित्य में प्राप्त होता है।

         संस्कृत अलंकार शास्त्रियों ने भक्ति को न तो नौ स्थाई भावों के अन्तर्गत माना और न ही नवरसों में। उन्होंने भगवद भक्ति से अनुभूत होने वाले रस को भाव की संज्ञा प्रदान की।
पण्डितराज जगन्नाथ ने भक्ति को रस मानने की ओर विचार अवश्य किया किन्तु अन्ततः उन्होंने भी पारम्परिक अलंकार शास्त्रियों का ही अनुसरण किया। भक्ति आन्दोलन से प्रभावित हो, भक्ति को मौलिक चित्तवृत्ति मानने वाले आचार्यों को स्थाई भाव एवं रस के रूप में भक्ति की गणना का होना अनुचित प्रतीत हुआ। अत: प्रमुख रूप से रूपगोस्वामी (1)एवं मधुसूदन सरस्वती(2) ने भक्ति की स्थाई भाव एवं सर्वोत्तम रस के रूप में प्रतिष्ठित करने का प्रयास किया। इस प्रकार संस्कृत अलंकार शास्त्र में भक्ति को लेकर दो दृष्टियाँ उपस्थित हुई—एक केवल भाव के रूप में और दूसरा रस के रूप में। भक्ति को रस मानने
वाले आचार्यों ने भरत के रस सूत्र के परिप्रेक्ष्य में ही भक्ति को रस कोटि में स्थापित किया है उन्होंने विभाव, अनुभाव, व्यभिचारीभाव एवं सात्विक भावों की व्याख्या भरत के अनुरूप ही की है(3)। साथ ही साथ इन आचार्यों का कथन है कि काव्य तथा नाट्य में विभावादि साधारणीकृत भी होते हैं : यहाँ यह विचारणीय है कि भक्ति रस की स्थिति में साधारणीकरण का स्वरूप क्या होगा?

     काव्य में वर्णित दुष्यान्तादि पात्रों को साथ किस प्रकार तादात्म्य स्थापित कर सहदय उनके भावों का आस्वाद करते है ,यह काव्य शास्त्र का अत्यंत मौलिक प्रश्न है । इस तादात्म्य में कठिनाई यह है कि काव्य में वर्णित पात्रों और सहृदय के मध्य देश, काल, जाति, लिंग आदि का व्यवधान रहता है । इसका समाधान अलंकार शास्त्रियों ने साधारणीकरण के द्वारा किया 
है । अलंकार शास्त्रियों के समान ही वैष्णव आचार्यों ने भी इसी साधारणीकरण के द्वारा भक्ति रस की निष्पत्ति की चेष्टा की है। (4)

      यहाँ यह प्रश्न उठता है कि क्या प्राचीन अलंकार शास्त्रियों द्वारा सम्मत साधारणीकरण के अर्थ से भक्ति रस की निष्पत्ति हो सकती है अथवा नहीं ?

    साधारणीकरण का सर्वप्रथम उल्लेख भट्टनायक ने किया 
है । भट्टनायक  के मत को काव्य प्रकाश में उद्धृत  करते हुये मम्मट कहते हैं-
      न     ताटस्थ्येन  नात्मगतत्वेन  रसः  प्रतीयते  नोत्पद्यते 
 नाभिव्यज्यते, अपितु    काव्ये    नाट्ये  चाभिधातो द्वितीयेन
 विभावादिसाधारणीकरणात्मना     भावकत्वव्यापारेण
भाव्यमानः स्थायी सत्वोद्रेकप्रकाशानन्दमयसंविद्विश्रान्तिसतत्वेन भोगेन भुज्यते, इति भट्टनायकः ।

काव्य प्रकाश के टीकाकार गोविंद ठक्कुर ने भट्टनायक द्वारा प्रयुक्त साधारणीकरण को स्पष्ट  करते हुये कहा-
 साधारणीकरणं चैतदेव यत्सीतादिविशेषणां कामिनीत्वादिसामान्येनोपस्थितिः । स्थाय्यनुभावादीनां   च
संबंधिविशेषानवाच्छिन्नत्वेन ।
( काव्य प्रकाश टीकाकार गोविंद ठक्कुर, निर्णय सागर प्रेस पृ0 66)
अर्थात् साधारणीकरण से अभिप्राय है सीतादि विशेष पात्रों का कामिनी आदि सामान्य रूपों में उपस्थित होना है । स्थायी भाव और अनुभाव के साधारणीकरण का आशय है विशिष्ट संबंधों से मुक्ति ।
भट्टलोल्लट के साधारणीकरण के इसी सिद्धान्त का विकास अभिनवगुप्त में पाया जाता है | उनका मत है-
ममैवैते शत्रोरेवैते ,तटस्थत्यैवैते, न ममैवेते , न शत्रोरेवैते, न तटस्थस्यैवैते, इति संबंधविशेषस्वीकारपरिहारनियमानध्यवसायात् साधारण्येन प्रतीतैः विभावैः -----अभिव्यक्त :।

नागेश्वरी टीका में साधारण्येन की " साधारण्येन सीतात्वादिविशेषांशरहितेन कामिनीत्वादिना "-
-इस रूप में व्याख्या की गयी है।

       साधारणतया सभी व्याख्याकारों ने उपर्युक्त अर्थ के तुल्य ही साधारण्येन का अर्थ सामान्येन किया है । कहने का तात्पर्य यह है कि उनके मत में दुष्यन्त को दुष्यन्तत्व और शकुन्तला के शकुन्तलात्व का परिहार हो जाता है । जिसके फलस्वरूप "सामान्यरूपेण" यह कामिनी है - इस प्रकार कामिनीत्वादि रूप में शकुन्तला की प्रतीति हो जाया करती है । उल्लेखनीय है कि इसी साधारणीकरण की सिद्धि के लिये भट्टनायक ने अभिधा के अतिरिक्त भावकत्व व्यापार की कल्पना की थी।
       परन्तु साधारणीकरण का उपर्युक्त अर्थ विशेषकर वैष्णवों के भक्तिरस के संबंध में चरितार्थ नहीं हो पाता है क्योंकि रूपगोस्वामी और मधुसूदन सरस्वती जैसे वैष्णव आचार्यों ने भक्ति रस के आस्वादन में चित्त की गोविन्दाकारता को अपरिहार्य माना गया है । अतः उनके अनुसार रसास्वादन मे भी कृष्ण के कृष्णत्व का परिहार संभव नहीं है । अगर परिहार मान लिया जाय तो गोविन्दाकारता नहीं होगी और तब भक्ति का रसत्व खण्डित हो जायेगा । कहने का तात्पर्य यह है कि कृष्ण विषयक गोपी निष्ठ रति का आस्वाद करते समय यदि कृष्ण का कृष्णत्व और गोपी का गोपीत्व सर्वथा दूर हो जायेगा ; तब कृष्ण सामान्य पुरूष रूप हो जायेंगे । ऐसी स्थिति में गोविन्दाकारता के बजाय पुरुषमात्राकारता एवं स्त्रीमात्राकारता ही होगी । फलस्वरूप कृष्ण के प्रति स्त्री मात्र की रति होने के कारण लौकिक श्रृंगार से भिन्न, भक्ति रस की भूमिका नहीं बन पायेगी।

      प्राचीन अलंकार शास्त्रियों ने भक्ति  को रस नहीं अपितु भाव माना है । वहाँ साधारणीकरण का सामान्येन अर्थ करने से बाधा नहीं उत्पन्न होती क्योंकि वहां यदि भगवान सामान्य रूप में भी हो जाये तो भी रस निष्पत्ति हो जाया करती है।

   विश्वनाथ और (पंडितराज) जगन्नाथ ने साधारणीकरण का अर्थ किया है - तन्मयीभवन्।
   उनके अनुसार प्रमाता का आश्रय के साथ तादात्म्य हो जाता है । उन्होंने लौकिक परिस्थिति के साथ-साथ देवादि से भी तादात्म्य माना है (5)| भक्ति के परिप्रेक्ष्य में यह स्थिति कदापि संभव नहीं है। क्योंकि भक्ति में द्वैत  का भाव प्रमुख होता है। दूसरी ओर यदि प्रमाता स्वयं में कृष्ण का अभिमान
करने लगेगा तो भक्ति रस की संभावना नहीं होगी । भक्ति रस के परिप्रेक्ष्य में तन्मयीभवन्  भी साधारणीकरण का अर्थ नहीं हो सकता ।

     उपर्युक्त विवेचन से यह स्पष्ट है कि सामान्य और तन्मयीभवन् को साधारणीकरण का अर्थ का मान लेने से भक्ति रस के क्षेत्र में अव्याति हो जाती है, अतः साधारणीकरण का उपर्युक्त अर्थ उचित नहीं है।

    साधारणीकरण को विद्वानों ने अस्वीयत्वाग्रह के रूप में भी परिभाषित किया है। अस्वीयत्व का अर्थात् अपने न होने आग्रह अर्थात् भानाभाव ही साधारणीकरण है उदाहरण के रूप में कह सकते हैं कि दुष्यन्त हो या कृष्ण, शकुन्तला हो या राधा, रसास्वाद के समय ये सामाजिकों के अपने
नहीं हैं ऐसे ज्ञान का अभाव हो जाता है । इसका यह अर्थ कदापि नही हैं कि वे अपने हैं। इसी को स्वपर संबंध से अनालिंगित कहा गया है ।मधुसूदन (6)एवं रूपगोस्वामी (7)का भी यही मत है ।ऐसी स्थिति होने पर यह भाव सामान्य नहीं होते जैसा कि विद्वानों ने माना है । अपितु सार्वजनिक हो जाते हैं तथा इस रूप  में ही समस्त पाठक अथवा दर्शक को रस की प्रतीति कराते है ।कहने का तात्पर्य यह है कि रस की स्थिति में कृष्ण का राधा के प्रति प्रेम आदि रससबंध- विशेष का परिहार हो जाता है किन्तु कृष्ण के सार्वजनिक लोकोद्धारक    रूप का परिहार नहीं होता है और वह उसी रूप में भक्ति रस की अनुभूति कराते हैं ।   साधारण का अर्थ सार्वजनिक भी होता है ऐसा प्रसिद्ध ही है।(8)
 ऐसा अर्थ लेने से रसों में रसनिष्पत्ति में बाधा भी नहीं उत्पन्न होती है।
अतः साधारण्येन से अस्वीयत्वाग्रहजनित- सार्वजनिकत्वेन ऐसा अर्थ लेना संगत है।

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सन्दर्भ सूची

1. रूपगोस्वामी कृत भक्तिरसामृत सिन्धु एवं उज्ज्वलनीलमणि।
2- मधुसूदन  सरस्वती कृत भगवद्भक्ति रसायन।
3- विस्तार के लिए देखिये भक्ति रसामृत सिन्धु दक्षिण विभाग एवं भगवद्भक्तिरसायन  तृतीय उल्लास
4. ज्ञातृस्वपरसम्बन्धादन्ये साधारणात्मना।
अलौकिकम् बोधयन्ति भावम् भावास्त्रयोऽप्यमी
भगवद्भक्ति रसायन 3/11
यत्र साधारणतया भावाः साधुस्फुरंत्यमी 
एषां स्वपरसम्बन्धनियमनिर्णयोः हि यः।
साधारण्येन तदेवो भावानां पूर्वसूरिभिः।
भक्ति रसामृतसिन्धु ,दक्षिण विभाग ,पंचम लहरी 83

5-व्यापारोsस्ति विभावादेर्नाम्ना साधारणीकृतिः ।3.9 11
तत्प्रभावेण  यस्यासंपाथोधिप्लवनादयः ।
प्रमाता तदभेदेन स्वात्मानं प्रतिपद्यते  ।। 3.10 II
उत्साहादिसमुद्बोधः साधारण्याभिमानत: ।
नृणामपि समुद्रादिलंघनादौ  न दुष्यति ।। 3.11 11
विश्वनाथ कृत साहित्यदर्पण
विस्तार के लिये देखिये डॉ० नगेन्द्र - रस सिद्धान्त
6-भगवद्भक्ति रसायन 
7-रूपगोस्वामी कृत भक्तिरसामृत सिन्धु
.8-संस्कृत हिंदी कोश - आप्टे

विशेष --JournalOf The Ganganath Jha Kendriya Sanskrit Vidyapeeth Allahabad,vol  62(1-4)  Jan -Dec 2006 ,में प्रकाशित

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