सामान्यतया स्वारथ्य का तात्पर्य शारीरिक स्वस्थता से लिया जाता है। आजकल व्यक्ति इसी शारीरिक स्वास्थ्य को प्राप्त करने हेतु जागरूक एवं प्रयत्नशील दिखाई देते हैं किंतु मानसिक स्वास्थ्य की उपेक्षा कर रहे है ।
प्राचीन संस्कृत ग्रंथों में शारीरिक स्वास्थ्य के साथ-साथ मानसिक स्वास्थ्य को भी अत्यधिक महत्व प्रदान किया गया
है । फलस्वरूप संस्कृत ग्रंथों के अनुसार शरीर और मन की स्वस्थता ही रवास्थ्य है।
संस्कृत ग्रंथों की इस अवधारणा को आधुनिक चिकित्सा शास्त्री भी मानने लगे हैं । तदनुसार ही विश्व स्वास्थ्य संगठन ने स्वास्थ्य की परिभाषा दी है -
Health is the physical mental, and social wellbeing of man and not merely the absence of disease or infirmity.
अतः मानसिक स्वारथ्य भी स्वास्थ्य सामान्य का ही अंग है । स्वास्थ्य की यह परिभाषा संस्कृत के अति प्राचीन ग्रंथ सुश्रुत संहिता में प्राप्त होती है-
समदोषः समाग्निश्च समधातु मलक्रियः ।
प्रसन्नात्मेन्द्रिय मनाः स्वस्थ्य इत्यभिधीयते ।।
सुश्रुत सू0 15:41
सुश्रुत द्वारा वर्णित रवास्थ्य की परिभाषा में (1) दोषसाम्य, अग्निसाम्य, धातुसाम्य एवं मल साम्यता स्वरूप शारीरिक स्वास्थ्य (2) आत्मा (3) इन्द्रिय (4)मन की प्रसन्नता को स्वास्थ्य का लक्षण बताया गया है अर्थात् पूर्ण स्वास्थ्य वही है जिसमें शरीर, इन्द्रिय, आत्मा तथा मन के संयोग रूप पुरुष के चारों अंगों की सुखावह अवस्था व प्रसन्नता हो । सुश्रुत की इस परिभाषा के अनुसार 'प्रसन्नात्मेन्द्रिय मना:' को हम मानसिक स्वास्थ्य की परिभाषा मान सकते है।
काश्यप खिल स्थान में भी स्वास्थ्य की परिभाषा के अंतर्गत मानसिक स्वास्थ्य का वर्णन किया गया है -
अन्नाभिलाषो मुक्तस्य परिपाक: सुखेन च ।
सृष्टविण्मूत्र वातत्वम शरीरस्य लाघवम् ।।
बलवर्णायुषी लाभ : सौमनस्य समाग्निता।
सुप्रसन्नन्द्रियत्वम च . सुख स्वप्नप्रबोधनम्।
विद्यादारोग्यलिंगानि विपरीते विपर्ययम् ।।
काश्यप खिलस्थान में अन्नाभिलाष, परिपाक, विणमूत्र, वात यथोचित प्रवाह, शरीर में लघुता तथा समाग्निता, शारीरिक स्वास्थ्य के लक्षण है और बल, वर्ण तथा आयुष्य, वस्तुतः स्वस्थ रहने के ही परिणाम है ।'सुप्रसन्नेन्द्रियत्वम् .'तथा 'सुखस्वप्न प्रबोधनम् 'के द्वारा मानसिक स्वास्थ्य को परिभाषित किया गया है।
मनुष्य में वासनाए (instincts) प्राकृत रूप से रहती है तथा ये वासनाएं वाह्य जगत की संवेदनाओं से प्रबल होकर वेगों (impulses) के रूप में प्रकट होती हैं । इन आवेगों से शरीर तथा मन दोनों ही प्रभावित होकर ही इच्छा का रूप धारण कर लेते हैं । इच्छित पदार्थ की प्राप्ति हो जाने पर तो ये इच्छाएँ तत्काल शांत हो जाती हैं।परंतु अभीष्ट पदार्थों की प्राप्ति न होने पर दो प्रकार के अहितकर परिणाम सामने आते हैं।
01- व्यक्ति असत्य, कपट, छल आदि अनुचित उपायों का सहारा लेता है या फिर
02-यदि व्यक्ति अपनी इच्छा शक्ति का दमन करता है तो वहां अंतर्द्वन्द की उत्पत्ति होती है ।
ये दोनों ही स्थितियां मानसिक स्वास्थ्य के लिये अत्यंत अहितकर हैं ।
मनुष्य को सदैव ही मनोनुकूल परिस्थिति प्राप्त नहीं हो सकती और न ही उसकी समस्त इच्छाओं की पूर्ति संभव है ।अतः अनैतिकता या अंर्तद्वन्द की संभावना सदैव बनी रहती है । इन परिस्थितियों में भी हमारा संतुलन न बिगड़े एवं हमारा रूख निषेधात्मक न होकर सकारात्मक ही रहे यही मानसिक स्वास्थ्य
है ।
मानसिक स्वास्थ्य की स्थिति के कारण ही एक समस्या पर विभिन्न व्यक्ति भिन्न-भिन्न प्रकार से प्रतिक्रिया करते हैं । कुछ व्यक्ति परेशान या उद्वेलित हो जाते हैं जबकि कुछ विना परेशान हुए समझदारी से धैर्य धारण कर उसका निराकरण करते हैं । कुछ व्यक्ति हीन-भावना से ग्रसित होते हैं । कुछ शीघ्र ही निराशा, अवसाद, तनाव, चिंता से घिर जाते हैं । ऐसे व्यक्ति न तो बीमार हैं और न ही असामान्य बल्कि वे मानसिक दृष्टि से स्वस्थ नहीं हैं ।
मनोविज्ञान एवं चिकित्सा शास्त्र में मानसिक विकारों को समाप्त करने या विकारों के उत्पन्न न होने के दृष्टिकोण से ही विचार किया गया है अर्थात् विकारों के निषेधात्मक पक्ष पर ही यहाँ विश्लेषण किया गया है । इसके विपरीत आयुर्वेद एवं संस्कृत ग्रंथों में मानसिक स्वास्थ्य पर सुधारात्मक के साथ-साथ सृजनात्मक दृष्टिकोण से भी विचार किया गया है तथा आत्म नियंत्रण, आत्मानुशासन, इच्छाशक्ति (will power) आदि प्राप्त करने हेतु अधिक बल दिया गया है तथा उसे आध्यात्मिकता से संबंधित माना गया है। अतः स्पष्ट है कि आयुर्वेद तथा संस्कृत ग्रंथों में रोग प्रशमन की अपेक्षा स्वास्थ्य रक्षण पर अधिक बल दिया गया है तथा इसे आध्यात्मिकता (spirituality) से संबंधित माना गया है ।
संस्कृत ग्रंथों एवं आयुर्वेद में मानसिक स्वास्थ्य के संबंध में जो उद्धरण प्राप्त होते हैं, उससे शारीरिक स्वास्थ्य के साथ-साथ मानसिक स्वास्थ्य का महत्व सुस्पष्ट है ।
संस्कृत ग्रंथों से मानसिक स्वास्थ्य -
मानसिक स्वारथ्य दो तत्वों के समन्वय से प्राप्त होता है प्रथम मन में सकारात्मक विचार जैसे-सत्य , अहिंसा, प्रेम, त्याग आदि हो और द्वितीय निषेधात्मक विचार जैसे काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि का त्याग ।
इन दोनों तत्वों के संतुलन अर्थात् प्रथम की स्थिति तथा द्वितीय का निषेध के द्वारा ही मानसिक स्वास्थ्य परिपुष्ट होगा ।
सकारात्मक विचारों हेतु अनेक उल्लेख संस्कृत ग्रंथों में सर्वत्र ही प्राप्त होते हैं। यथा-
सत्यं वद ।धर्मं चर ।यान्यस्माकं सुचरितानि, तानि त्वयोपास्यानि, नो इतराणि ।
तैत्तरीयोपनिषद शिक्षावल्ली
अन्यत्र कहा गया है -
तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु ।
इत्यादि
जो धारण किया जाय उसे ही धर्म कहा जाता है ।धर्म का लक्षण है -
निषेधात्मक विचारों में मन लिप्त न हो ,अतएव कहा गया है-
तेन त्यक्तेन भुंजीथा:
मा गृधः कस्यस्विद्धनम् ।
ईशावास्योपनिषद 1/2
वृहदारण्यक उपनिषद् में प्रजापति ने देवताओं को उपदेश रूप में एक ही अक्षर दिया-
'केवल 'द'। जिसका आशय था दमन । देवत्व का असीम अहंकार बढ़ न जाए इसलिये इन्द्रिय दमन आवश्यक था।वस्तुतः यहां दमन का तात्पर्य है नियंत्रण | जिसे कठोपनिषद (१)के रथ-रथी के रूपक द्वारा भली प्रकार समझा जा सकता है । उसके अनुसार शरीर रथ है । और इस रथ का स्वामी आत्मा है | बुद्धि सारथी है और लगाम है मन, इन्द्रियां घोड़ों की तरह उसमें जुती हुई है और इन्द्रियों के विषय है मार्ग,।
ज्ञानी जनों का कहना है कि जब आत्मा, इन्द्रिय और मन, ये मिलकर काम करते हैं तब मनुष्य भोक्ता कहा जाता है । जो विज्ञान से रहित है उसका मन आत्मा से सदा अलग रहेगा । वश में उसकी इन्द्रियां भी नहीं रहती वैसे ही, जैसे दुष्ट घोड़े सारथी के काबू में नहीं रहते । किंतु जिसका सारथी विज्ञान है, जो मन की लगाम को अपने हाथ में रखता है, वह संसार रूपी मार्ग को पार पा लेता है और परमधाम अर्थात् परमात्मा तक पहुंच जाता
है -
स तु तत्पदमाप्नोति तस्माद् भूयो न जायते ।।
काठक उपनिषद १-३-८
अर्थात जो समनस्क होगा, जो मन पर नियंत्रण रखेगा वही मोक्षधिकारी है ।
इन्द्रियेभ्यो परं मनो मनस : सत्वमुत्तमम्।
सत्वादपि महानात्मा महतोsव्यक्तमुत्तमम् ।।
अत: उस आत्म तत्व की प्राप्ति उसे ही संभव है जिसका मन अर्थात् मानसिक स्वास्थ्य सर्वोत्तम हो। श्रीमद् भगवद गीता में स्थितप्रज्ञ के लक्षण (२)के द्वारा मानसिक स्वास्थ्य एवं
आध्यात्मिकता की अवधारणा सुस्पष्ट होती है।
निष्कर्षत: मानसिक स्वास्थ्य ही आध्यात्मिकता या sprituality का कारण है।
आज शारीरिक स्वास्थ्य के प्रति प्रत्येक व्यक्ति अत्यधिक सचेष्ट है किंतु आधुनिक समय में बढ़ते हुए मानस रोगों तथा हासोन्मुख मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के संदर्भ में यह आवश्यक है कि हम मानसिक स्वास्थ्य की प्राप्ति के लिये भी प्रयत्नशील होवे ।
संदर्भ ग्रंथ -
१-कठोपनिषद-39
२-श्रीमद्भगवद्गीता - 2-12
