आधुनिक संस्कृत साहित्य का फलक अत्याधिक विस्तृत है जिसमे पारंपरिक विधाओं में साथ-साथ नई विधाओं में नई शैली के साथ प्रचुर साहित्य सुलभ है ।आधुनिक संस्कृत साहित्य के कवियों ने परम्परानुमोदित पक्ष से हटकर अपने युग की नई वास्तविकता के अनुरूप एक ऐसे मार्ग का निर्माण किया है ,जिसके द्वारा उनकी अनुभूति अधिक शक्ति के साथ पाठक पर प्रभाव डाल सकें और इस कार्य के निष्पादन में परंपरा जहाँ जहाँ बाधा उत्पन्न करती है ,वहां विद्रोह भी आवश्यक हो जाता है ।इसीलिए बीसवीं शती की ये रचनाएं संविधान, स्वरूप, भाषा, प्रस्तुति एवं शैली के दृष्टिकोण से प्राचीन संस्कृत साहित्य से भिन्न हैं । यह भिन्नता अत्यधिक सुस्पष्ट एवं विस्तार के साथ भाषा के क्षेत्र में दृष्टिगोचर होती है ,क्योंकि भाषा एक ओर तो भाव पक्ष को प्रभावित करती है ,वहीं कला पक्ष से भी संबंधित होती है इसके साथ ही साथ सह्रदय भावकों से भी साक्षात् संबंधित होती है।
सामान्य रूप से देखा जाय तो आधुनिक संस्कृत साहित्य की भाषा सरल है ,तथा वैदर्भी रीति में ही लगभग संपूर्ण साहित्य सृजन प्राप्त होता है । इन काव्यों में प्राचीन कवि माघ,
भारवि के समान न तो आडंबर दिखाई पड़ता है और न ही श्री हर्ष के समान गुत्थियां । प्राचीन कवियों का प्रयास था,कि सामान्य व्यक्ति उनके ग्रंथ के साथ खिलवाड़ न करें,
प्रबुद्ध पाठक ही ग्रंथ में प्रवेश करें ,जिसका संकेत श्री हर्ष ने दिया है-
ग्रंथ ग्रन्थरिह क्वाचित्क्वचिदपि न्यासि प्रयत्नान्मया (1 )।
किंतु आधुनिक कवि न तो राज्याश्रय प्राप्त करने के लिए काव्य रचना करता है, न ही किसी राजा की प्रशंसा एवं मनोरंजन के लिए । वह ईश्वर, गुरू या देवता के सामने आत्मसमर्पित होकर भी काव्य सृजन नहीं करता है । उसकी काव्य रचना उसकी स्वानुभूति और चेतना के फलस्वरूप होती है। इसीलिए सुन्दर -कुरूप, शिव-अशिव, यथार्थ-अयथार्थ सभी ओर उसकी दृष्टि जाती है और क्षोभ, व्यंग्य कर्कशता, शोक, चिन्ता आदि भाव भी साहित्य में दिखाई पड़ते है। आधुनिक कवि ऐसे काव्य रूप को अपना रहे हैं जो उसके कथन की प्रकृति के अनुरूप हों अथवा जिससे उसके मन की संगति स्थापित हो । अतएवं केवल कोमल शब्दों की पदशय्या की रचना करने में प्रयासरत न होकर वे भावतत्व एवं विचार सूत्र को तीव्रता से पकड़ कर, तथा उसे तीव्रतर बनाने की ओर प्रवृत्त होते हैं ।उदात्तीकरण के स्थान पर वह भावों में घनत्व और तीव्रता लाने का प्रयत्न करते हैं इसीलिए उसके कथन में सीधापन अधिक मिलता है । आधुनिक कवि सम्भवतः यही चाहते है कि संस्कृत भाषा न जानने वाले व्यक्ति को भी कविता का मर्म समझ में आ जाएं एवं उस उस पाठक का भी भरपूर रसास्वादन हो दृष्टिकोण की यह भिन्नता ही कवि को भाषा के सरलतम रुप की ओर प्रेरित करती है।
प्राचीन महाकवियों में बाण, सुबन्धु, माघ, श्रीहर्ष आदि की रचनाओं में शब्दों के साथ-साथ भावाभिव्यक्ति भी दुरूह है। ये कवि लम्बे समास -बहुल विशेषणों के अधिकाधिक प्रयोगों से गुंथी क्लिष्ट भाषा का प्रयोग करते थे।इनके काव्यों में विवरण अधिक एवं प्रमुख था तथा कथानक स्वल्प एवं गौण इसी कारण कीथ'(2) को टीका की सहायता लेनी पड़ती थी तथा बेबर जैसे विद्वान,भी इस साहित्य में प्रवेश करने से डरते थे। उन्हें तो वह काव्य भयावह जंगल जैसा दिखाई पड़ता था। वहाँ भाषा की दुर्बोधता ही,उसकी उपेक्षा का हेतु थी किंतु आधुनिक संस्कृत-साहित्य एक ऐसा पुष्पगुच्छ है जिसकी सुगन्ध अनायास ही अंतरात्मा को सुगंधित कर देती है। इस साहित्य को आधुनिक इसलिए नहीं कहा जाता है कि उसने पुरानी समस्त परंपरा को समाप्त कर नयी परम्परा प्रारम्भ की है बल्कि अपनी अनुभूति एवं अभिव्यक्ति के सम्प्रेषण के कारण ये
आधुनिक कही जाती हैं। आज गद्य एवं पद्य की दूरी समाप्त-सी हो रही है किन्तु काव्य एवं अकाव्य में अंतर आज भी स्पष्ट है। केवल तुकबन्दी, जटिल शब्दों की प्रधानता एवं अलंकार और विशेषणों का प्रयोग काव्य नहीं है। दूसरी ओर न ही छन्दों के बन्धन से मुक्ति एवं सरल शब्दों में अभिव्यक्ति काव्य है। आधुनिक काव्य अपने युग की संवेदना को अभिव्यक्त करने में पूर्ण समर्थ हैं।
बाह्य अलंकरणों के बिना कविता के आंतरिक सौन्दर्य को निखार कर सजीव एवं आकर्षक रूप में प्रस्तुत करना आधुनिक कवियों का वैशिष्ट्य है। श्री एजरा पाउण्ड का भी यही मत है।
The true poet is most easily distinguished from the false when he trusts himself to the simplest expression and when he writes without adjectives. (The spirit of Romance,page 219 )
आधुनिक कवियों की सरल अभिव्यक्ति में भाषा के दोनों घटकों शब्द एवं वाक्य का समन्वित साहचर्य दिखाई पड़ता है।
आधुनिक संस्कृत-साहित्य के कवि शब्द प्रयोग के प्रति सावधान तो हैं ,किन्तु नित्य-नवीन समानार्थी एवं पाणिनीय व्याकरण-सम्मत शब्बों के प्रयोग के प्रति इनकी अत्यधिक लिप्सा नहीं दिखाई देती है। ये कवि न तो माघ के
"नवसर्गगते माघे नवशब्दो न विद्यते "सम्मान को खण्डित करना चाहते हैं और न ही श्रीहर्ष के नैषधं विद्धदौषधम् को।
आधुनिक कवि सामान्य प्रचलित शब्दों का ही प्रयोग करते हैं। इस सम्बन्ध में वे इतने उदार हैं कि देशज एवं विदेशी शब्दों का प्रयोग करने के भी नहीं सकुचाते। कुछ कवि (3)अंग्रेजी शब्दों जैसे बैडमिंटन, टेनिस , पुलिस, ईमेल, रेडियो, स्टेशन, मैडम'(4) कॉफी इत्यादि शब्दों का खुलकर प्रयोग करते हैं। वहीं दूसरी ओर कवियों का एक वर्ग ऐसा भी है जो विदेशी शब्दों को संस्कृत में परिवर्तित कर प्रयुक्त करता है। इन शब्दों की तालिका अत्यधिक विस्तृत है। उदाहरणार्थ मुखधूलिका (Face Powder), मुखरेणु (Powder)
काष्ठ-शिला (Bench), परिधान-पेटकम् (Suitcase), आकरण-घटिका (Call -bell) इत्यादि। कहीं-कहीं पर पात्रों के नामों को भी संस्कृत में परिवर्तित कर दिया गया है। जैसे अवरंगजीवः (औरंगजेब), रसनारी (रोशनारा), अपजलखान
(अफजलखां), रुष्टतमः (रूस्तम), आदि नाम उल्लेखनीय हैं(5)। इसी प्रकार मोहर्रम को मोहरमः, रमजान को रामयानम्, गोलकुंडा को गोलखण्डः आदि प्रयोग कर संस्कृत-प्रातिपदिक भी बनाए गये हैं। इसके साथ ही साथ कहीं-कहीं पर शब्दों को उसी रूप में रखकर विभक्तियाँ लगाकर प्रयोग करने का प्रचलन भी प्राप्त होता है ।जैसे छुट्टिः आदि। कुछ स्थलों पर प्राचीन प्रचलित शब्दों की उपेक्षा कर नवीन शब्दों का निर्माण भी प्राप्त होता है। जैसे चमगादड के लिए अजिनपत्राः' शब्द बनाया गया है जबकि पुराने संस्कृत-काव्यों में चर्मचरः शब्द मिलता है(6)।
शब्द प्रयोग की यह उदारता साहित्य में ग्राह्य होनी चाहिए अथवा नहीं? यह प्रश्न विचारणीय है। परम्परावादी वर्ग का मन्तव्य है कि हमें अन्य भाषाओ के शब्दों के प्रयोग से सदैव बचना चाहिए अन्यथा संस्कृत-भाषा अपना दैवीय,परिमार्जित एवं परिष्कृत स्वरूप खो देगी ।किन्तु हमें यह भी याद रखना होगा कि कहीं स्वयं की शुद्धता पर बल देते-देते हमारा अस्तित्त्व पुनः संकट में न आ जाय क्योंकि ऐसा करने से संस्कृत-भाषा पुनः केवल संस्कृतज्ञों अर्थात् सीमित दायरे के मध्य प्रयुक्त होगी और सबसे अलग-थलग होकर कहीं मृत-भाषा न कही जाने लगे।
प्राचीन काल में जब पालि, प्राकृत एवं अपभ्रंश का विकास हुआ तब भी साहित्य में अन्यान्य भाषाओं के शब्दों के प्रयोगों का प्रचलन था। उस समय संस्कृत-भाषा में इन शब्दों के प्रवाह को रोकने में पाणिनि का परिश्रम काम आया था और बाद में पतंजलि ने पुनः संस्कृत-भाषा की विशुद्धता कायम रखने हेतु भगीरथ प्रयास किया। किन्तु नाट्य-साहित्य में स्त्री एवं निम्न-पात्रों द्वारा प्राकृत एवं अपभ्रंश का प्रयोग लगातार होता रहा, जिससे उन भाषाओं को जानने वालों के बीच संस्कृत-प्रवाह बना रहा।
हिन्दी-भाषा में प्रेमचन्द ने उर्दू, फारसी, अरबी शब्दों का खुलकर प्रयोग किया है। इसी प्रकार मुल्कराज आनन्द ने भी अंग्रेजी में अन्य भाषाओं के शब्दों का प्रयोग किया है। सूरदास और तुलसीदास ने भी अरबी, फारसी शब्दों का प्रयोग किया है।
पयादा (पैदल चलना) फारसी भाषा का शब्द है। इसे सूरदास ने प्रयुक्त किया है-
वह घर-द्वार छाडिकै सुंदरि चली पयादे पाउं
(सूरसागर 488)।
विस्तृत के अर्थ में फराख फारसी भाषा का शब्द है। इसका प्रयोग तुलसीदास ने रामचरित-मानस में किया है-
दूरि फराक रुचिर सो घाटा। (मानस उत्तर 29/1)।
किन्तु इससे उन भाषाओं के स्वरूप को कोई हानि नहीं हुई।
आज हम पुनः उसी संधियुग में है जब न केवल विभिन्न भारतीय भाषाएँ बल्कि विदेशी भाषाएँ भी समानान्तर रूप से प्राप्त हो रही हैं। ऐसे समय में साहित्य में दूसरी भाषाओं के शब्दों का प्रयोग घातक नहीं होगा क्योंकि भाषा शब्दों से नहीं बदलती है। केवल भाषा की रूप-रचना अर्थात् व्याकरण की भिन्नता ही भाषा को बदल सकती है।इसीलिए कहा जाता है कि शब्दावली स्वयं में महत्त्वपूर्ण नहीं होती, वह तो प्रयोगान्विति और अनुभूति से संष्लिष्ट होकर ही महत्त्व पाती है।
विदेशी एवं देशज शब्दों को रोकने में एक कठिनाई यह भी कि कुछ विदेशी शब्द तो समाज में इस प्रकार प्रचलित हो गए हैं जो उन्हीं अर्थों में रूढ़ से हो गए हैं। जैसे टेलीफोन, ट्रेन , मोबाईल, ईमेल, इन्टरनेट इत्यादि।
अगर इन्हें संस्कृतनिष्ठ किया जायगा तो निश्चित रूप से सहदय पाठक के रसास्वादन में बाधा होगी। उदाहरणार्थ- रामकृष्णा शास्त्री की कविता देखिये -
भज नेतारं भज नेतारं भज "चमचा" रे
नेता माता नेता तात: नेता भगिनी नेता भ्राता।
नेताखिलविघ्नानां हर्ता नेता सर्वसौख्यविधाता।
यहाँ चमचा शब्द को यदि संस्कृतनिष्ठ किया जायगा तो कविता का व्यंग्य ही नष्ट हो जायगा।
साहित्यिालोचकों ने साहित्यिक रचना में अश्लीलता और ग्राम्यत्व दोष माने हैं। इसके अतिरिक्त अयुक्तत्व, असमर्थत्व, अवाचकत्व , अप्रीतत्व भी काव्य-रचना में दोष हैं। अतः अन्य भाषा के शब्दों का प्रयोग मात्र दोष नहीं कहा जा सकता है।
निष्कर्षतः संस्कृतनिष्ठ शब्दों के प्रयोग में दृढ बंधन की शिथिलता अनिवार्य एवं अपेक्षित है।सृजनशक्ति के दृष्टिकोण से कला के दो मुख्य स्तर होते हैं। एक रचनात्मक, दूसरा अनुकरणात्मक। कवि का कार्य है कि परम्परा पर आभूत अनुकरणात्मक प्रवृत्ति जो निर्जीव होती जा रही है, उसे नये संदर्भों तथा नये आयामों से अनुप्राणित कर सजीव करना। इसी कारण वे वाक्य एवं प्रतीक जो निस्तेज हो चुके थे, उन्हें आधुनिक कवियों ने यथार्थ अनुभूतियों एवं प्रतीको
द्वारा स्थानांतरित कर दिया। इसीलिए साहित्य की नई विधाओं में जैसे सानेट ,तान्का, शिजो आदि विदेशी छन्दों में भी सरल वाक्यों में भाव गाम्भीर्य का
अनोखा मिश्रण दिखाई पड़ता है। छोटे-छोटे वाक्यों से गागर में सागर भरते हुए केशवचन्द्र दाश द्वारा निर्मित बिम्ब विधान द्रष्टव्य है -
नाहं निक्षिप्तकन्दुकः /प्रत्यागमिष्यामि/ भूतलं संस्पृश्य/ परमेको मिमिलिषु।/ आषाडस्य बिन्दु :।
(ईशा पृष्ठ 1 .)
राधावल्लभ त्रिपाठी, बनमाली विश्वाल, बच्चूलाल अवस्थी, केशवचन्द्र दाश, देवर्षि कलानाथ शास्त्री, हर्षदेव माधव के बिम्ब-विधान एवं वाक्य-संरचना अत्यधिक स्वाभाविक, सरल एवं भावों की गहराई लिये हुए होती है।वहीं राजेन्द्र मिश्र की गलज्जलिका, एवं कजरी लोकगीतों के राग से आबद्ध होकर , संस्कृत-भाषा, न जानने वाले श्रोता को भी आनन्दित कर देती है।
वाक्यों में व्यंग्य एवं चुटीले वाक्य जिनका प्रयोग पारम्परिक संस्कृत में भाण एवं प्रहसन में ही दिखाई पड़ता था, आज उसका विस्तार सभी विधाओंमें प्राप्त होता है। उदाहरणार्थ-
आचार्योऽहं आचार ग्राह्यामि
आचारः सदाचारो भवेत् कदाचारो वा, न मे चिन्ता।
प्रयासकोऽहं प्रजाः प्रयास्मि
ते जीविता बुभुक्षिता मृता वा स्यु :,न मे चिन्ता।
यह व्यंग्य पाठक पर सीधा प्रहार करता है, तो कहीं सामान्य हिन्दी के बोलचाल के वाक्यों का संस्कृत में प्रयोग अपना-सा लगता है। उदाहरणार्थ-
1. अयं दुष्टः कस्य उपवनस्य मूलिका प्रीतिः। जीतसिंह खोखर,
पृ.-31
2. कारागारस्य पवनं खादिष्यति। वही, पृ. १०
3. प्रेम नेत्रहीनं भवति। वही, पृ.१०
लोकोक्तियों का प्रयोग भी आधुनिक कवियों ने किया है-
1. भिन्नरूचिर्लोकः/ अन्तर्दाहा
हिन्दी मुहावरों का प्रयोग द्रष्टव्य है-
1. वस्तुतस्तु न नवमणतैलं भविष्यति न च राधा नर्त्स्यति
2. नैष्कर्यं खलु पातकम् (आराम हराम है) आख्यान-वल्लरी-
कलानाथ शास्त्री, पृ. 120
प्राचीन कवियों के वाक्य, विशेषणों एवं समासों से युक्त और उपमा आदि अलंकारों की अधिकता से भरे होते थे। गद्य एवं पद्य दोनों में ही यह विशेषता
दिखाई पड़ती है। चाहे वह महाश्वेता का सौन्दर्य हो या स्वर्ग से उतरते नारद को देखने का चित्रण कवि की परिकल्पना सामान्य धरातल से हटकर पौराणिक एवं कल्पित उपमानों से वर्ण्य विषय का चित्र खींचती है और लम्बे-लम्बे वाक्यों के द्वारा अपने नैपुण्य एवं उर्वर कल्पना का बोध कराती है।लेकिन आधुनिक कवि छोटे -छोटे वाक्यों द्वारा पाठक को कवि के अनुभवों की
सह-अनुभूति कराते हैं, क्योंकि वह आधुनिक साहित्य में जीवन के यथार्थ को उसी रूप में प्रस्तुत करते हैं, जिसकी अनुभूति उन्होंने स्वयं की है। इसीलिए
आधुनिक कवि के सम्बन्ध में कहा जाता है कि वह किसी विषय पर कविता नहीं करता है, उसका अनुभव ही कविता का विषय होता है।
अतः अतिरंजना, अति अलंकरण, रूढ एवं पारंपरिक प्रतीक योजना एवं क्लिष्ट बिम्ब से रहित सरल वाक्य कवि की अनुभूति को अभिव्यक्त कर उत्कृष्ट साहित्य की रचना में समर्थ है।
साहित्य में भाषा के प्रयोग से जुड़े इस प्रश्न पर भी विचार आवश्यक है कि कवि को भाषा की शुद्धता पर ध्यान देना चाहिए या समोषण पर।साहित्यकार के लिए सम्प्रेषणीयता एवं रसोपलब्धि ही इष्ट है। महाकवियों में
भी भाषागत अशुद्धि प्राप्त हो ही जाती है। किसी ने कहा है -
अपशब्दशतं माघे भारवौ तु शतत्रयम् ।
कालिदासेन गण्यन्ते कविरेको धनंजयः ॥
यदि अपशब्दों के प्रयोग और अप्रयोग से कवि की महत्ता का निर्धारण होता ,तो कतिपय अपशब्दों का प्रयोग करने वाले कालिदास कनिष्ठिका पर अधिष्ठित/ नहीं होते तथा धनंजय, जिनकी भाषा निर्दोष तो है ।लेकिन कवि के रूप में उन्हें उच्च स्थान प्राप्त नहीं है। मम्मट ने काव्य-लक्षण में दोषराहित्य को भी स्थान दिया था किन्तु आचार्य विश्वनाथ ने मम्मट द्वारा प्रदत्त ध्वनिकाव्य के उदाहरण में ही दोष
दिखाया है। "रसात्मकं काव्यं" की जो स्थापना आचार्य विश्वनाथ ने की है,भाषा के दृष्टिकोण से भी वही मानदण्ड सर्वोत्तम है।
फिर दूसरी बात यह भी है कि शुद्धता के निर्णय का आधार यह भी नहीं हो सकता कि प्राचीन लेखकों ने कोई प्रयोग जिस रूप में किया है, उसे ही स्वीकार करना चाहिए। पाणिनि को ही सदैव प्रमाण नहीं माना जा सकता
क्योंकि भाषा तो प्रतिक्षण परिवर्तित होती रहती है। सत्यमेव जयते, अंतर्राष्ट्रीय आदि वाक्य एवं शब्द आज स्वीकृत हैं और इनके प्रयोग का नियामक लोक अर्थात् समाज है ,व्याकरण नहीं । महर्षि पतंजलि ने भी महाभाष्य में यही कहा है -
यथा घटेन कार्यं करिष्यन् कुम्भ्कारकुलम् गत्वाह कुरु घटं कार्यमनेन
करिष्यामीति न तद्वत् शब्दान् प्रयोक्ष्यमाणो वैयाकरणकुलं गत्वाह -कुरु शब्दान् प्रयोक्ष्य इति।
पाणिनि ने अष्टाध्यायी में अन्य आचार्यों के कथन का सम्मान किया है, वहीं दूसरी ओर लोक का भी। पतंजलि ने" सिद्धे शब्दार्थ सम्बन्धे" तथा "लोकतोsर्थप्रयुक्त" वार्तिकों की व्याख्या से स्पष्ट कर दिया कि पाणिनि ने लोकव्यवहार में प्रचलित शब्दों को लेकर अपना व्याकरण बनाया है।
आज भी इसी उद्देश्य को लेकर भाषा में परिवर्तन अपेक्षित है। भाषा सामाजिक सम्पति है, जिसमें शुद्धि तथा अशुद्धि का विचार समाज की दृष्टि से करना चाहिए।
आधुनिक कवियों ने सरल तरल भाषा में जो उच्च कोटि की साहित्यिक रचनाएँ की हैं, उनके द्वारा संस्कृत जन जन तक पहुँचकर पुनः कन्ठहार बन रही है। ऐसे समय में भाषा का सरल -तरल प्रवाह ही संस्कृत भाषा को सजीव,गतिशील एवं सह्रदयों को अधिकाधिक भाव विभोर करने में समर्थ है ।
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संदर्भ सूची --
1.नैषधीयचरितम् 22/150
2-It is a consolation to reflect that even had she known
Sanskrit, she would not have been able without a
comment to understand what was said by the goddess.
-Keath
3-बनमाली विश्वाल , प्रमोद भारतीय, हरिदत्त शर्मा , आदि।
4-आख्यानवल्लरी- देवर्षि कलानाथ शास्त्री, कुसुमलक्ष्मी -रामचंद्र पारखी ।
5-शिवराज विजय -अम्बिकादत्त व्यास
6-हर्षदेव माधव- एक जाग्रत चमत्कार -प्रो राधा वल्लभ त्रिपाठी
विशेष - अंक 15-16संयुक्तांक ,वर्ष - 2006,पता -दृग भारती ,इलाहाबाद
में प्रकाशित लेख