कालिदास का कर्म सिद्धान्त: भारतीय दर्शन में कर्म का दार्शनिक विवेचन
भारतीय मनीषी प्रारंभ से ही कर्मवाद के पोषक रहे हैं ।अथर्ववेद (1)में कहा गया है-कर्मशील व्यक्ति ही जीवन का मधु पाता है। वही सुस्वादुफल काआस्वादन करता है। सूर्य की ओर देखो,वह निरंतर कर्मरत रहता है।अतः कर्मशील बनो।
ऐतरेय ब्राहमण अपने"चरैवेति" गीत में उद्घोष करता है- जो बैठा रहता है, उसका सौभाग्य बैठा रहता है पर जब कोई खडा होता है, तो उसका सौभाग्य भी खडा होता है ।पडे रहने वालों का सौभाग्य भी पडा रहता है तथा चलने वाले (कर्मरत) का सौभाग्य भी चलने लगता है।अतः कर्मशील बनो ।
कर्म में विश्वास रखने वाले एक प्राचीन मनीषी को अपने कर्म पर इतना भरोसा है कि वह कहता है – कॄतं में दक्षिणे हस्ते जयो में स्वख्य आहितः( 2)।
आलोचकों ने कालिदास को प्रेम एवं सौन्दर्य का सर्वोच्च कवि माना है ।किन्तु कर्म का उदात्त स्वरूप भी कालिदास की लेखनी से अछूता नहीं रहा। उनके ग्रन्थों का अनुशीलन करने पर स्थान-स्थान पर उनके कर्म सम्बंधी सिद्धान्त प्रकट होते हैं। कालिदास के ग्रन्थों में उनके कर्म संबंधी विचारों को एकत्रित कर संकलित करने से कालिदास के कर्म संबंधी पांच दृष्टिकोण स्पष्ट होते हैं-
1.संचित प्रारब्ध और क्रियमाण कर्मों का उल्लेख
2. वेदान्तियों के नित्य नैमित्तिक,निषिद्ध कर्मों का उल्लेख
3. पुरूषार्थ एवं धर्म का कर्म के साथ समन्वय
4.धर्म सहित कर्म का निष्पादन करने पर वरदान तथा न करने पर दण्ड की व्यवस्था
5. गीता के निष्काम कर्मयोग के समान निष्काम कर्म पर बल
ये सिद्धांत कालिदास के काव्यों के उल्लेखों से स्पष्ट हैं.जो इस प्रकार हैं -
1.संचित प्रारब्ध और क्रियमाण कर्मों का उल्लेख- प्राचीन अवधारणा में कर्म के तीन रूप है - संचित,प्रारब्ध तथा क्रियमाण।अतीत में जो कर्म किये जाते हैं वे समाप्त नहीं होते हैं बल्कि उनका फल या प्रभाव जमा हो जाता है। ये कर्म ही संचित कहे जाते हैं । संचित कर्म ऐसे कर्म हैं, जिनका फल मिलना अभी आरंभ नहीं हुआ है । अतीत कालीन वे कर्म जिनका फल मिलना प्रारंभ हो चुका है,प्रारब्ध कर्म कहलाते हैं । क्रियमाण कर्म वे हैं जो वर्तमान समय में किये जा रहे हैं । कालान्तर में ये कर्म संचित तथा प्रारब्ध का रूप ले लेंगे ।
रघुवंश में राजा अतिथि ने अभिषेक के बाद ब्राह्मणों को प्रभूत धन दिया।फलस्वरुप प्रसन्न होकर ब्राह्मणों ने राजा को आशीर्वाद दिया कालिदास कहते हैं -
सा तस्य कर्मनिर्वॄत्तैर्दूरं पश्चात्कॄता फलैः।। रघु0 17-18
(अर्थ -उसे सफल होने के लिये बहुत दिन प्रतीक्षा करनी पडी , क़्योंकि आशीर्वाद के समय तो राजा अतिथि अपने पूर्वजन्म के सत्कर्मों का ही फल भोग रहे थे,आशीर्वाद का फल तो उस फल की समाप्ति पर प्रारम्भ होता।)
व्यक्ति के पुनर्जन्म का आधार भी कर्म ही होता है ।(3) कालिदास कहते हैं कि-
फलानुमेयाः प्रारम्भाः संस्काराः प्राक़्तना इव ।। रघु0 1/20
(अर्थ --इस जन्म में किसी को सुखी या दुखी देखकर लोग यह समझ लेते हैं कि उसने पिछले जन्म में अच्छे या बुरे कर्म किये थे। )
परित्यक़्त होने पर सीता भी इसे पूर्वजन्म के पापों का फल मानती हुई कहती है-
कल्याणबुद्धेरथवा तवायं न कामचारो मयि शंकनीयः।
ममैव जन्मान्तरपातकानां विपाकविस्फूर्जथुरप्रसह्य ।। रघु 14/62
(अर्थ -परन्तु नहीं ,आप तो सबकी भलाई करते हैं ।आप अपने मन से हमारे साथ ऐसा व्यवहार नहीं कर सकते ।यह सब मेरे पूर्वजन्म के पापों का ही असह्य फल है।)
मरने पर कर्मों के अनुसार प्राणी भिन्न-2 मार्ग से जाते हैं-
परलोकजुषां स्वकर्मभिर्गतयो भिन्नपथा हि देहिनाम् ।। रघु 8/85
(अर्थ - क्योंकि मरने के बाद सब प्राणी अपने अपने कर्म के अनुसार अलग-अलग मार्ग से जाते हैं ।)
अतः पूर्व जन्म के शुभ और अशुभ कर्म व्यक्ति को भोगना पड़ता हैं. अतः सत्कर्म करते रहो, यही कालिदास का संदेश हैं.
2. वेदान्तियों के नित्य नैमित्तिक , निषिद्ध कर्मों का उल्लेख- वेदान्त मत के अनुसार व्यक्ति को नित्य,नैमित्तिक एवं उपासना कर्मों को करना चाहिए एवं काम्य तथा निषिद्ध कर्मों का सर्वथा परित्याग करना चाहिए ।
कालिदास के ग्रन्थों में सन्ध्या वन्दन आदि नित्य कर्मों का तथा जातकर्म,श्राद्ध आदि नैमित्तिक कर्मों का अनेक स्थानों पर उल्लेख है।
नित्य कर्म -कुमारसंभव में परमपिता शिव को भी सन्ध्यावंदन आदि नित्यकर्म करते हुए वार्णित किया गया है -
मुञ्च कोपमनिमित्तकोपने!सन्ध्यया प्रणमितोsस्मि नान्यया।
कुमार संभव 8/51
(अर्थ -बिना कारण के क्रोध ,करने वाली हे भामिनी क्रोध ना करो, मैं संध्या करने ही तो गया था।)
इसी प्रकार रघुवंश में भी कवि द्वारा वार्णित है कि अज ने प्रातःकाल की समस्त शास्त्र विहित क्रियाएं सम्पन्न की-
अथ विधिमवसाय्य शास्त्रदृष्टं दिवसमुखोचितमाञ्चिताक्षिपक्ष्मा।
रघुवंश 5/76
(अर्थ -सुंदर पलकों वाले राजकुमार अज ने उठ कर प्रातः काल की सब शास्त्र विहित क्रियाएं संपन्न की।)
सायंकालीन नित्यकर्मों में संलग्न राजा दिलीप को कवि ने इस प्रकार वर्णित किया है-
गुरोः सदारस्य निपीड्य पादौ समाप्य सान्ध्यं च विाधिं दिलीप:।
रघु 2/23
(अर्थ -अपने हाथों शत्रुओं के संधारण राजा दिलीप ने गाय की पूजा हो जाने पर ,पहले वशिष्ठ और अरुंधती जीके चरणों की वंदना की और फिर अपने सायं कालीन नित्य कर्मों को समाप्त किया ।)
नैमित्तिक कर्म- कालिदास ने सभी संस्कारों का वर्णन अपने काव्य में किया है। गर्भावस्था से लेकर श्राद्ध कर्मों का वर्णन यह स्पष्ट करता है कि कालिदास इन संस्कारों को जीवन में अत्यन्त महत्वपूर्ण मानते थे ।बालकों के संस्कारों की चर्चा उन्हें अतिप्रिय है क़्योंकि उनकी दृष्टि में यदि बाल्यकाल सुसंस्कॄत हो गया तो मानो संपूर्ण जीवन सुसंस्कॄत हो गया हो । गर्भावस्था एवं जन्म पूर्व संस्कार (4),जातकर्म (5), चूडा कर्म (6), उपनयन (7), विवाह (8) ,अन्त्येाष्टि (9) आदि संस्कार तथा नैमित्तिक कर्मों का उल्लेख कालिदास ने यत्र तत्र किया है ।
निषिद्ध कर्म- कालिदास निषिद्ध कर्म का उल्लेख करते हुए कहते है-
नॄपतेः प्रतिषिद्धमेव तत्कॄतवान् पन्क्तिरयो विलङ्ध्य यत्।
अपथे पदमर्पयन्ति हि श्रुतवन्तोs पि रजोनिमीलिताः ।। रघु 9/74
(अर्थ -हाथी को मारना शास्त्र विरुद्ध है ।इसलिए दशरथ ने जो किया ,वह उनके लिए अनुचित था ।परंतु कभी-कभी विद्वान लोग भी आवेश में आकर अंधे हो जाते हैं और उल्टा काम कर डालते हैं।)
3 पुरूषार्थ एवं धर्म का कर्म के साथ समन्वय - पुरूषार्थ का अर्थ है-इन्हें प्राप्त करने के लिये तत्पर रहना अर्थात् कर्मशीलता के द्वारा ही धर्म,अर्थ ,काम और मोक्ष इन चार पुरूषार्थों का परिपालन होता है ।मोक्ष तो मॄत्यु उपरान्त की अवस्था है । अतः धर्म, अर्थ और काम ये तीन प्रकार के कर्म अथवा पुरूषार्थ मनुष्य इस जीवन में करता है ।
राजा (10), पत्नी (11),पुत्र (12),क्षत्रिय (13) सबके अलग-अलग धर्म एवं कर्म हैं जिनका स्पष्ट कथन कालिदास ने स्थान-स्थान पर किया है । शरीर ही धर्म का मुख्य साधन है-
शरीरमाद्यम् खलु धर्मसाधनम् ।
अतः निरोग रहकर धर्म करना चाहिए ।
जुगोपात्मानमत्रस्तो भेजे धर्ममनातुरः ।
अगॄध्नुराददे सोsर्थमसक़्तः सुखमन्वभूत् ।।
रघुवंश 1/21
कालिदास के अनुसार अर्थ का तात्पर्य है लोभ रहित होकर धनोपार्जन करना एवं दान के लिये धन का संग्रह करना-
त्यागाय संभॄतार्थानां (रघु 1/7)
(अर्थ-जो त्याग करने के लिए धन जुटाते थे।)
तथा पुत्र प्राप्ति के लिये ही विवाह करना काम है –
प्रजायै गॄहमेधिनाम् (रघु 1/7)
(अर्थ -अपितु संतान उत्पन्न करने के लिए विवाह करते थे.)
कालिदास इन तीनों पुरूषार्थों में से धर्म को ही श्रेष्ठ मानते हुए कहते है-
अनेन धर्मः सविशेषमद्य में त्रिवर्गसारः प्रतिभाति भामिनी !।
त्वया मनोनिार्विषयार्थकामया पदेक एव प्रतिगॄहय सेव्यते ।।
कुमार 5/38
(अर्थ-हे देवी आपके इस आचरण को देख कर ही मैं समझ रहा हूं कि धर्म अर्थ और काम इन तीनों में धर्म ही सबसे श्रेष्ठ है क्योंकि आप अर्थ और काम से अपना मन हटाकर,एकमात्र धर्म का पालन कर रही हैं।हे मन ! तुम्हे अर्थ ओर काम से मन को हटा कर केवल धर्म का ही अवलम्बन करना चाहिये क़्योकि धर्म ही अर्थ और काम की अपेक्षा श्रेष्ठ है।)
वस्तुतः धर्म के पालन से ही कर्मबंधन का नाश, फलस्वरूप पुनर्जन्म की निवॄत्ति संभव है-
कर्मबन्धाच्छिदं धर्मं भवस्येव मुमुक्षवः । कुमार 25
यहॉ पर धर्म को सर्वश्रेष्ठ कहने से कालिदास का यह अभिप्राय कदापि नही हैं कि अर्थ और काम उससे निम्न है बाल्कि कालिदास का स्वयं अभिमत है कि अर्थ और काम भी धर्म है-
स्थित्यै दण्डयतो दण्डयान्परिणेतुः प्रसूतये ।
अप्यर्थकामौ तस्यास्तां धर्म एवं मनीषिणः ।।रघु0 1/25
(अर्थ -अपराधी को दंड देना राजा का धर्म है क्योंकि अपराधी को दंड दिए बिना राज्य ठहर नहीं सकता ।अतएव वे अपराधियों को उचित दंड देते थे ।वंश चलाना दी मनुष्य का धर्म है ।अतएव संतान उत्पन्न करके वंश चलाने की इच्छा से ही उन्होंने विवाह किया था ,भोग विलास के लिए नहीं ।इस प्रकार यद्यपि दंड और विवाह वास्तव में अर्थशास्त्र के विषय हैं, फिर भी उस विद्वान राजा दिलीप के लिए वे अर्थ -काम धर्म ही थे।)
अतः व्यक्ति को अर्थऔर काम के लिये कभी धर्म को नहीं छोडना चाहिए और धर्म में आसक़्त होकर अर्थ और काम को नहीं छोडना चाहिए और न ही अर्थ के कारण काम को अथवा काम के कारण अर्थ को छोडना चाहिये बाल्कि धर्म और अर्थ और काम तीनों के साथ समान व्यवहार करना चाहिए - यही कालिदास का संदेश है-
न धममर्थकामाभ्यां बबाधे न च तेन तौ ।
नार्थं कामेन कामं वा सो sर्थेन सदृशास्त्रिषु ।। रघुवंश 17/57
(अर्थ -अर्थ और काम के लिए, उन्होंने कभी धर्म को नहीं छोड़ा और धर्म से बंधकर अर्थ तथा काम को नहीं त्यागा ,और न अर्थ के कारण काम को या काम के कारण अर्थ को ही छोड़ा ,अपितु धर्म ,अर्थ और काम तीनों के साथ एकता व्यवहार करते थे। )
4 - धर्म सहितकर्म का निष्पादन करने पर वरदान तथा न करने पर दण्ड की व्यवस्था - काव्य के प्रयोजन में मौलिभूत प्रयोजन है - कान्तासाम्मिततयोपदेश युजे ।काव्य प्रकाश
अर्थात पत्नी के समान सामाजिकों को कर्तव्य एवं अकर्तव्य का उपदेश देना ।
कालिदास ने धर्मानुप्राणित कर्म करने के लिये विशेष बल ही नहीं दिया बाल्कि अपने ग्रन्थों में उससे प्राप्त होने वाले फलों का भी सुन्दर चित्रण किया है ।वरदान की प्राप्ति सत्कर्मों से ही संभव है । आशीर्वाद भी वर का ही लघुरूप है । रघुवंश में दिलीप की गो सेवा से प्रसन्न होकर नान्दिनी ने उन्हें वंश विस्तारक तथा यशस्वी पुत्र का वरदान दिया। (14) इसी प्रकार प्रियंवद गन्धर्व,अज को संमोहन नामक गन्धर्वास्त्र प्रसाद के रूप में देता है ।
सम्मोहनं नाम सखे। ममास्रं प्रयोगसंहारविभक़्तमन्त्रम् । गान्धर्वमादत्स्व यतः प्रयोक़्तुर्न चारिहिंसा विजयश्च्च हस्ते ।।
रघु0 5/57
(अर्थ -हे मित्र! मेरे पास यह सम्मोहन नाम का गंधर्वास्त्र है, जिसके चलाने और रोकने के अलग-अलग मंत्र हैं ।इस दुर्लभ अस्त्र को आप ले लीजिए ।इसमें विशेषता यह है कि जब आप इसे चलाएंगे ,तब आप शत्रुओं के प्राण लिए बिना ही उन्हें जीत लेंगे। )
कालिदास ने सत्कर्मों से मिलने वाले फल की प्राप्ति जहॉ इसी लोक एवं इसी जन्म में दिखायी है वहीं कर्म के प्रति असावधान होने पर अथवा अनुचित कर्म करने पर उसका दुष्परिणाम भी उनके ग्रन्थों में यही दिखाई पडता है । कालिदास ने शाप का प्रयोग निाश्चित रूप से दण्ड के लिये किया है । उदाहरणार्थ शकुन्तला अतिथि सत्कार से विमुख होकर दुष्यंत के ध्यान में संलग्न थी । दुर्वासा के आने पर एवं उनके पुकारने पर भी वह अपने कर्म के प्रति असावधान रही। यही कारण है कि उसे दुर्वासा के शाप एवं कोप का भाजन बनना पडा । (15)
इसी प्रकार रघुवंश में राजा दिलीप ने इन्द्र के पास से पृथ्वी की ओर लौटते हुए मार्ग में बैठी हुई सुरभि गौ का सम्मान नहीं किया । इस कारण सुरभि ने उसे शाप दिया कि-
अवजानासि मां यस्मादतस्ते न भविष्यति।
मत्प्रसूतिमनाराध्य प्रजेति त्वां शशाप सा ।।रघु0 1/77
(अर्थ -इसी से रुष्ट होकर कामधेनु ने तुम्हें शाप दे दिया कि' तुमने जो मेरा तिरस्कार किया है, इसका दंड यही है कि जब तक तुम मेरी संतान की सेवा नहीं करोगे ,तब तक तुम्हें पुत्र नहीं प्राप्त होगा'। )
बाद में नान्दिनी की सेवा करके राजा दिलीप उस शाप से मुक़्त ही नहीं हुए बाल्कि उन्होंने उसके (नंदिनी) वरदान से सुन्दर पुत्र भी प्राप्त किया ।
निषिद्ध प्रदेश में चलाए गये राजा दशरथ के शब्दवेधी वाण से श्रवणकुमार की मॄत्यु हो गई । उसके अंधे माता ने राजा के इस असावधानीपूर्वक किये गये कार्य की भर्त्सना की एवं उसे शाप दिया कि जिस प्रकार मैं अपने फुत्र के वियोग में प्राण त्याग रहा हूँ उसी प्रकार तुम भी अपने पुत्र के वियोग में प्राण त्यागोगे । बाद में राम के वनवास जाने पर दशरथ को अपने कर्म से प्राप्त मुनि के शाप का स्मरण हो आया ।
वह कहते है-
राजापि तद्वियोगार्तः स्मॄत्वा शापं स्वकर्मजम् ।
शरीरत्यागमात्रेण शुद्धिलाभममन्यत ।। रघु 12/10
(अर्थ -उनके वियोग में राजा दशरथ को बड़ा दुख हुआ ।उसी समय उन्हें श्रवण के पिता का शाप स्मरण हो आया और उन्होंने समझ लिया कि अब प्राण देकर ही मेरी आत्मा की शुद्धि होगी।)
इस प्रकार मेघदूत में भी कर्म में असावधान रहने के कारण ही यक्ष को शापवशात् एक वर्ष का निर्वसन प्राप्त हुआ था (16)। अतः स्पष्ट है कि कर्म ही शाप अथवा वरदान का कारण है ।
4.गीता के कर्मयोग के समान निष्काम कर्म पर बल - श्रीमदभगवदगीता में ज्ञान, भक्ति और कर्म का अदभुत समन्वय प्राप्त होता है किन्तु कर्म सिद्धान्त के रूप में गीता की उपादेयता निार्विवाद है। कालिदास ने गीता के कर्म सम्बंधी दोनों प्रमुख सिद्धान्तों को अपने काव्य में उतारा एवं उसे सुसाज्जित कर उसी प्रकार दिया जिस प्रकार कडवी औषधि मिठाई में रखकर दी जाती है।
गीता के अनुसार कोई भी कर्म पूर्णतया शुभ या अशुभ नहीं है । अतः उसे शुभ -अशुभ में नहीं बॉटा जा सकता क़्योंकि प्रत्येक कार्य में कुछ न कुछ दोष हो सकता है(17)। अभिज्ञान शाकुन्तलम् में गीता के उपर्युक़्त सिद्धान्त का अत्यन्त सुन्दर उदाहरण दिया गया है। षष्ठ अंक में राजा के सिपाही धीवर को अंगूठी सहित पकड लेते हैं एवं उसकी आजीविका का मजाक बनाते है। तब वह धीवर कहता है -
सहजं किल यद् विनिान्दितं न खलु तत्कर्म विवर्जनीयम्।
पशुमारणकर्मदारूणो s नुकम्पामॄदुरेव श्रोत्रियः ।।
शाकु0 षष्ठ अक 1
(अर्थ -जिस जाति को भगवान ने जो बुरा या भला काम दे दियाहै,वह छोड़ा नहीं जाता।देखिए, पशुओं को मारना बड़ा बुरा काम है, किंतु बड़े बड़े दयालु और वेद जानने वाले ब्राह्मण भी यज्ञ के लिए पशुओं का वध करते हैं।)
इसी प्रकार कई बार व्यक्ति कार्यों के प्रति यह निर्णय नहीं कर पाता है कि उसे किस कार्य को अधिक प्रधानता देनी चाहिये । ऐसी स्थिति में गीता के समान ही कालिदास की भी यही मान्यता है कि उस समय की परिस्थिति अनुसार ही कार्यों को महत्व देना चाहिए। उदाहरणार्थ-अभिज्ञान शाकुन्तलम के द्वितीय अंक में राजा दुष्यंत से तपस्वियों ने यज्ञ की रक्षा हेतु आश्रम में कुछ दिन रूकने की प्रार्थना की वहीं दूसरी ओर महारानी की इच्छा है कि उपवास के पारणा के अवसर पर राजा दुष्यंत वहॉ उपस्थित रहे।अतः राजा दुष्यंत के समक्ष समस्या है कि इन दोनों में से किसे चुने ।वह कहते है-
इतस्तपस्विकार्यम्। इतो गुरूजनाज्ञा द्वयमप्यनतिक्रमणीयम्। किमत्र प्रतिविधेयम्?
अभिज्ञान शा0 द्वितीय अंक पेज 376
(अर्थ -इधर ऋषियों का काम है और उधर बड़ों की आज्ञा है ।दोनों ही नहीं डाले जा सकते।क्या करूं ?)
अन्त में विदूषक को माता के पास भेजकर स्वयं राजा दुष्यंत आश्रमवासियों की रक्षा में तत्पर हो जाते हैं ।
इस प्रसंग के द्वारा तपस्वियों की रक्षा का कार्य ही माता के कार्य से अधिक महत्वफूर्ण है-यह बताना ही कवि का उद्धेश्य है ।
गीता का कर्मयोग निम्न श्लोक पर आधृत है-
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन् ।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङोs स्त्वकर्मणि ।। गीता 2/47
संसार से आत्यान्तिक निवॄत्ति के लिये रघुवंश में कालिदास ने भी इसी मार्ग का निर्देश किया है-
त्वय्यावेशितचित्तानां त्वत्समर्पितकर्मणाम्।
गतिस्त्वं वीतरागाणामभूयः सान्निवॄत्तये ।
रघु0 10/27
(अर्थ -जो लोग सदा आपका ही ध्यान धरते हैं, जिन्होंने अपने सब कर्म आपको ही अर्पित कर दिए हैं और जो राग-द्वेष से दूर हैं उनको आप ही जन्म-मरण के बंधन से छुड़ाते हैं।)
भगवान की प्राप्ति के तीन साधन हैं -(1)भगवान में चित्त को लगाना (2) भगवान को सब कर्मों को समर्पित करना (3)संसार के सब विषयों से राग से रहित होना ।
संक्षेप में कालिदास के कर्म सिद्धान्त के विषय में यह कहा जा सकता है कि कालिदास के समय आचरण अथवा कर्म के संबंध में अनेक प्रकार के मत प्रचलित थे जैसे-वैदिक कर्मकाण्ड तथा क्रियाकलाप से संबंधित वैदिक कल्पना, उपनिषदों का ज्ञान का सिद्धान्त, बौद्ध धर्म का समस्त कर्म के त्याग का सिद्धान्त , ईश्वर पूजा का आास्तिक विचार एवं गीता का कर्मयोग का सिद्धान्त। कालिदास ने इन सभी को उचित स्थान प्रदान किया और अंत में इन सबको समान्वित कर अपने कर्म सिद्धान्त से इस श्लोक में व्याख्यायित कर दिया-
जुगोपात्मानमत्रस्तो भेजे धर्ममनातुरः ।
अगॄघ्नुराददे सोsर्थमसक़्तः सुखमन्वभूत् ।।रघु0 1/21
(अर्थ -वे निडर होकर आत्मरक्षा करते थे, बड़े धैर्य के साथ अपने धर्म का पालन करते थे, निस्पृह भाव से धन इकट्ठा करते थे और अनासक्त भाव से सांसारिक सुखों को भोगते थे । )
कर्म में सावधान रहना, निरोग रहकर धर्म करना, लोभ रहित होकर धनोपार्जन करना तथा आसक्ति रहित होकर सुख का अनुभव करना। संक्षेप में यही उनका कर्म सिद्धान्त है।
यही कालिदास का मानव जाति के लिये संदेश है ।
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सन्दर्भ सूची--
1 अथर्ववेद 12/1/54
2. अथर्ववेद-7/52/8
3-फलस्य वा पूर्ववस्था पूर्व नामास्तीति तक़्यते। शांकर भाष्य 3/2/40
4 रघु 3-1, 3-12
5-रघु 8-28
6 रघु 3/22-28
7 रघु 3-31
8 रघु 7/19-25
9 रघु 8/26,12/56, 15/91
10 क)आपन्नस्य विषयनिवासिनो जनस्यार्तिहरेण राज्ञा भवितव्यमित्येष युष्मांक धर्मः-अभि0शा0तॄतीय अंक
ख- वही 5/7 11 अभि शा0 4/18
12 कुमार संभव 12/58
13-रघु 1-13
14-रघु
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