वैदिक विद्यापीठ एवं चरणों का स्वरूप
पतंजलि के महाभाष्य से यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि उनसे पूर्व भाषा और साहित्य के क्षेत्र में दीर्घ अनवरत विकास एवं उन्नति हो चुकी थी। वैसे तो यह सर्वविदित ही है कि पतंजलि का महाभाष्य अष्टाध्यायी का आकर ग्रंथ है ।अतः पतंजलि द्वारा वर्णित सामग्री के स्रोत अनेक स्थानों पर पाणिनि ही है किंतु फिर भी मेरा ऐसा मानना है कि पतंजलि कालीन भारत की राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक एवं धार्मिक दशा का ज्ञान पतंजलि के ग्रंथों से भली प्रकार हो सकता है ।तथा उन ग्रंथों के आधार पर ही तत्कालीन शिक्षण पद्धति, साहित्य, शिक्षा संस्थाएं, अध्ययन के विषय एवं ग्रंथों के नाम इत्यादि ज्ञान प्राप्त होता है ।
प्राचीन शिक्षा प्रणाली में गुरू शिष्य संबंध अत्यधिक पवित्र एवं महत्वपूर्ण स्थान रखता है । वंश का तात्पर्य जन्म से प्राप्त वंश के अतिरिक़्त विद्या वंश से भी था । पाणिनि के अनुसार वंश दो प्रकार के थे।
1. विद्या और2. योनि संबंध
अष्टाध्यायी में वर्णित है -
(विद्या योनि संबंधेभ्यो वुञ्4/3/77, क्रतो विद्यायोनि संबंधेभ्यः 6/3/23) ।
विद्या वंश गुरू शिष्य परम्परा के रूप में चलता था, जो योनि संबंध के समान ही वास्तविक माना जाता था । योनि संबंध मातॄवंश और पितॄवंश से दो प्रकार का होता था-
(अपर आह-द्वावेव वंशौ मातॄवंशः
पितॄवंशश्च,
पतंजलि भाष्य - 4/1/147 वा.7) ।
विद्या वंश चरणों के माध्यम से निर्धारित होता था । शिष्य अपने चरण में गुरू शिष्य परंपरा अथवा विद्यावंश का पारायण वेदाध्ययन की समाप्ति के समय किया करते हैं ।
उपनिषद् में इस प्रकार के कई विद्यावंश सुरक्षित हैं । संख्या वंश्येन (2/1/19) सूत्र से ज्ञान होता है कि योनि संबंध से प्रवॄत्त होने वाले पितॄवंश की अतीत पीढि़यों की संख्या भी यत्नपूर्वक रखी जाती थी । उदाहरण के लिये 2/4/84 सूत्र पर पतंजलि ने एकविंशति भारद्वाजम्और त्रिपंचाशद्गौतमम् का उल्लेख किया है । एकविंशति भारद्वाज का तात्पर्य भारद्वाज के कुल की 21 पीढि़यों से है तथा त्रिपंचाशद गौतमम् का तात्पर्य मूल पुरूष गौतम से है।अत.उदाहरण की रचना के समय तक 53 पीढि़यां बीत चुकी थी ।
उपनिषद् काल में गौतम वंश के प्रसिद्ध आचार्य थे व्यामि उनके पुत्र उद्धालक आरूणि और उसके पुत्र श्वेतकेन्द्र आरूणेय । वॄहदारण्यक उपनिषद् की वंश सूचियों में गुरू शिष्य परंपरा की 57 पीढि़यों की गिनती है ।
चरण वैदिक शिक्षण संस्था थी ,जिसमें वेद की एक शाखा का अध्ययन शिष्य समुदाय करता था और जिसका नाम मूल संस्थापक के नाम पर होता था । अतः चरण शब्द वेद की शाखा के लिये प्रयुक़्त होता था जो वैदिक विद्यापीठ थे ।
चरण के संस्थापक मूल आचार्य के नाम से ही उसकी शाखा,उसके विद्यार्थी और अध्यापक एवं उनके साहित्य का नाम पडता था । एक चरण,अर्थात् एक शाखा से संबंध रखने वाले सारे छात्रों और विद्वानों की ,इसी प्रकार एक जाति मानी जाती थी, जिस प्रकार एक गोत्र से उत्पन्न लोगों की (1)। प्राचीन भारत की वैदिक शिक्षा संस्थाओं में नामकरण का यह सिद्धांत बहुत ही महत्वपूर्ण था क़्योंकि ये चरण कभी ऋषि के नाम पर रखे जाते थे तो कभी वैदिक शाखा या ग्रंथ के नाम पर । 4/3/102 अर्थात् आचार्य द्वारा किया गया प्रवचन चरण की आधार शिला बनता था क़्योंकि फिर उस ग्रन्थ के अध्ययन के लिये छात्र एकत्र होने लगते थे । उदाहरणार्थ ऋषि तित्तिर ने तैतरीय शाखा का प्रवचन किया (तेन प्रोक़्तम् )(2) । उसके अध्येता छात्र तैत्तिरीय कहलाए (तित्तिरिणा प्रोक़्तमधीयते) । शाखा का मूल प्रवर्तक प्रत्यक्षकारी कहलाता था 4/3/104 एवं वही चरण का संस्थापक आचार्य भी होता था उसकी छान्दस् शाखा का अध्ययन उस चरण के विद्यार्थी करते थे । अतएव वैदिक मूल ग्रंथों का नाम सदा उनके छात्रों का ही बोधक होता था । जैसे कठ आचार्य द्वारा प्रोक़्त जो कठ शाखा थी, उसके पढ़ने पढ़ानेवालों (अध्येतॄ-वेदितॄ) का नाम कठाः होता था । अतः कठ से कठ प्रोक़्त पुस्तक,के साथ-साथ छात्र और गुरूओं का भी बोध होता था , जो उसको पढ़ते (अधीयान) और पढ़ाते थे (तद्वेद )। मूल कठ शब्द आचार्य के नाम से और उसकी शाखा के नाम से और तत्पश्चात चरण के नाम से प्रसिद्ध हुआ । इसी प्रकार अनेक वैदिक शाखाओं को ब्राह्मण ग्रंथों को केन्द्र मानकर चरणों की स्थापना हुई है ।
यही तद् विषयता का नियम था अर्थात् छन्द और व्याकरण स्वतंत्र न होकर अध्येतॄ-वेदितॄ परक होता था ,जिस प्रधान आचार्य ने शाखा का प्रवचन किया था, वह अथवा उसके शिष्य ,ब्राह्मण आदि नये व्याख्या ग्रंथों की भी रचना करते रहते थे । उनकी शिष्य परंपरा में आगे आने वाले लोग भी उन व्याख्यानों और विमर्शों में अपना-अपना भाग जोडते रहते थे, किंतु उन सबका नामकरण स्वतंत्र न होकर चरण के नाम से ही किया जाता था जैसे तैत्तरीय शाखा,तैत्तरीय ब्राह्मण, तैत्तरीय आरण्यक,तैत्तरीय उपनिषद् ,तैत्तरीय प्रातिशाख्य आदि समस्त साहित्य तैत्तरीय चरण के नाम से ही प्रसिद्ध हुआ
था । जब तक वैदिक चरणों का संगठन दृढ़ रहा, नामकरण की यही पद्धति चालू रही। आगे चलकर वैदिक चरणों के अंतर्गत कल्प साहित्य की भी रचना हुई ,जिसमें श्रौतसूत्र आदि थे (पुराण-प्रोक़्तेषु ब्राह्मणकल्पेषु 4/3/105) । कुछ चरणों में धर्मसूत्रों का भी निर्माण हुआ (चरणेभ्यो धर्मवत् 4/2/46) । इन सब का नाम उसी पुरानी शैली से चरण के नाम के अनुसार रखा गया । स्वाभाविक है कि सब चरण या शिक्षण संस्थाओं का समान महत्व न था । उनमें कुछ प्रधान या बडे और कुछ छोटे चरण थे। प्रधान चरणों में तो छन्द(शाखा),ब्राह्मण,आरण्यक,उपनिषद्,प्रातिशाख्य,श्रौतसूत्र आदि पूरे या अधिकांश साहित्य का विकास हो गया था, पर छोटे चरण उसी परंपरा में एकाध सूत्रग्रन्थ ही बना पाते थे,उनका साहिात्यिक प्रयत्न उसी तक सीमित रह जाता था । इन्हें सूत्र चरण कहते थे। एक सूत्रग्रन्थ के निर्माण द्वारा वे अपना अस्तित्व चरितार्थ करते थे।वैदिक शाखाओं में कुछ का अधिक महत्व था, कुछ का कम । कुछ में स्वतंत्र सामग्री अधिक होती थी,कुछ में नाममात्र का पाठ परिवर्तन रहता था । पाणिनि ने इनकी तीन कोटियों का उल्लेख किया है-
1. उत्तम-शाख, 2.समान शाख 3. अधम शाख,
जिनके चरण मूल चरण की तुलना में क्रमशः उत्तम-शाखीय, समान शाखीय और अधमशाखीय कहलाते थे(गहादि गण, 4/2/138) ।
इन वैदिक चरणों अर्थात् उनके छात्र और गुरूओं के समुदाय के बहुत से नाम प्राचीन चरण व्यूह सूचियों में मिलते
हैं ।
अतः गुरू शिष्य के पारम्पर्य संबंध रूपी वंश से चरणों में ज्ञान साधना की अमूल्य निधि एकत्रित हुई, जो आज वैदिक वाङ्मय के रूप में हमारे सामने हैं एवं उनका निर्माण इन्हीं चरणों के अंतर्गत हुआ ।
इनमें चार प्रकार के ग्रंथ हैं –
1. वैदिक छन्द या शाखा 2.ब्राह्मण ग्रंथ
3. कल्पग्रंथ 4. धर्म सूत्र ।
ब्राह्मण ग्रंथो का विशाल साहित्य चरणों की देन था । चरणों में कल्प ग्रंथों के बाद धर्म सूत्रों की रचना हुई –
चरणेभ्यो धर्मवत् (4/2/46)
इस पर वार्तिक में आचार्य कहते हैं-
चरणाद् धर्माम्नाययोः ।
किंतु धर्म सूत्रों के काल से ही चरणों के स्वरूप में परिवर्तन दृष्टिगोचर होता है, क़्योंकि वैदिक साहित्य के निर्माण की अवधि में चरण प्रतिष्ठा सूचक थे ,किन्तु अब अनेक विषयों का अध्ययन चरणों के बाहर होने लगा था क़्योंकि इनकी शिक्षा एवं नियम सरल न थे । इस प्रकार चरणों से बाहर अनेक स्वतंत्र शास्त्रों का निर्माण हुआ और कालांतर में चरणों ने उन्हें अपने पाठ्यक्रमों में स्वीकार कर लिया । पतञ्जलि के अनुसार यास्क कॄत निरूक़्त और पाणिनि कॄत अष्टाध्यायी इसी प्रकार चरणों के बाहर लिखे गये स्वतंत्र शास्त्र थे। जिनका संबंध किसी एक चरण से नहीं था बाल्कि सभी चरणों की परिषदें उन्हें अपना रही थी –
सर्व वेद परिषद हींद शास्त्रम् (2/1/58, 6/3/14 भाष्य)
अतः एक आचार्य या ऋषि से आरंभ होकर चरणों का देश और काल में विस्तार हुआ। अर्थात आचार्य और उनके शिष्य, फिर उन शिष्यों के भी शिष्य , सभी उसी चरण के नाम से प्रसिद्ध होते थे ।यही विद्या संबंध या गुरु शिष्य पारंपर्य संबंध ही चरण कहलाता था ।यह संबंध मौख संबंध था ।ये चरण स्थान विशेष की सीमा में आबद्ध नहीं थे , बल्कि जिस चरण के शिष्य जहां भी जाते ,वे उस आचार्य के चरण के नाम से ही जाने जाते थे ।पतंजलि ने लिखा है कि कठ और कालाप चरण गांव गांव में फैल गए थे, जहां उसके ग्रंथों की शिक्षा देने वाले विद्वान जा बसे थे ।
ग्रामे ग्रामे काठकं कालापकं च प्रोच्यते (भाष्य 4/3/101)
इस प्रकार चरणों का समूह होता था जैस -कठानां समूहः काठकम् कालापकम्
छान्दोग्यम् औक़्थक़्यिम् आथर्वणम् (चरणेभ्यो धर्मवत् 4/2/46) पतञ्जलि ने उदगात् और प्रत्यस्थात् इन दो रूपों का उल्लेख किया है जिनके द्वारा दो चरणों के एक साथ उदय और प्रतिष्ठा की बात कही जाती थी जैसे-
उदगात् कठकालापम् प्रत्यष्ठात्कठ कौथुममः, उदगान्मौदपैप्पलादम् ।
इसे ही पाणिनि अनुवाद कहते हैं-
अनुवादे चरणानाम् (2/4/3)
छात्रों के चरणों में प्रविष्ट होने को “तद्वेपवेद” कहा गया है (5/1/134) जैसे काठिकाम् अवेतः का तात्पर्य है कि वह छात्र कठ चरण का ब्रह्मचारी है या कठ चरण के आचार्य का वह अन्तेवासी है (कठत्वं प्राप्तः-काशिका) । एक ही चरण के छात्र परस्पर सब्रह्मचारी कहलाते थे ।
चरणे ब्रह्मचारिणि 6/3/86) पतञ्जलि के अनुसार चरणों से सहपाठी विषयक तीन प्रश्न पूछे जा सकते हैं-
1- के सब्रह्मचारिणः तव ? आप के चरण सहपाठी कौन थे ?
2-किं सब्रह्मचारीत्वम ? आप किनके सहपाठी हैं ?
3- कः सब्रह्मचारी तव ? आप का
सहपाठी कौन है ?
इन तीनों प्रश्नों से प्रश्नकर्ता को यही जानना अभीष्ट है कि व्यक्ति का संबंध किस चरण से है ।
स्त्रियां भी चरण में प्रविष्ट होती थी
एवं अध्ययन करती थी साथ ही साथ चरणों के नाम से स्त्रियों के नामकरण की प्रथा का उल्लेख भी हुआ है । “ जातेर स्त्री विषयादयोपधात् “ सूत्र में जातिवाचक स्त्री नामों में गोत्र और चरणवाची नामों का ग्रहण होता है । काशिका में कठी और बहची उदाहरण प्राप्त होते हैं । कठी का तात्पर्य है कॄष्ण यजुर्वेद के कठ कण चरण में विद्या अध्ययन करने वाली स्त्रियां । इसी प्रकार वहृच नामक ऋग्वेद के चरण में अध्ययन करने वाली ब्रह्मचारिणी कन्याएं बहची कहलाती थी। चरणों में अध्ययनरत छात्राओं को छात्र के समान ही सम्मानित एवं उपाधि से विभूषित किया जाता था । उदाहरणार्थ कठ चरण में प्रविष्ट स्त्री कठी उनमें जो विशेष सम्मानित होती वह पूज्यमान कठी और जो अग्रपाद की अधिकारिणी होती थी, वह कठवॄन्दारिका कहलाती थी । भाषा में कठमानिनी विशेषण के प्रयोग से स्पष्ट है कि कठ चरण की सदस्या होने के कारण वह गौरवान्वित अनुभव करती थी ।गोत्र के समान ही चरणों की सदस्यता के आधार पर विद्वानों को प्राप्त होने वाले सम्मान में भी न्यूनाधिक़्य होता था -
गोत्र चरणाच श्लाघात्याकार तदवेतेषु 5/1/134
इसी कारण व्यक्ति भी दूसरों की तुलना में स्वयं को अधिक गौरवशाली समझते और दूसरों को निम्न दृाष्टि से देखते थे । इस भाव को क्रमशः “काठिकया श्लाघते “ एवं 'काठिकया अत्याकुरूते 'कहते हैं ।
इन चरणों में
व्यवस्था के लिए संघ के निर्माण का भी उल्लेख है ।शाकल आचार्य की शाकल संहिता का अध्ययन करने वाले शाकल नामक, गुरु शिष्यों के संघ का उल्लेख प्राप्त होता है। यह शकल या शाकलक कहलाता था ।
(शकलाद् वा 4/3 /128 ;शाकलेन प्रोक्तमधीयते शाकला: तेषाम् संघ:)।
संघ व्यवस्था के
सुचारू संचालन के लिए ये मुद्रा या मोहरे भी रखते थे जिन पर उनके अंक और लक्षण उत्कीर्ण थे ।इसी के लिए शाकलो उड़ग्क:,शाकलं लक्षणम् शब्दों का प्रयोग हुआ है ।
संघाडग्कलक्षणेषु अञ् यञ् इञामण् 4/3 /127
शाकलाद् वो 4/3/128)
चरणों के अंतर्गत परिषद् होती थी जो विद्या संबंधी व्यवस्था करती थी ,जिसके अध्यक्ष आचार्य होते थे ।
तीन प्रकार की
परिषद का उल्लेख प्राप्त होता है-1- शिक्षा संबंधी 2-समाज में गोष्ठी संबंधी 3-राजशासन संबंधी ।
चरणों का संबंध
शिक्षा संबंधी परिषद्
से था, जो एक प्रकार की विद्वत सभा थी ,जो उच्चारण और व्याकरण संबंधी नियमों का
निश्चय करती थी और शाखा के पाठ आदि के विषय में भी जिसमें विचार होता था।
पत्राध्वर्यु परिषदश्च (4/3/ 123 )में चरण परिषद का ही उल्लेख है ।इसमें परिषद संबंधी किसी वस्तु के लिए पारिषद शब्द सिद्ध किया गया है।( परिषद:इदम् )
गॄहय सूत्रों में भी आचार्य एवं इनकी परिषदों का उल्लेख करते हुए वर्णित है कि प्रविष्ट हुआ ब्रह्मचारी परिषद के मध्य में विराजमान आचार्य के समक्ष उपस्थित होकर हर्षित मन से अपना आदर भाव प्रकट करता था (3)। चरक में भी इस प्रकार की शिक्षा परिषद् का आभास मिलता है (4)। पतंजलि ने परिषद् का अर्थ परिषदों में बने साहित्य के अर्थ में
भी किया है-
(सर्ववेद पारिषदं हीदं शास्त्रम ) ।
निरूकक़्त में परिषद के स्थान पर पार्षद शब्द का प्रयोग इसी अर्थ में है(5) । दुर्गाचार्य ने लिखा है कि पार्षद ग्रंथो से तात्पर्य प्रातिशाख्यों का है जो चरणों की पर्षदों (परिषदों) में बनाए गये थे । स्वर, संधि, वैदिक शब्द, रूप , पाठ आदि के संबंध में परिषदों द्वारा निर्णीत नियमों का ही इनमें संग्रह है । पतंजलि ने सामवेद की सात्यमुनि और राणायनीय शाखाओं के अर्थ एकार, अर्ध ओकार संबंधी नियम को पार्षद
कॄति अर्थात चरण परिषद द्वारा निर्णीत नियम कहा है-
पार्षदकॄतिरेषा तत्रभवतां नैव हि लोके नान्यास्मिन्वेदेsर्ध एकारोsर्ध ओकारो वास्ति, प्रत्याहार सूत्र 3-4 पर वा0 4)
“ पारिषदः समवैति “ के अनुसार परिषद में जो सम्मिलित हो वह
पारिषध होता था जिसके द्वारा सामाजिक परिषद का ग्रहण होता है जिसे गोष्ठी या समाज कहा जाता था ।
तीसरी परिषद राजा की मंत्रिपरिषद थी जिसका उल्लेख “परिषद्वलो राजा “ में प्राप्त होता है ।
कॄष्यासुति परिषदो वलच् 5/2/112 सूत्र 4/4/101/ में भी राजनीति परिषद् की ओर संकेत है ।
चरणों के स्वरूप के विषय में पाणिनि और पतंजलि के ग्रंथो से जो उपर्युक़्त उल्लेख मिलते हैं उसके परिप्रेक्ष्य में दो बिंदुओं पर विचार करना अपेक्षित है-
1.चरण जो वैदिक विद्यापीठ थे जिनकी जडे सम्पूर्ण भारतवर्ष में फैली थी तथा जिसके अंतर्गत वैदिक ज्ञान का निर्माण तथा पठन-पाठन हो रहा था उनका आस्तित्व एकाएक धूमिल पड कर समाप्त क़्यों एवं कैसे हो गया ? जबकि वैदिक पठन पाठन तो निरंतर बना रहा । संभवतः कालान्तर में जनपदीय शासन व्यवस्था के प्रभाव के फलस्वरूप षोडश महाजनपद बने और तक्षशिला एवं नालंदा जैसी शिक्षण संस्थाए बनी। जिनकी प्रशंसा में अनेक लेख एवं अभिलेख मिलते हैं । गुप्त काल में ब्राह्मणों के अग्रहार ग्राम विद्या तथा शास्त्रीय शोध केन्द्र के रूप में प्रसिद्ध हुए । वेदों का प्रभुत्व भी समाज में अब इतना नहीं रहा। परिणामस्वरूप वैदिक साहित्य में होने वाला निर्माण भी समाप्तप्राय हो गया अतः इन परिास्थितियों में चरणों का प्रभाव एवं सम्मान कम हो गया तथा इनका आस्तित्व ही समाप्त हो गया ।
2.एक अन्य बिंदु भी विचारणीय है कि वैदिक छंद शास्त्र की रचना पतंजलि से पूर्व हो चुकी थी ।भाष्यकार के सम्मुख ऋक प्रातिशाख्य , जिसके अंतिम तीन पटलों में छंदों का वर्णन है।
1-साम
के निदान सूत्र 2-कात्यायन की अनुक्रमणी और3-शांखायन श्रौत सूत्र
यह छंद शास्त्र विषयक ग्रंथ विद्यमान थे ।वहां हमें पाद शब्द का प्रयोग प्राप्त होता है ,जबकि कालांतर में पाद के स्थान पर चरण शब्द का प्रयोग
छंद शास्त्र में प्राप्त होता है।(6)।
वस्तुतः इस विषय
में कुछ निश्चित पूर्वक नहीं कहा जा सकता कि पाद के स्थान पर चरण शब्द का प्रयोग कब से शुरू हुआ? क्योंकि जैसा कि कीथ का कथन है कि हमारे ग्रंथकार वैदिक काल और लौकिक संस्कृत काल के बीच में होने वाले छंदों के विकास के संबंध में हमें पूर्णतया अंधकार में ही
छोड़ देते हैं।
3 . अमर कोष में चरण शब्द शरीर के अंग विशेष के अर्थ में वार्णित है-किंतु पतंजलि एवं पाणिनि दोनों के ग्रंथों में ही इस अर्थ में चरण शब्द प्राप्त नहीं होता है । मेदिनी कोश में चरण शब्द वेदपीठ एवं छन्द के पाद- दोनों अर्थों में वार्णित है-
चरणोंsस्त्री वहवॄचादौ मूले गोत्रे पदेsपि च ।
भ्रमणे भक्षणे नपुंसक उदाहृतः ।।
इति मेदिनी
निष्कर्षतः पतंजलि ने चरण का प्रयोग वैदिक विद्यापीठ के अर्थ में किया है जिसमें वेद की एक शाखा का अध्ययन ही चरणों के अंतर्गत होता था ।
ब्राह्मण एवं सूत्र साहित्य की रचना इन्हीं चरणों के अंतर्गत हुई थी किंतु बाद में चरणों का प्रभुत्व एवं
आस्तित्व समाप्त हो गया आजकल चरण शब्द शरीर के अंग एवं छन्द के पाद के अर्थ में सामान्यतया प्रयुक़्त होता है ।
सन्दर्भ सूची--
1 गोत्रं च चरणैः सह तथा गोत्रं च चरणानि च।4-1-63
2-4/3/101
3,यक्षमित चक्षुणः प्रियो वा भूयासमिति सपरिणत्कमाचार्यमभ्येत्य ब्रह्मचारी पठति,गोमिल गॄहयसूत्र 3/4/28,ब्राहमायण गॄहयसूत्र 3/1/25
4.विमान स्थान 8/19-20
5.पद प्रक्रतीनि सर्व पराणानां पार्षदानि निरुक़्त 1/17
6.ज्ञेयः पादश्चतुर्थोs शः ।-पादशब्दः
स्वपर्यायाणामङघ्रि-चरणादिशब्दानामप्युपलक्षणम् ।
केदारभटट विरचित वॄत्तरत्नाकर 2/12