"Sanskrit Gyan Jyotsna: 2021

ऐसी बानी बोलिए -कबीर दास जी का दोहा


 

कबीरदास जी का दोहा - साँच बराबर तप नहीं


 

बौद्ध धर्म के आचारपक्षीय सिद्धांतों का ब्राह्मणधर्मी मूल

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    महात्मा बुद्ध एक महान शिक्षक एवं धर्मोपदेशक थे । छठी शताब्दी ई0 पूर्व  में उनका आगमन भारतीय समाज के उत्थान में सहायक सिद्ध हुआ । उन्होंने समाज को एक नई दिशा प्रदान की । महाराज शुद्धोधन का पुत्र सिद्धार्थ, जिस समय अपना घर छोड़कर निकले उस समय ,केवल दुखों से मुक्ति का हेतु ढूँढना  एवं उसे प्राप्त करना ही उनका लक्ष्य था ।किंतु इस छोटे से लक्ष्य ने ,इतना विस्तृत एवं व्यापक स्वरुप धारण कर लिया ,कि उसने समाज, देश तदनन्तर विश्व को भी समाहित कर लिया । बुद्ध ने उन्हीं तत्वों का प्रतिपादन किया जो सार्वकालिक एवं सार्वदेशिक थे । वे तत्व न  तो किसी वर्ग विशेष के लिए थे ,न ही जाति विशेष के लिए । आत्मश्लाघा से रहित वह संपूर्ण मानवता के लिए थे । उसमें न तो कर्मकाण्ड की जटिलता थी और न ही दर्शन शास्त्र की दुर्बोधता । यही कारण है कि वह चिरप्रतिष्ठित ब्राहमण धर्म के विरोध में और अनेक मतमतान्तरों के मध्य भी प्रतिष्ठित हो सका ।लेकिन क्या बौद्ध धर्म के सिद्धांत , ब्राह्मण धर्म के विरोधी थे ? 
       वस्तुतः महात्मा बुद्ध ने सर्वथा नवीन सिद्धान्तों की प्रतिष्ठापना नहीं की ,बल्कि उन्होंने  थोड़े बहुत परिवर्तनों के साथ बाह्रमण धर्म के सिद्धान्तों एवं कार्यप्रणालियों को ग्रहण किया । ब्राह्मण धर्म या पौराणिक धर्म का अनुशीलन करने पर यह स्पष्ट दिखाई पड़ता कि बौद्ध धर्म के व्यवहारिक सिद्धान्तों का आधार ,ब्राहमण धर्म ही रहा है । यहाँ मैं इन दोनों धर्मों की समानता पर प्रकाश डालूंगी ।
     हिन्दू अथवा ब्राह्मण व्यवस्थाकारों में धर्म की परिभाषा अत्यधिक व्यापक एवं उदात्त है । उनके अनुसार "ध्रियते लोक: अनेन इति धर्म:
अर्थात् जिससे लोकधारण किया जाय अथवा 
"धरति धारयति वा लोक: इति धर्म:
अर्थात् जो लोक को धारण करें । वृहदरण्यक उपनिषद् धर्म और सत्य को पर्यायवाची मानता है (1)। महाभारत में वर्णित है -
  यतो धर्मस्तत: सत्यम् । 
 मनु ने  ब्राहमण धर्म में धर्म के दस लक्षण बताए गये है।
      धृतिक्षमा दमोsस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रह:।
     धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्म लक्षणम् ।।
                                                मनु स्मृति 
तैत्तरीय उपनिषद्  में वर्णित है -     
सत्यं वद धर्मंचर स्वाध्यायान्मा प्रमद ... सत्यान्न प्रमदितव्यम् धर्मान्न प्रमदितव्यम्।
कुशलान्न प्रमदितव्यम् । भूत्यै न प्रमदिततव्यम्। 
इत्यादि तैत्तरीय उपनिषद् (2)के शब्द बौद्ध
धर्म (3) के नियमों के समान ही प्रतीत होते है ।
      महाभारत में वर्णित है कि इन्द्रियों और मन का दमन ही मोक्ष है (4) | महात्मा बुद्ध का उपदेश था कि रूप, शब्द, गंध, रस, स्पर्श, तथा मानसिक वितर्क और विचारों से मनुष्य आसाक्ति करने लगता है और यहीं तृष्णा का जन्म  होता है (5) ।सतृष्ण मनुष्य
कभी भी दुख से उद्धार नहीं पा सकता (6)।

      बौद्ध धर्म में जिन  चार आर्यसत्य का वर्णन मिलता है ,वह सांख्यशास्त्र के चार सत्यों के अनुकूल है । सांख्यप्रवचनभाष्य के अनुसार वे चार सत्य इस प्रकार है (i) जिससे हमें छुटकारा पाना है वह दुख है । ( ii) दुख के विनाश का नाम मोक्ष है । (iii) प्रकृति एवं पुरूष के  बीच भेद न करने से ही दुख उत्पन्न होता है। जिसके कारण प्रकृति व पुरूष का परस्पर संबंध बराबर बना रहता है । (iv) मोक्ष का उपाय सद्  असद्विवेक संबंधी ज्ञान ही है । 
    ब्राहमण धर्म  के समान बौद्ध धर्म ने भी  तप को  अत्यधिक महत्व दिया । ऋग्वेद का कथन है- तप से ऋत और सत्य की उत्पत्ति हुई है (7) उपनिषदों का कथन है कि तपस्या द्वारा ही ब्रह्रम को ढूंढा जाता है (8)।बौद्ध धर्म में भी तपस्या द्वारा ही लक्ष्य प्राप्ति संभव है। 
       ब्रह्मचर्य की महत्ता ब्राह्रमण धर्म में प्रतिष्ठित थी । छान्दोग्य उपनिषद का कथन है कि ब्रह्मचर्य के द्वारा ब्रह्मलोक की प्राप्ति होती है (9) । कठोपनिषद् में भी कहा गया है कि ब्रह्म प्राप्ति की कामना करने वाले व्यक्ति  ब्रह्मचर्य का अनुसरण करते हैं (10) । ब्राह्मण साहित्य में ब्रह्मचर्य का अनेकानेक गुणगान किया गया है । बौद्ध धर्म में श्रमण व्यवस्था के नियम एवं ब्राहमणों के संन्यास आश्रम के नियमों में समानता दृष्टिगोचर होती है ।जैसे उनके वस्त्र, उपकरण, भिक्षा संबंधी नियम, दिनचर्या आदि समान है। 
   ब्राहमण धर्म कर्मप्रधान धर्म है ।वृहदारण्यक उपनिषद का कथन है कि पुण्यकर्म से पुण्य और पाप कर्म से पाप की उत्पत्ति होती है (11) । छान्दोग्य उपनिषद् में उल्लिखित है' पुरूष कर्मप्रधान है' जैसा वह इस लोक में करता है उसी के अनुरूप मृत्यु के पश्चात उसे प्राप्त होता है (12) | बौद्ध धर्म के भी अनुसार मनुष्य अपने समस्त कर्मों के लिए उत्तरदायी है । कर्म के अनुरूप ही उसे फल मिलेगा । कर्म के कारण ही उसका पुर्नजन्म होता है । कर्म करते हुए भी उसमें लिप्त न होना ब्राहमण धर्म का प्रमुख सिद्धान्त है(13) I
       बौद्धों के विषय में सामान्य अवधारणा है कि ये वेदनिन्दक, यज्ञविरोधी और बाह्मण विरोधी हैं ।परंतु तात्विक दृष्टि से परीक्षण करने पर यह धारणा अनुचित प्रतीत होती है । गौतम बुद्ध ने अपने शिष्यों को आत्म प्रशंसा और पर- निन्दा से बचने का उपदेश दिया ।अत: वे स्वयं किसी की निन्दा कर सकते थे, यह संभव नहीं है । बुद्ध विभज्जवादी थे अर्थात् प्रत्येक मत में सत्य और असत्य का विभाजन करके ही, उसके अंशों को ग्रहण अथवा परित्याग करते थे ।उन्होंने अपने शिष्यों को भी विमंसक(मीमांसक) होने की सलाह दी थी (14) । उन्होंने वेदों का प्रमाण्य इसलिए अस्वीकार किया क्योंकि उनकी सत्योन्वेषिणी दृष्टि एकमात्र श्रद्धा के आधार पर किसी को भी पूर्ण एवं चिर सत्य मानने के लिए तैयार नहीं थी । यहाँ यह भी उल्लेखनीय है, कि उपनिषद् के मनीषियों को भी एकमात्र वेदज्ञान से संतुष्टि नहीं थी क्योंकि वेदों के ज्ञाता नारद ,छान्दोग्य उपनिषद् में कहते हैं - मैं केवल मंत्रों को जानने वाला हॅू आत्मा को जानने वाला नहीं हूँ (15) । अतः महात्मा बुद्ध ने भी नारद जैसे मनीषियों के मार्ग का ही अनुसरण किया था, किंतु वेदों में सत्य में जो कुछ सत्य सम्मत था, वह अवश्य ही उनके लिए ग्राहय था । बुद्ध ने स्वयं को कभी भी वेदों का विरोधी नही कहा बल्कि स्वयं को "वेदगू' (वेदाज्ञ)(16)कहा था ।
ज्ञान प्राप्त करने के पश्चात् बुद्ध ने कहा ' मैं ब्राह्रमण हूँ' अर्थात् ब्रहम जानाति इति ब्राह्रमणः' ब्राह्रमणों की जाति व्यवस्था को बुद्ध कर्म के आधार पर स्वीकार करते थे जन्म के आधार पर नहीं ।
    बुद्ध यज्ञ विरोधी नहीं थे ।वे तो एकमात्र हिंसात्मक एवं कर्मकाण्डीय यज्ञों के ही विरोधी थे । उत्तर वैदिक काल में यज्ञों में की गई हिंसा को रोकने के लिए ब्राहमण धर्म में भी प्रयास किया गया ।यही कारण है कि उपनिषदों में यज्ञ की आध्यात्मिक व्याख्या प्राप्त होती है।
      बौद्ध शिक्षा प्रणाली ने ब्राहमणीय शिक्षा पद्धति का अनुकरण किया । ब्राह्मणीय शिक्षा पद्धति के उपनयन संस्कार के समान ही बौद्ध शिक्षा प्रणाली में 'पबज्जा 'संस्कार
होता था तथा ब्राहमणीय शिक्षा पद्धति में संस्कार के पश्चात् विद्यार्थी को ब्रहमचारी की उपाधि दी जाती है ।उसी प्रकार बौद्ध पद्धति में पबज्जा संस्कार के बाद सामनेर की उपाधि दी जाती थी । विद्या आरम्भ  करने की आयु भी दोनों में समान थी । ब्रह्मचर्य से संबंधित भिक्षा पात्र, भिक्षा मांगने की विधि, भोजन करने , सोने, केश कटवाने, वस्त्र,पुष्पमालाओं सुगन्धित तेलों आदि विलासों का त्याग आदि नियमों का पालन बौद्ध भिक्षु
भी करते थे । गुरू शिष्य संबध भी बौद्ध शिक्षा पद्धति ने अपना लिया था ।
      बौद्ध धर्म की मोक्ष की अवधारणा भी ब्राह्मण धर्म के अनुसार है । छान्दोग्य उपनिषद के अनुसार विमुक्त आवागमन के चक्कर से छूट जाता है (17) कठोपनिषद् के अनुसार ब्रह्म प्राप्त मनुष्य अनासक्त और अमर हो जाता है (18) | बौद्ध धर्म में आत्मा, संसार एवं इसी प्रकार की अन्य समस्याओं की व्याख्या में हमें उपनिषदों के पारिभाषिक शब्दों का प्रयोग मिलता है यथा नामरूप, कर्मविपाक, अविद्या, उपादान अर्हत, श्रवण बुद्ध, निर्वाण, प्रवृत्ति, आत्मा, निवृत्ति इत्यादि ।
     किंतु दार्शनिक सिद्धान्तों के दृष्टिकोण से बौद्ध धर्म और ब्राहमण धर्म में विभिन्नता दिखाई पड़ती है । आत्मा, परमात्मा, सृष्टि से संबंधित विचारों में बौद्धों ने अपनी दृष्टि से खण्डन, मण्डन एवं परिवर्तन किया है । उनका अनात्मवाद, प्रतीत्यसमुत्पाद, अनीश्वरवाद, का सिद्धान्त भारतीय दर्शन परंपरा में प्राप्त नहीं होते है |
    अतः स्पष्ट है कि बौद्ध धर्म के व्यवहारिक स्वरूप के सिद्धान्त ब्राह्मण धर्म पर आधारित है । दूसरों शब्दों में यह भी कहा जा सकता है, कि उन्होंने ब्राह्मण धर्म के सूत्रों को लेकर ही अपना ताना बाना बुना है। इसी कारण अनेक विद्वान इसे Protastant Brahmanism प्रोटेस्टेंट ब्राहमनिज्म के नाम से पुकारते हैं।
       उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट होता है कि बौद्ध धर्म सर्वथा नई व्यवस्था या सिद्धान्त का संस्थापक नहीं था । मैक्समूलर ने सैकरेड बुक्स आफ इस्ट (19) में लिखा है 'उपनिषदों के बहुत से सिद्धान्त निःसंदेह विशुद्ध बौद्धधर्म के ही सिद्धान्त है अथवा इसे यो कहना अधिक संगत होगा कि अनेक विषयों में बौद्ध धर्म ने ठीक ठीक रूप में उन्हीं सिद्धान्तों को क्रियात्मक रूप दिया जो उपनिषदों में प्रतिपादित किए गये थे । लेकिन फिर भी यह तो मानना ही पड़ेगा कि बौद्ध धर्म के आने से समाज में एक महान
परितर्वन तो हुआ ही। साथ ही हिन्दू सभ्यता में चतुर्दिक उन्नति भी हुई । इतिहास में ऐसे परिवर्तन यद्यपि संपूर्ण विश्व में हुए हैं पंरतु उसका इतना अधिक विस्तार एवं सकारात्मक प्रभाव प्राप्त नहीं होता है । उदाहरणार्थ- जैन धर्म,जो बौद्ध धर्म से प्राचीन होने पर भी जनसाधारण तक नहीं पहुंच पाया । वैष्णव धर्म मात्र भारत तक ही सीमित रहा । जबकि बौद्ध धर्म विदेशों में भी पाया जाता है । योरोप में ईसाई धर्म के प्रभाव में
आने पर रोमन साम्राज्य में काला युग (डार्क ऐज) प्रारंभ हुआ । वहां सभी दर्शन के केन्द्र एवं स्कूल बंद हो गए। यूरोप के सभी दार्शनिक सुकरात, अरस्तु प्लेटो आदि इसी डार्क ऐज से पहले हुए थे तथा इस्लाम धर्म प्रचारकों को भी ऐसी अद्भुत सफलता नहीं मिली।
       अतः अब प्रश्न उठता है कि बौद्ध धर्म की इतनी उन्नति क्यों ? जबकि न तो उन्होंने जनसाधारण के जोश और मानसिक पक्षघात को भड़काया और न ही मोक्ष प्राप्ति का कोई सस्ता नुस्खा बतलाया ।न ही उन्होंने बौद्ध धर्म अपनाने के लिए किसी प्रकार का लालच लोगों को दिया । इस प्रश्न पर विचार करने पर यह निष्कर्ष निकलता है -
1 बौद्ध धर्म के सिद्धान्त अत्यन्त सरल और सुबोध थे । वैसे तो सभी धर्म आचार एवं नैतिक शिक्षा पर बल देते है लेकिन बौद्धों ने आचार तत्व को ही अपने धर्म की आधार शिला माना । वह विशुद्ध मानववादी धर्म था । जाति मत पूछ आचरण पूछ का उद्घोष आज भी मनुष्य को अपने आचरण के प्रति सचेष्ट रहने की ओर प्रेरित करता है।।
2. उसमें जातिवाद और कर्मकाण्ड के लिए कोई स्थान नहीं था । किसी भी जाति, वर्ण, सम्प्रदाय का व्यक्ति बौद्ध धर्म को अपना सकता था । मोक्ष का द्वार स्त्री, पुरुष, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य शूद्र, बालक, वृद्ध सभी के लिए खुला था । महात्मा बुद्ध ने यह कहकर कि जो कोई जातिवाद में फंसे है, मानववाद में फंसे
है, आवाह - विवाह में फंसे है, वे अनुपम विद्याचरण संपदा से दूर है (20) । के द्वारा साम्प्रदायिकता को समाप्त करने का प्रयास किया जो मनुष्य और मनुष्य के बीच की दीवार है । निष्कर्षतः उन्होने इस कृत्रिम अवरोधों को समाप्त करना चाहा।

      3. महात्मा बुद्ध ने उन्हीं विषयों का उपदेश दिया जो मनुष्य के परम कल्याण के लिए आवश्यक थे । लोक जीव और परमात्मा संबंधी अनेक विवादों को उन्होंने व्यर्थ समझा इसीलिए उनहोंने दश अकथनीय सिद्धान्तों का प्रतिपादन दिया । यही वे तत्व है जिनसे वर्ग, देश, धर्म आदि विभाजित होते है।
इसलिए विचारक होम्स (21) का मत है कि बुद्ध के धर्मप्रचार का उद्देश्य यह था कि उपनिषदों के आदर्शवाद को उसके उत्कृष्ट रूप में स्वीकार करके  उसे मनुष्य जाति की दैनिक आवश्यकताओं के लिए उपयोगी बना दिया जाए ।
डॉ0 राधाकृष्णन बुद्ध को सुधारक कहते है (22) और उनके अनुसार बुद्ध कोई ऐसा क्रान्तिकारी नहीं था जिसने उपनिषद् के सिद्धान्तों की प्रतिक्रिया रूपी लहर चलाकर ख्याति एवं सफलता प्राप्त की बल्कि उसका उद्धेश्य एक सुधारक के
रूप में उपनिषदों के प्रचलित सिद्धान्तों के ढांचे में परिवर्तन करके उसमें प्रतिपादित सत्यों को, जो भुला दिया गये थे फिर से प्राधान्य में लाना था ।
         सचमुच आज भी जब अनेक मतमतान्तरों के कारण व्यक्ति के सम्मुख धर्म के कारण भ्रम की स्थिति बन गई है ऐसे समय में बौद्ध धर्म के मूल उपादानों का मूल्यांकन कर पुनः उन सत्यों को प्राधान्य में लाकर ग्रहण करने से उसकी उपादेयता एवं प्रासंगिकता बढ़ जाती है।
        तृष्णा का त्याग, सत्य, अहिंसा एवं आचरण पर बल सभी धर्मों में विद्यमान है । यदि सभी भेदों को भुलाकर इसी पर बल दिया जाए तो समाज में व्याप्त आपसी मतभेदों की समस्या समाप्त हो जाएगी एवं चरित्र बल से स्वास्थ्य समाज का गठन संभव होगा जिससे ' वसुधैव कुटुम्बकम' का स्वप्न यथार्थ बन
जायेगा।

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सन्दर्भ सूची -
1- यो वै स धर्म: वै तत् - वृहदारण्यम 1.4-14
2-तैत्तरीय उपनिषद एकादश अनुवाक
3-महापरिनब्बानसुत्तम
4-दमस्योपकिवन्मोक्षः - शान्तिपर्व
5-महासति पटठान सुत्त (दीघ 2.9)
6-संयुक्त 21.10
7-ऋग्वेद 10.190.1
8-तपसा चीयते ब्रहम - मुण्डक 1.1.8
9-छान्दोग्य 8.4.3
10. कठ 1.2.15
11 वृहदारण्यक 4.4.
12.अन्य खलु ऋतुमय पुरूषः । यथा ऋतुरस्मिन लोकन पुरुषों भवति तथेत प्रेत्य भवति - छान्दोग्य  3.14 |
13. कुर्वन्नेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः ।
      एवन्त्यपि नान्यथेतोs स्ति न कर्म लिप्यते नरे ।।
       ईशावास्योपनिषद
14. वीमंसक सुत्तन्त (मज्झिमनिकाय1.5.7)
15. छान्दोग्य 7-2
16. मुत्तनिपात 5.1.16
17. न स पुनरावर्तते - छान्दोग्य 8.15.1
18. ब्रहमप्राप्तो विरजोs भूद्विमृत्यू: कठ 23-18
19. खण्ड 15, भूमिका पृष्ठ 37
20. वी01.3
21 द क्रीड़ा आफ बुद्ध, बाय होम्स,
22. भारतीय दर्शन - डॉ0 राधाकृष्णन पेज 435

कालिदास के नाटक मालविकाग्निमित्रम् का श्लोक -अर्थ एवं व्याख्या सहित


 

आधुनिक संस्कृत साहित्य की सरल तरल भाषा

            आधुनिक संस्कृत साहित्य का फलक अत्याधिक विस्तृत है जिसमे पारंपरिक विधाओं में साथ-साथ नई विधाओं में नई शैली के साथ प्रचुर साहित्य सुलभ है ।आधुनिक संस्कृत साहित्य के कवियों ने परम्परानुमोदित पक्ष से हटकर अपने युग की नई वास्तविकता के अनुरूप एक ऐसे मार्ग का निर्माण किया है ,जिसके द्वारा उनकी अनुभूति अधिक शक्ति के साथ पाठक पर प्रभाव डाल सकें और इस कार्य के निष्पादन में परंपरा जहाँ जहाँ बाधा उत्पन्न करती है ,वहां विद्रोह भी आवश्यक हो जाता है ।इसीलिए बीसवीं शती की ये रचनाएं संविधान, स्वरूप, भाषा, प्रस्तुति एवं शैली के दृष्टिकोण से प्राचीन संस्कृत साहित्य से भिन्न हैं । यह भिन्नता अत्यधिक सुस्पष्ट एवं विस्तार के साथ भाषा के क्षेत्र में दृष्टिगोचर होती है ,क्योंकि भाषा एक ओर तो भाव पक्ष को प्रभावित करती है ,वहीं कला पक्ष से भी संबंधित होती है इसके साथ ही साथ सह्रदय भावकों से भी साक्षात्    संबंधित होती है।
         सामान्य रूप से देखा जाय तो आधुनिक संस्कृत साहित्य की भाषा सरल है ,तथा वैदर्भी रीति में ही लगभग संपूर्ण साहित्य सृजन प्राप्त होता है । इन काव्यों में प्राचीन कवि माघ,
भारवि के समान न तो आडंबर दिखाई पड़ता है और न ही श्री हर्ष के समान गुत्थियां । प्राचीन कवियों का प्रयास था,कि सामान्य व्यक्ति उनके ग्रंथ के साथ खिलवाड़ न करें,
प्रबुद्ध पाठक ही ग्रंथ में प्रवेश करें ,जिसका संकेत श्री हर्ष ने दिया है- 
  ग्रंथ ग्रन्थरिह क्वाचित्क्वचिदपि न्यासि प्रयत्नान्मया  (1 )।
    किंतु आधुनिक कवि न तो राज्याश्रय प्राप्त करने के लिए काव्य रचना करता है, न ही किसी राजा की प्रशंसा एवं मनोरंजन के लिए । वह ईश्वर, गुरू या देवता के सामने आत्मसमर्पित होकर भी काव्य सृजन नहीं करता है । उसकी काव्य रचना उसकी स्वानुभूति और चेतना के फलस्वरूप होती है। इसीलिए सुन्दर -कुरूप, शिव-अशिव, यथार्थ-अयथार्थ सभी ओर उसकी दृष्टि जाती है और क्षोभ, व्यंग्य कर्कशता, शोक, चिन्ता आदि भाव भी साहित्य में दिखाई पड़ते है।  आधुनिक कवि ऐसे काव्य रूप को अपना रहे  हैं जो उसके कथन की प्रकृति के अनुरूप हों अथवा जिससे उसके मन की संगति स्थापित हो । अतएवं केवल कोमल शब्दों की पदशय्या की रचना करने में प्रयासरत न होकर वे भावतत्व एवं विचार सूत्र को तीव्रता से पकड़ कर, तथा उसे तीव्रतर बनाने की ओर प्रवृत्त होते हैं ।उदात्तीकरण के स्थान पर वह भावों में घनत्व और तीव्रता लाने का प्रयत्न करते हैं इसीलिए उसके कथन में सीधापन अधिक मिलता है । आधुनिक कवि सम्भवतः यही चाहते है कि संस्कृत भाषा न जानने वाले व्यक्ति को भी कविता का मर्म समझ में आ जाएं एवं  उस उस पाठक का भी भरपूर रसास्वादन हो दृष्टिकोण की यह भिन्नता ही कवि को भाषा के सरलतम रुप की ओर प्रेरित करती है। 
        प्राचीन महाकवियों में बाण, सुबन्धु, माघ, श्रीहर्ष  आदि  की रचनाओं में  शब्दों के साथ-साथ भावाभिव्यक्ति भी दुरूह है। ये कवि लम्बे  समास -बहुल विशेषणों के अधिकाधिक प्रयोगों से गुंथी क्लिष्ट  भाषा का प्रयोग करते थे।इनके काव्यों में विवरण अधिक एवं प्रमुख था तथा कथानक स्वल्प एवं गौण इसी कारण कीथ'(2) को टीका की सहायता लेनी पड़ती थी तथा बेबर जैसे विद्वान,भी इस साहित्य में प्रवेश करने से डरते थे। उन्हें तो वह काव्य भयावह जंगल जैसा दिखाई पड़ता था। वहाँ भाषा की दुर्बोधता ही,उसकी उपेक्षा का हेतु थी किंतु आधुनिक संस्कृत-साहित्य एक ऐसा पुष्पगुच्छ है जिसकी सुगन्ध अनायास ही अंतरात्मा को सुगंधित कर देती है। इस साहित्य को आधुनिक इसलिए नहीं कहा जाता है कि उसने पुरानी समस्त परंपरा को समाप्त कर नयी परम्परा प्रारम्भ की है बल्कि अपनी अनुभूति एवं अभिव्यक्ति के सम्प्रेषण के कारण ये
आधुनिक कही जाती हैं। आज गद्य एवं पद्य की दूरी समाप्त-सी हो रही है किन्तु काव्य एवं अकाव्य में अंतर आज भी स्पष्ट है। केवल तुकबन्दी, जटिल शब्दों की प्रधानता एवं अलंकार और विशेषणों का प्रयोग काव्य नहीं है। दूसरी ओर न ही छन्दों के बन्धन से मुक्ति एवं सरल शब्दों में अभिव्यक्ति काव्य है। आधुनिक काव्य अपने युग की संवेदना को अभिव्यक्त करने में पूर्ण समर्थ हैं।
बाह्य अलंकरणों के बिना कविता के आंतरिक सौन्दर्य को निखार कर सजीव एवं आकर्षक रूप में प्रस्तुत करना आधुनिक कवियों का वैशिष्ट्य है। श्री एजरा पाउण्ड का भी यही मत है।
The true poet is most easily distinguished from the false when he trusts himself to the simplest expression and when he writes without adjectives. (The spirit of Romance,page 219 )
        आधुनिक कवियों की सरल अभिव्यक्ति में भाषा के दोनों घटकों  शब्द एवं वाक्य का समन्वित साहचर्य दिखाई पड़ता है।
    आधुनिक संस्कृत-साहित्य के कवि शब्द प्रयोग के प्रति सावधान तो हैं ,किन्तु नित्य-नवीन समानार्थी एवं पाणिनीय व्याकरण-सम्मत शब्बों के प्रयोग  के प्रति इनकी अत्यधिक लिप्सा नहीं दिखाई देती है। ये कवि न तो माघ  के
"नवसर्गगते माघे नवशब्दो न विद्यते "सम्मान को खण्डित करना चाहते हैं और न ही श्रीहर्ष के नैषधं विद्धदौषधम् को।
      आधुनिक कवि सामान्य प्रचलित शब्दों का ही प्रयोग करते हैं। इस सम्बन्ध में वे इतने उदार हैं कि देशज एवं विदेशी शब्दों का प्रयोग करने के भी नहीं सकुचाते। कुछ कवि (3)अंग्रेजी शब्दों जैसे बैडमिंटन, टेनिस , पुलिस, ईमेल, रेडियो, स्टेशन, मैडम'(4) कॉफी इत्यादि शब्दों का खुलकर प्रयोग करते हैं। वहीं दूसरी ओर कवियों का एक वर्ग ऐसा भी है जो विदेशी शब्दों को  संस्कृत में परिवर्तित कर प्रयुक्त करता है। इन शब्दों की तालिका अत्यधिक  विस्तृत है। उदाहरणार्थ मुखधूलिका (Face Powder), मुखरेणु (Powder)
काष्ठ-शिला (Bench), परिधान-पेटकम् (Suitcase), आकरण-घटिका (Call -bell) इत्यादि। कहीं-कहीं पर पात्रों के नामों को भी संस्कृत में परिवर्तित कर दिया गया है। जैसे अवरंगजीवः  (औरंगजेब), रसनारी (रोशनारा), अपजलखान 
(अफजलखां), रुष्टतमः (रूस्तम), आदि नाम उल्लेखनीय हैं(5)। इसी प्रकार मोहर्रम को मोहरमः, रमजान को रामयानम्, गोलकुंडा को गोलखण्डः आदि प्रयोग कर संस्कृत-प्रातिपदिक भी बनाए गये हैं। इसके साथ ही साथ कहीं-कहीं पर शब्दों को उसी रूप में रखकर विभक्तियाँ लगाकर प्रयोग करने का प्रचलन भी प्राप्त होता है ।जैसे छुट्टिः   आदि। कुछ स्थलों पर प्राचीन प्रचलित  शब्दों की उपेक्षा कर नवीन शब्दों का निर्माण भी प्राप्त होता है। जैसे चमगादड के लिए अजिनपत्राः' शब्द बनाया गया है जबकि पुराने संस्कृत-काव्यों में चर्मचरः शब्द मिलता  है(6)।         
      शब्द प्रयोग की यह उदारता साहित्य में ग्राह्य होनी चाहिए अथवा नहीं? यह प्रश्न विचारणीय है। परम्परावादी वर्ग का मन्तव्य है कि हमें अन्य भाषाओ के शब्दों के प्रयोग से सदैव बचना चाहिए अन्यथा संस्कृत-भाषा अपना दैवीय,परिमार्जित एवं परिष्कृत स्वरूप खो देगी ।किन्तु हमें यह भी याद रखना होगा कि कहीं स्वयं की शुद्धता पर बल देते-देते हमारा अस्तित्त्व पुनः संकट में न आ जाय क्योंकि ऐसा करने से संस्कृत-भाषा पुनः केवल संस्कृतज्ञों अर्थात् सीमित दायरे के मध्य प्रयुक्त होगी और सबसे अलग-थलग होकर कहीं मृत-भाषा न कही जाने लगे।
      प्राचीन काल में जब पालि, प्राकृत एवं अपभ्रंश का विकास हुआ तब भी साहित्य में अन्यान्य भाषाओं के शब्दों के प्रयोगों का प्रचलन था। उस समय संस्कृत-भाषा में इन शब्दों के प्रवाह को रोकने में पाणिनि का परिश्रम काम आया था और बाद में पतंजलि ने पुनः संस्कृत-भाषा की विशुद्धता कायम रखने हेतु भगीरथ प्रयास किया। किन्तु नाट्य-साहित्य में स्त्री एवं निम्न-पात्रों द्वारा प्राकृत एवं अपभ्रंश का प्रयोग लगातार होता रहा, जिससे उन भाषाओं को जानने वालों के बीच संस्कृत-प्रवाह बना रहा। 
   हिन्दी-भाषा में प्रेमचन्द ने उर्दू, फारसी, अरबी शब्दों का खुलकर प्रयोग किया है। इसी प्रकार मुल्कराज आनन्द ने भी अंग्रेजी में अन्य भाषाओं के शब्दों का प्रयोग किया है। सूरदास और तुलसीदास ने भी अरबी, फारसी शब्दों का प्रयोग किया है। 
  पयादा (पैदल चलना) फारसी भाषा का शब्द है। इसे सूरदास ने प्रयुक्त किया है-
  वह घर-द्वार छाडिकै सुंदरि चली पयादे पाउं 
       (सूरसागर 488)।
 विस्तृत के अर्थ में फराख फारसी भाषा का शब्द है। इसका प्रयोग तुलसीदास ने रामचरित-मानस में किया है- 
  दूरि फराक रुचिर सो घाटा। (मानस उत्तर 29/1)। 
किन्तु इससे उन भाषाओं के स्वरूप को कोई हानि नहीं हुई। 
      आज हम पुनः उसी संधियुग में है जब न केवल विभिन्न भारतीय भाषाएँ बल्कि विदेशी भाषाएँ भी समानान्तर रूप से प्राप्त हो रही हैं। ऐसे समय में साहित्य में दूसरी भाषाओं के शब्दों का प्रयोग घातक नहीं होगा क्योंकि भाषा शब्दों से नहीं बदलती है। केवल भाषा की रूप-रचना अर्थात् व्याकरण की भिन्नता ही भाषा को बदल सकती है।इसीलिए कहा जाता है कि शब्दावली स्वयं में महत्त्वपूर्ण नहीं होती, वह तो प्रयोगान्विति और अनुभूति से संष्लिष्ट होकर ही महत्त्व पाती है।

     विदेशी एवं देशज शब्दों को रोकने में एक कठिनाई यह भी कि कुछ विदेशी शब्द तो समाज में इस प्रकार प्रचलित हो गए हैं जो उन्हीं अर्थों में रूढ़ से हो गए हैं। जैसे टेलीफोन, ट्रेन , मोबाईल, ईमेल, इन्टरनेट इत्यादि।
अगर इन्हें संस्कृतनिष्ठ  किया जायगा तो निश्चित  रूप से सहदय पाठक के रसास्वादन में बाधा होगी। उदाहरणार्थ- रामकृष्णा शास्त्री  की कविता देखिये -
भज नेतारं भज नेतारं भज "चमचा" रे
नेता माता नेता तात: नेता भगिनी नेता भ्राता।
नेताखिलविघ्नानां हर्ता नेता सर्वसौख्यविधाता।
  यहाँ चमचा शब्द को यदि संस्कृतनिष्ठ किया जायगा तो कविता का व्यंग्य ही नष्ट हो जायगा।
   साहित्यिालोचकों ने साहित्यिक रचना में अश्लीलता और ग्राम्यत्व  दोष माने हैं। इसके अतिरिक्त अयुक्तत्व, असमर्थत्व, अवाचकत्व , अप्रीतत्व  भी काव्य-रचना में दोष हैं। अतः अन्य भाषा के शब्दों का प्रयोग मात्र दोष नहीं कहा जा सकता है।
  निष्कर्षतः संस्कृतनिष्ठ शब्दों के प्रयोग में दृढ बंधन की शिथिलता अनिवार्य एवं अपेक्षित है।सृजनशक्ति के दृष्टिकोण से कला के दो मुख्य स्तर होते हैं। एक  रचनात्मक, दूसरा  अनुकरणात्मक। कवि का कार्य है कि परम्परा पर आभूत अनुकरणात्मक प्रवृत्ति जो निर्जीव होती जा रही है, उसे नये संदर्भों  तथा नये आयामों से अनुप्राणित कर सजीव करना। इसी कारण वे वाक्य एवं प्रतीक जो निस्तेज हो चुके थे, उन्हें आधुनिक कवियों ने यथार्थ अनुभूतियों एवं प्रतीको
द्वारा स्थानांतरित कर दिया। इसीलिए साहित्य की नई विधाओं में जैसे सानेट ,तान्का, शिजो आदि विदेशी छन्दों में भी सरल वाक्यों में भाव गाम्भीर्य का
अनोखा मिश्रण दिखाई पड़ता है। छोटे-छोटे वाक्यों से गागर में सागर भरते हुए केशवचन्द्र दाश द्वारा निर्मित बिम्ब विधान द्रष्टव्य है -
नाहं निक्षिप्तकन्दुकः /प्रत्यागमिष्यामि/ भूतलं संस्पृश्य/ परमेको मिमिलिषु।/ आषाडस्य  बिन्दु :।
(ईशा पृष्ठ  1 .)

        राधावल्लभ त्रिपाठी, बनमाली विश्वाल, बच्चूलाल अवस्थी, केशवचन्द्र दाश, देवर्षि कलानाथ शास्त्री, हर्षदेव माधव के बिम्ब-विधान एवं वाक्य-संरचना अत्यधिक स्वाभाविक, सरल एवं भावों की गहराई लिये हुए होती है।वहीं राजेन्द्र मिश्र की गलज्जलिका, एवं कजरी लोकगीतों के राग से आबद्ध होकर , संस्कृत-भाषा, न जानने वाले श्रोता को भी आनन्दित कर देती है।
वाक्यों में व्यंग्य एवं चुटीले वाक्य जिनका प्रयोग पारम्परिक संस्कृत में भाण एवं प्रहसन में ही दिखाई पड़ता था, आज उसका विस्तार सभी विधाओंमें प्राप्त होता है। उदाहरणार्थ-
आचार्योऽहं आचार ग्राह्यामि
आचारः सदाचारो भवेत् कदाचारो वा, न मे चिन्ता।
प्रयासकोऽहं प्रजाः प्रयास्मि
ते जीविता बुभुक्षिता मृता वा स्यु :,न मे चिन्ता।
   यह व्यंग्य पाठक पर सीधा प्रहार करता है, तो कहीं सामान्य हिन्दी के बोलचाल के वाक्यों का संस्कृत में प्रयोग अपना-सा लगता है। उदाहरणार्थ-
1. अयं दुष्टः कस्य उपवनस्य मूलिका प्रीतिः। जीतसिंह खोखर,
पृ.-31
2. कारागारस्य पवनं खादिष्यति। वही, पृ. १०
3. प्रेम नेत्रहीनं भवति। वही, पृ.१०
लोकोक्तियों का प्रयोग भी आधुनिक कवियों ने किया है-
1. भिन्नरूचिर्लोकः/ अन्तर्दाहा
हिन्दी मुहावरों का प्रयोग द्रष्टव्य है-
1. वस्तुतस्तु न  नवमणतैलं भविष्यति न च राधा नर्त्स्यति
2. नैष्कर्यं  खलु पातकम् (आराम हराम है) आख्यान-वल्लरी-
कलानाथ शास्त्री, पृ. 120
    प्राचीन कवियों के वाक्य, विशेषणों एवं समासों से युक्त और उपमा आदि अलंकारों की अधिकता से भरे होते थे। गद्य एवं पद्य दोनों में ही यह विशेषता
दिखाई पड़ती है। चाहे वह महाश्वेता का सौन्दर्य हो या स्वर्ग से उतरते नारद को देखने का चित्रण कवि की परिकल्पना सामान्य धरातल से हटकर पौराणिक एवं कल्पित उपमानों  से वर्ण्य  विषय का चित्र खींचती  है और लम्बे-लम्बे  वाक्यों के द्वारा अपने नैपुण्य एवं उर्वर कल्पना का बोध कराती है।लेकिन आधुनिक कवि छोटे -छोटे  वाक्यों द्वारा पाठक को कवि  के अनुभवों की
सह-अनुभूति कराते हैं, क्योंकि वह आधुनिक साहित्य में जीवन के यथार्थ  को उसी रूप में प्रस्तुत करते हैं, जिसकी अनुभूति उन्होंने स्वयं की है। इसीलिए
आधुनिक कवि  के सम्बन्ध में  कहा जाता है कि वह किसी विषय पर कविता नहीं करता है, उसका अनुभव ही कविता का विषय होता है।
       अतः  अतिरंजना, अति अलंकरण, रूढ  एवं पारंपरिक प्रतीक योजना एवं  क्लिष्ट  बिम्ब से रहित सरल वाक्य कवि की अनुभूति को अभिव्यक्त कर उत्कृष्ट  साहित्य की रचना में समर्थ है।
   साहित्य में भाषा के प्रयोग से जुड़े इस प्रश्न पर भी विचार आवश्यक है कि कवि  को भाषा की शुद्धता पर ध्यान देना चाहिए या समोषण पर।साहित्यकार के लिए सम्प्रेषणीयता एवं रसोपलब्धि ही इष्ट है। महाकवियों में
भी भाषागत अशुद्धि प्राप्त हो ही जाती है। किसी ने कहा है -
अपशब्दशतं  माघे  भारवौ तु शतत्रयम् ।
कालिदासेन गण्यन्ते कविरेको  धनंजयः ॥
यदि अपशब्दों के प्रयोग और अप्रयोग से कवि की महत्ता का निर्धारण होता  ,तो कतिपय अपशब्दों का प्रयोग करने वाले कालिदास कनिष्ठिका पर अधिष्ठित/  नहीं होते तथा धनंजय, जिनकी भाषा निर्दोष तो है ।लेकिन कवि के रूप में उन्हें उच्च स्थान प्राप्त नहीं है। मम्मट ने काव्य-लक्षण में  दोषराहित्य  को भी स्थान दिया था किन्तु आचार्य विश्वनाथ ने मम्मट द्वारा प्रदत्त ध्वनिकाव्य के उदाहरण में ही दोष
दिखाया है। "रसात्मकं काव्यं" की जो स्थापना आचार्य विश्वनाथ ने की है,भाषा के दृष्टिकोण से भी वही मानदण्ड सर्वोत्तम है।
फिर दूसरी बात यह भी है कि शुद्धता के निर्णय का आधार यह भी नहीं हो सकता कि प्राचीन लेखकों ने कोई प्रयोग जिस रूप में किया है, उसे ही स्वीकार करना चाहिए। पाणिनि को ही सदैव प्रमाण नहीं माना जा सकता
क्योंकि भाषा तो प्रतिक्षण परिवर्तित होती रहती है।      सत्यमेव जयते, अंतर्राष्ट्रीय आदि वाक्य एवं शब्द आज स्वीकृत हैं और इनके  प्रयोग का नियामक लोक अर्थात्  समाज है ,व्याकरण नहीं । महर्षि पतंजलि ने भी महाभाष्य में यही कहा है -

यथा घटेन  कार्यं करिष्यन् कुम्भ्कारकुलम् गत्वाह कुरु घटं कार्यमनेन 
करिष्यामीति न तद्वत् शब्दान् प्रयोक्ष्यमाणो  वैयाकरणकुलं गत्वाह -कुरु शब्दान् प्रयोक्ष्य  इति।
पाणिनि ने अष्टाध्यायी में अन्य आचार्यों  के कथन का सम्मान किया है, वहीं दूसरी ओर लोक का भी। पतंजलि ने" सिद्धे शब्दार्थ सम्बन्धे" तथा "लोकतोsर्थप्रयुक्त" वार्तिकों की व्याख्या से स्पष्ट कर दिया कि पाणिनि ने लोकव्यवहार में प्रचलित शब्दों को लेकर अपना व्याकरण बनाया है।
      आज भी इसी उद्देश्य को लेकर भाषा में परिवर्तन अपेक्षित है। भाषा सामाजिक सम्पति है, जिसमें शुद्धि तथा अशुद्धि का विचार समाज की दृष्टि से करना चाहिए।
      आधुनिक कवियों ने सरल तरल भाषा में जो उच्च कोटि की साहित्यिक रचनाएँ की हैं, उनके द्वारा संस्कृत जन जन तक पहुँचकर पुनः कन्ठहार बन  रही है। ऐसे समय में भाषा का सरल -तरल प्रवाह ही संस्कृत  भाषा को सजीव,गतिशील एवं सह्रदयों को अधिकाधिक भाव विभोर करने में समर्थ है ।
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संदर्भ सूची --
1.नैषधीयचरितम् 22/150
2-It is a consolation to reflect that even had she known
Sanskrit, she would not have been able without a
comment to understand what was said by the goddess.
-Keath
3-बनमाली विश्वाल , प्रमोद  भारतीय, हरिदत्त शर्मा , आदि।
4-आख्यानवल्लरी- देवर्षि कलानाथ  शास्त्री, कुसुमलक्ष्मी -रामचंद्र पारखी ।
5-शिवराज विजय -अम्बिकादत्त  व्यास
6-हर्षदेव माधव- एक जाग्रत चमत्कार -प्रो राधा वल्लभ त्रिपाठी  

विशेष -  अंक 15-16संयुक्तांक  ,वर्ष - 2006,पता -दृग भारती ,इलाहाबाद 
में प्रकाशित लेख 

मानसिक स्वास्थ्य प्राप्ति में पतंजलि के योग की भूमिका

          सामान्यतया स्वास्थ्य का तात्पर्य शारीरिक स्वस्थता से लिया जाता है । आजकल व्यक्ति इसी शारीरिक स्वास्थ्य को प्राप्त करने हेतु जागरूक एवं प्रयत्नशील दिखाई देते हैं ,किन्तु प्राचीन संस्कृत ग्रंथों में शारीरिक स्वास्थ्य के साथ-साथ मानसिक स्वास्थ्य को भी अत्यधिक महत्व प्रदान किया गया 

है । 

 मानसिक स्वास्थ्य का  महत्व  एवं स्वरुप -

     संस्कृत ग्रंथों के अनुसार शरीर और मन की स्वस्थता ही स्वास्थ्य है ।संस्कृत ग्रंथों की इस अवधारणा को आधुनिक चिकित्सा शास्त्री भी मानने लगे हैं । तदनुसार ही विश्व स्वास्थ्य संगठन ने स्वास्थ्य की परिभाषा दी है -

         Health is a state of complete physical, mental and social well-being and not merely the absence of disease or infirmity.
     
    अतः मानसिक स्वास्थ्य भी स्वास्थ्य सामान्य का ही अंग है । स्वास्थ्य की यह परिभाषा संस्कृत के अति प्राचीन ग्रंथ सुश्रुत संहिता में प्राप्त होती है-

    समदोषः समाग्निश्च  समधातु मलक्रियः।

    प्रसन्नात्मेद्रिय मनाः स्वस्थय इत्यभिधीयते ।।

                                               सुश्रुत सू.15/ 41

    सुश्रुत द्वारा वर्णित स्वास्थ्य की परिभाषा में 1. दोषसाम्य , अग्निसाम्य, धातुसाम्य एवं मल साम्यता स्वरूप शारीरिक स्वास्थ्य 2. आत्मा 3. इंद्रिय 4. मन की प्रसन्नता को स्वास्थ्य का लक्षण बताया गया है अर्थात पूर्ण स्वास्थ्य वही है जिसमें शरीर, इंद्रिय, आत्मा तथा मन के संयोग रूप पुरूष के चारों अंगों  की सुखावह अवस्था व प्रसन्नता हो । सुश्रुत की इस परिभाषा के अनुसार प्रसन्नात्मेद्रिय मन को हम मानसिक स्वास्थ्य की परिभाषा मान सकते हैं ।

    काश्यप खिल स्थान में भी स्वास्थ्य की परिभाषा के अंतर्गत मानसिक स्वास्थ्य का वर्णन किया गया है-

    अन्नाभिलाषो मुक्तस्य परिपाकः सुखेन च ।

    सृष्टविण्मूलत्र वातत्वं शरीरस्य लाघवम् ।।

    बलवर्णायुषी लाभः सौमनस्य समाग्निता ।

    सुप्रसन्नेन्द्रियत्वं च सुखस्वप्नप्रबोधनम् ।

    विद्यादारोग्यलिंगानि विपरीते विपर्ययम् ।।

    काश्यप खिलस्थान में अन्नाभिलाष , परिपाक, विण्मूत्र वात यथोति प्रवाह, शरीर में लघुता तथा समाग्निता शारीरिक स्वास्थ्य के लक्षण हैं और बल, वर्ण तथा आयुष्य, वस्तुतः स्वस्थ रहने के ही परिणाम है । ’’सुप्रसन्नेन्द्रियत्वम् तथा ’’ सुखस्वप्न प्रबोधनम्’’ के द्वारा मानसिक स्वास्थ्य को परिभाषित किया गया है ।

    आज शारीरिक स्वास्थ्य के प्रति प्रत्येक व्यक्ति अत्यधिक सचेष्ट है किंतु आधुनिक समय में बढ़ते हुए मानस रोगों तथा हासोन्मुख मानस स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के संदर्भ में यह आवश्यक है कि हम मानसिक स्वास्थ्य की प्राप्ति के लिये भी प्रयत्नशील होंवे ।

     मानसिक स्वास्थ्य की स्थिति के कारण ही एक समस्या पर विभिन्न व्यक्ति भिन्न-भिन्न प्रकार से प्रतिक्रिया करते हैं । कुछ व्यक्ति परेशान या उद्वेलित हो जाते हैं जबकि कुछ बिना परेशान हुए समझदारी से धैर्य धारण कर उसका निराकरण करते हैं । कुछ व्यक्ति हीन-भावना से ग्रसित होते हैं । कुछ शीघ्र ही निराशा, अवसाद, तनाव, चिंता से घिर जाते हैं । ऐसे व्यक्ति न तो बीमार हैं और न ही असामान्य बल्कि वे मानसिक दृष्टि से स्वस्थ नहीं हैं । 

    मनोविज्ञान एवं चिकित्सा शास्त्र में मानसिक विकारों को समाप्त करने एवं विकारों के उत्पन्न न होने के दृष्टिकोण से ही विचार किया गया है अर्थात् विकारों के निषेधात्मक पक्ष पर ही यहां विश्लेषण किया गया है । इसके विपरीत आयुर्वेद एवं संस्कृत ग्रंथों में मानसिक स्वास्थ्य पर सुधारात्मक के साथ-साथ सृजनात्मक दृष्टिकोण से भी विचार किया गया है तथा आत्म नियंत्रण, आत्मानुशासन, इच्छाशक्ति ,will power  आदि प्राप्त करने हेतु अधिक बल दिया गया है तथा उसे आध्यात्मिकता से संबंधित माना गया है ।

    अतः स्पष्ट है कि आयुर्वेद तथा संस्कृत ग्रंथों में रोग प्रशमन की अपेक्षा स्वास्थ्य रक्षण पर अधिक बल दिया गया है तथा इसे आध्यात्मिकता  ,spirituality से संबंधित माना गया है । संस्कृत ग्रंथों एवं आयुर्वेद में मानसिक स्वास्थ्य के संबंध में जो उद्धरण प्राप्त होते हैं, उससे शारीरिक स्वास्थ्य के साथ-साथ मानसिक स्वास्थ्य का महत्व सुस्पष्ट है । 
         मनुष्य में वासनाए (instincts) प्राकृत रूप से रहती है तथा ये वासनाएं  वाह्य जगत की संवेदनाओं से प्रबल होकर वेगों (impulses) के रूप में प्रकट होती हैं । इन आवेगों से शरीर तथा मन दोनों ही प्रभावित होकर ही इच्छा का रूप धारण कर लेते हैं । इच्छित पदार्थ की प्राप्ति हो जाने पर तो ये इच्छाएँ  तत्काल शांत हो जाती हैं।परंतु अभीष्ट पदार्थों की प्राप्ति न होने पर दो प्रकार के अहितकर परिणाम सामने आते हैं।

01- व्यक्ति असत्य, कपट, छल आदि अनुचित उपायों का सहारा लेता है या फिर
02-यदि व्यक्ति अपनी इच्छा शक्ति का दमन करता है तो वहां अंतर्द्वन्द की उत्पत्ति होती है । 
   ये दोनों ही स्थितियां मानसिक स्वास्थ्य के लिये अत्यंत अहितकर हैं ।
     मनुष्य को सदैव ही मनोनुकूल परिस्थिति प्राप्त नहीं हो सकती और न ही उसकी समस्त इच्छाओं की पूर्ति संभव है ।अतः अनैतिकता या अंर्तद्वन्द की संभावना सदैव बनी रहती है । इन परिस्थितियों में भी हमारा संतुलन न बिगड़े एवं हमारा रूख निषेधात्मक न होकर सकारात्मक ही रहे यही मानसिक स्वास्थ्य है ।
           मानसिक स्वारथ्य दो तत्वों के समन्वय से प्राप्त होता है प्रथम मन में सकारात्मक विचार जैसे-सत्य , अहिंसा, प्रेम,  त्याग आदि हो और द्वितीय निषेधात्मक विचार जैसे काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि का त्याग । 
   इन दोनों तत्वों के संतुलन अर्थात् प्रथम की स्थिति तथा द्वितीय का निषेध के द्वारा ही मानसिक स्वास्थ्य परिपुष्ट होगा ।
   

मानसिक स्वास्थ्य प्राप्ति में पतंजलि के योग की भूमिका  -

        महर्षि पतंजलि ने योग की अत्यंत वैज्ञानिक परिभाषा दी 
है -
       योगश्चितवृत्ति निरोध; 
     अर्थात् चित्तवृत्ति का निरोध ही योग है । 
    यहां यह स्पष्ट करना आवश्यक है  कि पतंजलि के अनुसार वृत्तियों का अभाव मात्र ही योग नहीं है बल्कि चित्त की संस्कार मात्र शेष अवस्था  को  निरोध कहा गया है । ऐसी स्थिति में बाह्य संपर्क से रहित होने से जीवात्मा त्रिगुणातीत हो जाता है । ऐसी स्थिति में जीवात्मा की अपने स्वरूप में स्थिति हो जाती है-    
        तदा द्रुष्टुः स्वरूपे sवस्थानम् ।
        
      सामान्यतः चित्त वृत्ति के निरोध से तात्पर्य है चित्तवृत्ति पर नियंत्रण ।चित्तवृत्ति पर यह नियंत्रण अनेक स्तरों (Stages)में होता है । प्रथम सूत्र की व्याख्या करते हुए व्यास भाष्य में चित्त के भेद या भूमियों के अंतर्गत इसे स्पष्ट किया गया है| चित्त की इस पांच भूमियों क्षिप्त, मूढ, विक्षिप्त, एकाग्र एवं निरूद्ध में कुछ न कुछ निरोध आवश्यक रहता है । सर्वप्रथम व्यक्ति के तमोगुण का निरोध होगा फिर  रजो गुण एवं सत्व गुण का, तत्पश्चात् सत्वगुण का निरोध होगा । तत्पश्चात् क्रमश:  सभी वृत्तियों का एवं अंत में ध्येयाकार वृत्ति का भी निरोध हो जाता 
है । चित्त की अंतिम दो अवस्थाएं मानसिक रूप से स्वस्थ पुरुषों में मिलती हैं तथा प्रथम तीन अवस्थाएं मानसिक रोगियों में मिलती हैं । अतः योग द्वारा मानसिक रोगियों से ग्रस्त व्यक्ति 

चित्तवृत्ति का निरोध कर मानसिक स्वास्थ्य की प्राप्ति हेतु अग्रसर हो सकता है ।
        चित्त की वृत्तियां अनेक हैं अतः किन वृत्तियों का निरोध करना चाहिये ? इसे स्पष्ट करते हुए पतंजलि ने कहा है-
        प्रमाण विपर्यय निद्रा स्मृतयः । पां0 सू० 1/6 
        अर्थात इन पांच वृत्तियों का निरोध करना चाहिए । ये वृत्तियां क्लेष्ट एवं अक्लिष्ट रूप से दो प्रकार की हैं ।राजसी तामसी प्रवृत्तियां ईर्ष्या, लोभ एवं क्रोध  आदि क्लिष्ट वृत्तियां हैं तथा सात्विक वृत्तियां चित्त की निर्मलता, प्रसन्नता और परोपकार की भावना आदि अक्लिष्ट वृत्तियां हैं । अतः व्यक्ति की समस्त क्रियाएं इन्हीं क्लिष्ट एवं अक्लिष्ट वृत्तियों के निरोध द्वारा समाप्त हो जायेंगी ।

      इन चित्तवृत्तियों के सर्वथा निरोध के लिये दो उपाय आवश्यक हैं -
     1, वैराग्य, 
     2 अभ्यास । 
   चित्तवृत्तियों   का प्रवाह परंपरागत संस्कारों के बल से सांसरिक भोगों की ओर चलता रहता है । इस प्रवाह को रोकने का उपाय वैराग्य है । सर्वप्रथम विषयों की परिणाम में विरसता तथा दुखरूपता देखकार उनके प्रति वैराग्य होता है । वैराग्य से
चित्त का स्वाभाविक अनादि विषयाभिमुख बहि: प्रवाह रोका जाता है ।फिर विवेक ज्ञान के अभ्यास से अंतराभिमुख प्रवाह किया जाता है । अतः चित्त को कल्याण मार्ग में ले जाने का उपाय अभ्यास है । स्वभाव से ही चंचल मन को किसी एक ध्येय में स्थिर करने के लिए बार बार चेष्टा करते रहने का नाम अभ्यास है । योग की पूर्ण साधना के लिये आठो अंगों को कमशः अभ्यास आवश्यक है ।

                  योग एवं उसके विभिन्न चरण - 
    
     1-यम एवं नियम - पतंजलि ने अहिंसा, सत्य, अस्तेय , बह्मचर्य  और अपरिग्रह इन पांचों को यम बतलाया गया है तथा इसे सार्वभौम महाव्रत कहा गया है ,क्योंकि ये पांच यम  जाति, देशकाल एवं समय से बंधे हुए नहीं हैं । इन पांच यमों का पालन करने से हिंसा, झूठ, चोरी, व्याभिचार और लोभ इन पांच दुष्प्रवृत्तियों का नाश होता है ।जो व्यक्ति तथा समाज दोनों को प्रभावित करती हैं।पवित्रता, संतोष, तप,स्वाध्याय  और ईश्वर प्राणिधान इन पांच नियमों के द्वारा व्यक्ति में सकारात्मक उर्जा उत्पन्न होती है । अहंकार ,काम, क्रोध  , लोभ, ईर्ष्या आदि आंतरिक दुर्गुणों को त्यागने से भीतरी पवित्रता होती है । सुख -दुख, हानि -लाभ, यश -अपयश, जय -पराजय आदि के प्राप्त होने पर भी सर्वदा प्रसन्नचित रहना संतोष है । मन और इंद्रियों से संचयरूप धर्मपालन के लिये कष्ट सहना एवं व्रत आदि का नाम तप है । अतः मलिनता, बेचैनी, आलस्य, अज्ञान और नास्तिकता को दूर करने के लिये नियमों का विधान है।
           अतः यम और नियम के द्वारा मन पवित्र और निर्मल होता है तथा नैतिक मूल्यों के विकास की योग्यता प्राप्त कर सकता है ।
2-आसन एवं प्राणायाम- आसान एवं प्राणायाम से मनुष्य की शारीरिक एवं मानसिक क्षमता विकसित एवं संतुलित होती है । शारीरिक विकारों के फलस्वरूप मानसिक विकारों की उत्पत्ति हो सकती है । आसनों के द्वारा शारीरिक विकार दूर होते हैं तथा शरीरिक स्वस्थता प्राप्त होती है । प्राणायाम मूलतः श्वास प्रश्वास से संबद्ध है जो श्वासों को नियमित करके जीवन शक्ति बढ़ाता है जिससे कायिक, मनोकायिक एवं मानसिक समस्याएं ,जैसे -निराशा ,चिंता आदि दूर होती है । शरीर में आक्सीजन संतुलन बनाने ,शरीर एवं मन को स्वस्थ रखने  तथा मन को केन्द्रित करने में प्राणायाम की भूमिका महत्वपूर्ण है।जिससे मन स्थिर होकर धारणों के योग्य सामर्थ्य प्राप्त  करता है । 

प्रत्याहार, धारणा ध्यान और समाधि -प्रत्याहार प्रधानतः इद्रिय निग्रह का उपाय है ।प्रत्याहार से इंद्रियां वश  में हो जाती है अर्थात साधक को इंद्रियों पर पूर्ण अधिकार प्राप्त हो जाता है । उसके बाद की प्रक्रियाएं, धारणा, ध्यान तथा समाधि पूर्ण रूप से मानसिक तथा आध्यात्मिक नियमन की साधना है।

   आजकल अधिकांश व्यक्ति आसन और प्राणायाम को ही योग समझते हैं और उसके द्वारा प्राप्त शारीरिक स्वस्थता को ही स्वास्थ्य मानते हैं तथा उसी का अभ्यास करते हैं तथा शेष अंगों को छोड़ देते हैं । जबकि पतंजलि योग में शरीर के साथ मन पर नियंत्रण के अभ्यास द्वारा मानसिक स्वस्थता प्राप्त होती है ।यही कारण है कि  मानसिक तनावजन्य समस्याओं के समाधान में ध्यान के द्वारा मन पर व्यापक लाभकारी प्रभाव होता है ।यह बात योग पर हुए अनेक अध्ययनों से सिद्ध होती 
है ।
    वस्तुतः योग के द्वारा शारीरिक एवं मानसिक रोगों से बचाव भी  होता है और उपचार भी ।
       पतंजलि ने चित्तविक्षेप एवं सहविक्षेपों के अंतर्गत मानसिक विकारों का वर्णन किया है 1. व्याधि 2. स्त्यान 
3. संशय 4. प्रमाद 5 आलस्य 6 अविरक्ति 7.भ्रांति 8. दर्शन 
9. अलब्धभूमिकत्व और 9 अनवस्थितत्व-ये नौ चित्तविक्षेप कहे गये हैं ।(    )
   इन नौ चित्तविक्षेपों के अतिरिक्त पांच सहविक्षेपों का भी उल्लेख किया गया है । (6)


1-अभ्यास वैराग्याभ्यां तन्निरोधः ।योग सूत्र  1:12
2. तत्र स्थितौsयत्नो sभ्यासः ।योग सूत्र  1:13,
3-सूवीजालनरन्तसलीयासपितो इसका
|:14
 4 यमनियमासन प्राणायामप्रत्याहार धारणा ध्यान समाध्यो डएटावडिगानि। योग सूत्र  2:29
IA.व्याधिस्त्यानसंशयप्रमादालस्याविरतिभ्रांति
दर्शनाबलब्धभूमि कत्वानविस्थतवानि
चित्तविक्षेपास्ते ड तराया : यो.सू.1530
16 दुखदौर्यनस्याडगमेसयत्व श्वासप्रश्वासाविक्षेप सहयुवः 1631


   
     

भक्ति रस और साधारणीकरण

         भारतीय जीवन में भक्ति की अत्यन्त प्रमुख भूमिका रही है। यही कारण है कि प्राचीनकाल से ही भक्ति साहित्य की परम्परा हमें अनवरत रूप से प्राप्त होती है जिसका चरमोत्कर्ष हमें 15वीं से 17वीं शती (जो भक्ति आन्दोलन के नाम से प्रसिद्ध है) के साहित्य में प्राप्त होता है।

         संस्कृत अलंकार शास्त्रियों ने भक्ति को न तो नौ स्थाई भावों के अन्तर्गत माना और न ही नवरसों में। उन्होंने भगवद भक्ति से अनुभूत होने वाले रस को भाव की संज्ञा प्रदान की।
पण्डितराज जगन्नाथ ने भक्ति को रस मानने की ओर विचार अवश्य किया किन्तु अन्ततः उन्होंने भी पारम्परिक अलंकार शास्त्रियों का ही अनुसरण किया। भक्ति आन्दोलन से प्रभावित हो, भक्ति को मौलिक चित्तवृत्ति मानने वाले आचार्यों को स्थाई भाव एवं रस के रूप में भक्ति की गणना का होना अनुचित प्रतीत हुआ। अत: प्रमुख रूप से रूपगोस्वामी (1)एवं मधुसूदन सरस्वती(2) ने भक्ति की स्थाई भाव एवं सर्वोत्तम रस के रूप में प्रतिष्ठित करने का प्रयास किया। इस प्रकार संस्कृत अलंकार शास्त्र में भक्ति को लेकर दो दृष्टियाँ उपस्थित हुई—एक केवल भाव के रूप में और दूसरा रस के रूप में। भक्ति को रस मानने
वाले आचार्यों ने भरत के रस सूत्र के परिप्रेक्ष्य में ही भक्ति को रस कोटि में स्थापित किया है उन्होंने विभाव, अनुभाव, व्यभिचारीभाव एवं सात्विक भावों की व्याख्या भरत के अनुरूप ही की है(3)। साथ ही साथ इन आचार्यों का कथन है कि काव्य तथा नाट्य में विभावादि साधारणीकृत भी होते हैं : यहाँ यह विचारणीय है कि भक्ति रस की स्थिति में साधारणीकरण का स्वरूप क्या होगा?

     काव्य में वर्णित दुष्यान्तादि पात्रों को साथ किस प्रकार तादात्म्य स्थापित कर सहदय उनके भावों का आस्वाद करते है ,यह काव्य शास्त्र का अत्यंत मौलिक प्रश्न है । इस तादात्म्य में कठिनाई यह है कि काव्य में वर्णित पात्रों और सहृदय के मध्य देश, काल, जाति, लिंग आदि का व्यवधान रहता है । इसका समाधान अलंकार शास्त्रियों ने साधारणीकरण के द्वारा किया 
है । अलंकार शास्त्रियों के समान ही वैष्णव आचार्यों ने भी इसी साधारणीकरण के द्वारा भक्ति रस की निष्पत्ति की चेष्टा की है। (4)

      यहाँ यह प्रश्न उठता है कि क्या प्राचीन अलंकार शास्त्रियों द्वारा सम्मत साधारणीकरण के अर्थ से भक्ति रस की निष्पत्ति हो सकती है अथवा नहीं ?

    साधारणीकरण का सर्वप्रथम उल्लेख भट्टनायक ने किया 
है । भट्टनायक  के मत को काव्य प्रकाश में उद्धृत  करते हुये मम्मट कहते हैं-
      न     ताटस्थ्येन  नात्मगतत्वेन  रसः  प्रतीयते  नोत्पद्यते 
 नाभिव्यज्यते, अपितु    काव्ये    नाट्ये  चाभिधातो द्वितीयेन
 विभावादिसाधारणीकरणात्मना     भावकत्वव्यापारेण
भाव्यमानः स्थायी सत्वोद्रेकप्रकाशानन्दमयसंविद्विश्रान्तिसतत्वेन भोगेन भुज्यते, इति भट्टनायकः ।

काव्य प्रकाश के टीकाकार गोविंद ठक्कुर ने भट्टनायक द्वारा प्रयुक्त साधारणीकरण को स्पष्ट  करते हुये कहा-
 साधारणीकरणं चैतदेव यत्सीतादिविशेषणां कामिनीत्वादिसामान्येनोपस्थितिः । स्थाय्यनुभावादीनां   च
संबंधिविशेषानवाच्छिन्नत्वेन ।
( काव्य प्रकाश टीकाकार गोविंद ठक्कुर, निर्णय सागर प्रेस पृ0 66)
अर्थात् साधारणीकरण से अभिप्राय है सीतादि विशेष पात्रों का कामिनी आदि सामान्य रूपों में उपस्थित होना है । स्थायी भाव और अनुभाव के साधारणीकरण का आशय है विशिष्ट संबंधों से मुक्ति ।
भट्टलोल्लट के साधारणीकरण के इसी सिद्धान्त का विकास अभिनवगुप्त में पाया जाता है | उनका मत है-
ममैवैते शत्रोरेवैते ,तटस्थत्यैवैते, न ममैवेते , न शत्रोरेवैते, न तटस्थस्यैवैते, इति संबंधविशेषस्वीकारपरिहारनियमानध्यवसायात् साधारण्येन प्रतीतैः विभावैः -----अभिव्यक्त :।

नागेश्वरी टीका में साधारण्येन की " साधारण्येन सीतात्वादिविशेषांशरहितेन कामिनीत्वादिना "-
-इस रूप में व्याख्या की गयी है।

       साधारणतया सभी व्याख्याकारों ने उपर्युक्त अर्थ के तुल्य ही साधारण्येन का अर्थ सामान्येन किया है । कहने का तात्पर्य यह है कि उनके मत में दुष्यन्त को दुष्यन्तत्व और शकुन्तला के शकुन्तलात्व का परिहार हो जाता है । जिसके फलस्वरूप "सामान्यरूपेण" यह कामिनी है - इस प्रकार कामिनीत्वादि रूप में शकुन्तला की प्रतीति हो जाया करती है । उल्लेखनीय है कि इसी साधारणीकरण की सिद्धि के लिये भट्टनायक ने अभिधा के अतिरिक्त भावकत्व व्यापार की कल्पना की थी।
       परन्तु साधारणीकरण का उपर्युक्त अर्थ विशेषकर वैष्णवों के भक्तिरस के संबंध में चरितार्थ नहीं हो पाता है क्योंकि रूपगोस्वामी और मधुसूदन सरस्वती जैसे वैष्णव आचार्यों ने भक्ति रस के आस्वादन में चित्त की गोविन्दाकारता को अपरिहार्य माना गया है । अतः उनके अनुसार रसास्वादन मे भी कृष्ण के कृष्णत्व का परिहार संभव नहीं है । अगर परिहार मान लिया जाय तो गोविन्दाकारता नहीं होगी और तब भक्ति का रसत्व खण्डित हो जायेगा । कहने का तात्पर्य यह है कि कृष्ण विषयक गोपी निष्ठ रति का आस्वाद करते समय यदि कृष्ण का कृष्णत्व और गोपी का गोपीत्व सर्वथा दूर हो जायेगा ; तब कृष्ण सामान्य पुरूष रूप हो जायेंगे । ऐसी स्थिति में गोविन्दाकारता के बजाय पुरुषमात्राकारता एवं स्त्रीमात्राकारता ही होगी । फलस्वरूप कृष्ण के प्रति स्त्री मात्र की रति होने के कारण लौकिक श्रृंगार से भिन्न, भक्ति रस की भूमिका नहीं बन पायेगी।

      प्राचीन अलंकार शास्त्रियों ने भक्ति  को रस नहीं अपितु भाव माना है । वहाँ साधारणीकरण का सामान्येन अर्थ करने से बाधा नहीं उत्पन्न होती क्योंकि वहां यदि भगवान सामान्य रूप में भी हो जाये तो भी रस निष्पत्ति हो जाया करती है।

   विश्वनाथ और (पंडितराज) जगन्नाथ ने साधारणीकरण का अर्थ किया है - तन्मयीभवन्।
   उनके अनुसार प्रमाता का आश्रय के साथ तादात्म्य हो जाता है । उन्होंने लौकिक परिस्थिति के साथ-साथ देवादि से भी तादात्म्य माना है (5)| भक्ति के परिप्रेक्ष्य में यह स्थिति कदापि संभव नहीं है। क्योंकि भक्ति में द्वैत  का भाव प्रमुख होता है। दूसरी ओर यदि प्रमाता स्वयं में कृष्ण का अभिमान
करने लगेगा तो भक्ति रस की संभावना नहीं होगी । भक्ति रस के परिप्रेक्ष्य में तन्मयीभवन्  भी साधारणीकरण का अर्थ नहीं हो सकता ।

     उपर्युक्त विवेचन से यह स्पष्ट है कि सामान्य और तन्मयीभवन् को साधारणीकरण का अर्थ का मान लेने से भक्ति रस के क्षेत्र में अव्याति हो जाती है, अतः साधारणीकरण का उपर्युक्त अर्थ उचित नहीं है।

    साधारणीकरण को विद्वानों ने अस्वीयत्वाग्रह के रूप में भी परिभाषित किया है। अस्वीयत्व का अर्थात् अपने न होने आग्रह अर्थात् भानाभाव ही साधारणीकरण है उदाहरण के रूप में कह सकते हैं कि दुष्यन्त हो या कृष्ण, शकुन्तला हो या राधा, रसास्वाद के समय ये सामाजिकों के अपने
नहीं हैं ऐसे ज्ञान का अभाव हो जाता है । इसका यह अर्थ कदापि नही हैं कि वे अपने हैं। इसी को स्वपर संबंध से अनालिंगित कहा गया है ।मधुसूदन (6)एवं रूपगोस्वामी (7)का भी यही मत है ।ऐसी स्थिति होने पर यह भाव सामान्य नहीं होते जैसा कि विद्वानों ने माना है । अपितु सार्वजनिक हो जाते हैं तथा इस रूप  में ही समस्त पाठक अथवा दर्शक को रस की प्रतीति कराते है ।कहने का तात्पर्य यह है कि रस की स्थिति में कृष्ण का राधा के प्रति प्रेम आदि रससबंध- विशेष का परिहार हो जाता है किन्तु कृष्ण के सार्वजनिक लोकोद्धारक    रूप का परिहार नहीं होता है और वह उसी रूप में भक्ति रस की अनुभूति कराते हैं ।   साधारण का अर्थ सार्वजनिक भी होता है ऐसा प्रसिद्ध ही है।(8)
 ऐसा अर्थ लेने से रसों में रसनिष्पत्ति में बाधा भी नहीं उत्पन्न होती है।
अतः साधारण्येन से अस्वीयत्वाग्रहजनित- सार्वजनिकत्वेन ऐसा अर्थ लेना संगत है।

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सन्दर्भ सूची

1. रूपगोस्वामी कृत भक्तिरसामृत सिन्धु एवं उज्ज्वलनीलमणि।
2- मधुसूदन  सरस्वती कृत भगवद्भक्ति रसायन।
3- विस्तार के लिए देखिये भक्ति रसामृत सिन्धु दक्षिण विभाग एवं भगवद्भक्तिरसायन  तृतीय उल्लास
4. ज्ञातृस्वपरसम्बन्धादन्ये साधारणात्मना।
अलौकिकम् बोधयन्ति भावम् भावास्त्रयोऽप्यमी
भगवद्भक्ति रसायन 3/11
यत्र साधारणतया भावाः साधुस्फुरंत्यमी 
एषां स्वपरसम्बन्धनियमनिर्णयोः हि यः।
साधारण्येन तदेवो भावानां पूर्वसूरिभिः।
भक्ति रसामृतसिन्धु ,दक्षिण विभाग ,पंचम लहरी 83

5-व्यापारोsस्ति विभावादेर्नाम्ना साधारणीकृतिः ।3.9 11
तत्प्रभावेण  यस्यासंपाथोधिप्लवनादयः ।
प्रमाता तदभेदेन स्वात्मानं प्रतिपद्यते  ।। 3.10 II
उत्साहादिसमुद्बोधः साधारण्याभिमानत: ।
नृणामपि समुद्रादिलंघनादौ  न दुष्यति ।। 3.11 11
विश्वनाथ कृत साहित्यदर्पण
विस्तार के लिये देखिये डॉ० नगेन्द्र - रस सिद्धान्त
6-भगवद्भक्ति रसायन 
7-रूपगोस्वामी कृत भक्तिरसामृत सिन्धु
.8-संस्कृत हिंदी कोश - आप्टे

विशेष --JournalOf The Ganganath Jha Kendriya Sanskrit Vidyapeeth Allahabad,vol  62(1-4)  Jan -Dec 2006 ,में प्रकाशित

प्रोफेसर राधा वल्लभ त्रिपाठी शास्त्र से लोकधर्म तक



           यह सर्वविदित है कि पतंजलि द्वारा वर्णित सामग्री का स्रोत अनेक स्थानों पर पाणिनि ही है । पाणिनी के 8.2,83 सूत्र -'प्रत्यभिवादे शूद्रे' के अनुसार छोटो के द्वारा बड़ो को प्रणाम करने पर बड़ो की ओर से किये प्रत्यभिवादन में शूद्र के लिए प्लुत नहीं किया जाता था । उदाहरणार्थ यदि देवदत्त गुरू को प्रणाम करता प्रत्याभिवादन में गुरू कहता -'भो
आयुष्मानेधि देवदत्ता 3 | इस वाक्य में गुरू देवदत्त के अंतिम स्वर को प्लुत बोलता किंतु यदि शूद्र प्रणाम करता तो उसे आशीर्वाद मिलता-' आयुष्मानेधि तुषजक' । तब तुषजक का अंतिम स्वर प्लुत नहीं किया जाता | पतंजलि ने इसी प्रत्यभिवादन के नियम में स्त्रियों का उल्लेख किया और उनके प्रणाम के उत्तर में भी प्लुत नहीं किया जाने लगा । व्याकरण के प्रयोजन पर विचार करते समय पतंजलि के महाभाष्य में वर्णित है-
अविद्वास: प्रत्यभिवादे नाम्नो ये न प्लुतिम विदुः ।
काम तेषु तु विप्रोष्य स्त्रीष्विवायमहं वदेत् ।
अभिवादे स्त्रीवन्मा भूमेत्यध्येयं व्याकरणम्। (1)
अर्थात् अभिवादन करते समय हम स्त्रियों के समान व्यवह्नत न किये जाए इसलिए व्याकरण पढ़ना चाहिए ।
 
वस्तुतः पतंजलि का यह कथन हमें यह सोचने के लिए बाध्य करता है कि
(क)पतंजलि कालीन समाज में स्त्री एवं स्त्री शिक्षा की क्या स्थिति थी ? क्योंकि
(1)पाणिनी ने तोवकेवल शूद्रो का उल्लेख किया था लेकिन पतंजलि स्त्री का उल्लेख कर रहे हैं तथा(!!) जो प्लुत उच्चारण करना नहीं जानते हैं वे अविद्वान होते हैं । अतः क्या यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि पतंजलि के समय में स्त्रियों को शिक्षा अप्राप्त थी जिस प्रकार प्राचीनकाल में शूद्रों के लिये वेदाध्ययन तथा शिक्षा निषिद्ध थी ? (ख) क्या इसके द्वारा समाज में स्त्रियों की निम्न दशा का ज्ञान होता है ? जैसा कि अग्निहोत्री जी आदि कुछ
विद्वानों का मत है।(ग) पतंजलि ने प्रत्यभिवादन नियम में शूद्रों के स्थान पर स्त्री शब्द का प्रयोग क्यों किया?

(क)प्रथम प्रश्न पर विचार करने पर ज्ञात होता है कि पतंजलि कालीन समाज में स्त्रिया शिक्षित थी । पतंजलि महाभाष्य से यह स्पष्ट है कि चरण वैदिक शिक्षण संस्था थी जिसमें वेद की एक शाखा का अध्ययन शिष्य समुदाय करता था । अतः ये वैदिक विद्यापीठ थे । पतंजलि के महाभाष्य से यह भी स्पष्ट होता है कि स्त्रियां भी चरणों में प्रविष्ट होती थी एवं अध्ययन करती थी । साथ ही साथ चरणों के नाम से स्त्रियों के नामकरण की प्रथा का उल्लेख भी हुआ है-
जातेरस्त्री विषयादयोपधात्' 
सूत्र मे जातिवाचक स्त्री नामो मे गोत्र और चरणवाची नामो का ग्रहण होता है। कशिका में कठी और वह्नची उदाहरण प्राप्त होते है । कठी का तात्पर्य है कृष्ण यजुर्वेद के कठ चरण में विद्या अध्ययन करने वाली स्त्रियां। इस प्रकार वह्नची नामक ऋग्वेद के चरण में अध्ययन करने वाली ब्रहमचारिणी कन्याएँ वह्रची कहलाती थी । चरणों में अध्ययनरत छात्राओं को छात्र के समान ही सम्मानित एवं उपाधि से विभूषित किया जाता है । उदाहरणार्थ कठ चरण में प्रविष्ट स्त्री कठी उनमें जो विशेष सम्मानित होती वह पूज्यमान कठी और जो अग्रपाद भी अधिकारिणी होती वह कठवृन्दारिका कहलाती थी । भाषा में कठमानिकी विशेषण के प्रयोग से स्पष्ट है कि कठ चरण की सदस्या होने के कारण वह गौरवान्वित अनुभव करती थी । गार्ग्य और कठ चरणे की प्रतिष्ठा विद्वत्वर्ग में बहुत अधिक थी ।कुमारियां बाल्यकाल से ही दीक्षा लेकर श्रमणा और प्रव्रजिता का जीवन बिताती थी।(2)। कुछ कुमारी रहकर अध्यापिका का काम करती थी । पतंजलि ने आचार्या और उपाध्यायी का उल्लेख किया है । उपाध्यायी या उपाध्याय वे स्त्री अध्यापिकाएं थी जिनके पास पढ़ने के लिए बाहर से छात्र आते थे (3)। लोकायत सम्प्रदाय की व्याख्यात्री वर्णिका
या वर्तिका नामक आचार्या का भी भाष्य में उल्लेख मिलता है(4)। उदमेथ गोत्र की अध्यापिका औदमेध्या का उल्लेख भी प्राप्त है जिसके शिष्य औदमेध कहलाते थे । अतः
कुमारी श्रमणाएं, (5)प्राजिताएं और तापसियां तथा कुमारी अध्यापिकाएं और पण्डिताएं समाज में विद्यमान थीं, इसमें संदेह नहीं ।
निष्कर्षतः पतंजलि काल में स्त्रियां शिक्षित होती थी ।
(ख), पतंजलि के प्रत्यभिवादन सूत्र से डॉ0 प्रभुदयाल अग्निहोत्री (6) आदि विद्वानों ने यह निष्कर्ष निकाला है कि इस सूत्र के द्वारा स्त्रियों की निम्न दशा का ज्ञान होता है |
किंतु महाभाष्य से यह स्पष्ट है कि स्त्रियों को धन, यज्ञ, परिवार एवं समाज में अधिकार प्राप्त थे । विवाह के पश्चात् स्त्री, पति के पद एवं प्रतिष्ठा की अधिकारिणी होती थी (7)। जैसे कि महामात्र की स्त्री महामात्री, आचार्य की पत्नी आचार्याणी, मातुल की स्त्री मातुली । वर चुनने का भी अधिकार कन्या को प्राप्त था (8)। स्त्रियां पति के साथ यज्ञ
करने के कारण की पत्नी कहलाती थी- पत्नीव पत्नी (महा0 4.1.33) अर्थात पति के साथ यज्ञकर्म करके उसकी सहधर्मणी होती थी इसलिए पतंजलि का कथन है -पत्य उर        संयोगे यज्ञसंयोग इत्यूच्यते तत्रेदं न सिद्धयति इयमस्य पत्नी । अयं तार्हे स्यात् ? पत्नीहै । उपाध्यायी या उपाध्याय वे स् इति यत्र यज्ञसंयोगः - एवमपि तुषजकस्य पत्नीति न सिद्धयति । उपमानात् सिद्धम् ।
पलीव पत्नी/4/1/33
तुषजक अर्थात शूद्रों को यज्ञ में अधिकार नहीं था । अतः स्पष्ट है कि स्त्रियों को शिक्षा के साथ ही साथ समाज में अन्य अधिकार भी प्राप्त थे । इसलिये यह कथन
युक्तियुक्त नहीं है कि प्रत्यभिवादन सूत्र से स्त्रियों की निम्न दशा का ज्ञान होता है ।
(ग) अब प्रश्न यह उठता है कि पतंजलि ने व्याकरण के महत्व को प्रतिपादित करते समय प्रत्याभिवादन नियम में शूद्रो के स्थान पर स्त्री का प्रयोग क्यो किया ? मेरे मतानुसार
पतंजलि के द्वारा किया गया यह परिवर्तन अत्यंत सोच समझ कर किया गया परिवर्तन है जो व्याकरण के महत्व एवं उनकी दूरदृष्टि को द्योतित करता है । पतंजलि के समय
ब्राहमणों का बोलबाला था तथा शूद्रों के लिए अध्ययन निषिद्ध था । महाभाष्य में वे कहते है अविद्वान अर्थात व्याकरण ज्ञान से रहित व्यक्ति को ह्रस्व दीर्घ प्लुत का भी ज्ञान नहीं होगा जिससे वह अभिवादन का ठीक उत्तर नहीं दे पायेगा और उसकी स्थिति स्त्रियों के समान होगी । यहाँ स्त्री शब्द के द्वारा पतंजलि कहना चाहते थे कि सामान्य स्त्री के व्याकरण ज्ञान से रहित होने के कारण स्त्री और शूद्रों को प्लुत नियम का ज्ञान नहीं होगा इसलिए प्लुत उच्चारण रहित प्रत्यभिवादन का नियम था लेकिन पतंजलि इसके साथ साथ ही यह भी कहना चाहते है कि अगर कोई दूसरा व्यक्ति( जो पुरुष भी हो सकता ह)प्लुत उच्चारण करना नहीं जानता है तो उसके प्रति भी वैसा ही संबोधन करे अर्थात प्लुत उच्चारण के बिना ही प्रत्याभिवादन करें ।अतः स्पष्ट है कि पतंजलि के अनुसार प्रत्यभिवादन करते समय यह देखा जायें कि प्रत्यभिवादन करने वाले व्यक्ति को व्याकरण ज्ञान है अथवा नहीं तथा उसी के अनुसार प्रत्यभिवादन किया जायें । यहाँ स्त्री शब्द तो केवल उपलक्षण मात्र है व्याकरण न जानने वालों के प्रति ,न कि इसके द्वारा स्त्रियों की स्थिति का बोध होता है ।पंतजलि कहते है जो प्लुत उच्चारण नहीं जानते हैं वे अविद्वान होते हैं अर्थात् जो व्याकरण नियम नहीं जानते हैं वे अविद्वान हुए । अविद्वान का स्वरूप महाभाष्य ये इस प्रकार वर्णित है
उत त्वः अपि खल्वेकः पश्यन्नपि न पश्यति वाचय् । अपि खल्वेकः श्रृण्वन्नपि न
श्रृणोत्येनामिति अविद्वासम् (9)
भाष्यकार के अनुसार शिक्षा के दो फल थे- बौद्धिक विकास और नैतिक उन्नति ।प्रथम आहिनक में उनके द्वारा गिनाये गये व्याकरण पढ़ने के सारे उपयोगों का भी समावेश
इनमें हो जाता है । नैतिक विकास पर इतना जोर देने के कारण ही उन्होंने इस बात को बार-बार दुहराया है कि विद्या कर्म और योनि तीनों की दृष्टि से अवदात व्यक्ति ही ब्राहमण
है । (10)पतंजलि आरत्वि जीन  थे और वैदिक संस्कृति के अनन्य उपासक । वे जानते थे कि व्याकरण के द्वारा ही संस्कृत की उन्नति को सकती है । उनके समय में प्रादेशिक प्राकृतों का विकास व विस्तार जन-जन में था । प्राकृत बहुजन समाज की भाषा बन चुकी थी ।  संस्कृत के प्रति जन सामान्य में उदासीनता व्याप्त हो गई थी तथा वह शिष्ट वर्ग तक ही ।सीमित रह गई थी । पुष्यमित्र शुंग ने यज्ञों के द्वारा वैदिक संस्कृति का पुनरूत्थान किया ।चूंकि विद्यार्थी व्याकरण ज्ञान के बिना ही वेदाध्ययन करने लगे । यह कष्ट महाभाष्यकार को था  । इस पीड़ा को महाभाष्य में व्यक्त करते हुए पतंजलि कहते हैं-
पुराकल्प एतदासीत्
संस्कारोत्तरकालं ब्राहमणा व्याकरणं स्माधीयते ।
तेभ्यस्तत्रस्थानकरणनादानुप्रदानेज्ञेम्यो वैदिकाः शब्दा उपदिश्यन्ते, तदद्यत्वे न तथा
वेदमधीत्य त्वरिता वक्तारो भवन्ति वेदान्नो वैदिकाः शब्दाः सिद्धा लोकाच्च लौकिकाः,
अनर्थकम् व्याकरणम् इति । (11)
2.वेदों की रक्षा व्याकरण ज्ञान के बिना असंभव है यह बात पतंजलि जानते थे ।अतः उन्होनें संस्कृत की उन्नति तथा वेदों की रक्षा के लिए व्याकरण अध्ययन पर बल दिया । पतंजलि के अनुसार अपशब्दों का उच्चारण करन से म्लेच्छ बनते है (12)। तथा व्याकरण के ज्ञान से रहित होने पर स्त्री (13)। व्याकरण ज्ञान न होने पर ब्राह्रमण अविद्वान् कहलाता है जबकि ब्राह्रमणों को आर्खिजीन होना चाहिये । आर्बिजीन वह है जो प्रत्येक पद, स्वर और अक्षर का संस्कार के साथ उच्चारण करता है जो व्याकरण के बिना नहीं हो सकता (14)।
अतः पतंजलि के प्रयासों का ही यह प्रतिफल था कि बाद में व्याकरण ज्ञान का अत्याधिक प्रचार तथा प्रसार हुआ कि भोज के समय में स्त्री कहती है कि 'तव  बाधति मे
बाधते' अर्थात् कालांतर में स्त्रियों में व्याकरण ज्ञान पतंजलि के प्रयासों का ही परिणाम था।


सन्दर्भ सूची:
1- व्याकरण महाभाष्य प्रथम आहिनक पृ0 10 चारुदेव शास्त्री, मोतीलाल बनारसी दास
2-1-70 महाभाष्य
3-उपेत्याधीयते तस्पा उपाध्यायी उपाध्याया । 3-3-21 वा पृ0 302
4-वर्णिका-भागुरी लोकायतस्य वर्तिका । 7-345 वा0 7,8 पृ 190
5- कुमारः श्रमणादिर्भि 2.1.70
6- पतंजलि कालीन भारत -डॉ0 प्रभुदयाल अग्निहोत्री
7- पुंयोगादारण्यायाम 4.1.48
8. पतिंवरा कन्या 3.3.46 महाभाष्य
9- व्याकरण महाभाष्य पृ0 13
10-त्रीणि यस्यावदातानि विद्या योनिश्च कर्म च ।
एतच्छिवे विजानीहिं ब्राह्रणाग्रयस्यलक्षणम् ।। 4-1-48- वा0 1पृ0 62
11-व्याकरण महाभाष्य प्रथम आहिनक पृ0 16
12- तस्माद् ब्रह्रमणेन न म्लेच्छतवै नापभाषितवै । प्रथम अहिनक पृ0 7
13-प्रथम अहिनक पृ0 10
14-यो वा इमां पदशः स्वरशो Sक्षरराश्च वाचं विदधाति स आविजीनो भवति ।

प्रो. कमलेशदत्त त्रिपाठी :व्यक्तित्व,कृतित्व और साहित्यिक अवदान

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